सतना में उनकी शादी को ग्यारह बरस हुए और उनके बच्चे नहीं हुए। प्रमोद एक क्लिनिक में कंपाउंडर है। आरती सरकारी स्कूल में पढ़ाती है। उस शहर में वे दोनों ठीक-ठाक जाने जाते हैं, क्योंकि क्लिनिक पर आधा शहर आता है और स्कूल में आधे शहर के बच्चे पढ़ते हैं।
इसलिए वे बुलाए बहुत जाते हैं। शादी, तिलक, मुंडन, गृह प्रवेश। महीने में तीन-चार। और हर जगह वह सवाल पूछा जाता है। पूछने वाले बदलते रहते हैं और सवाल एक ही रहता है। कोई ख़ुशख़बरी। यह पूछने वाले बुरे लोग नहीं होते। यह वहाँ बात शुरू करने का तरीक़ा है, जैसे कहीं और मौसम का ज़िक्र होता है।
पहले बरस दोनों हँसकर टाल देते थे। दूसरे बरस प्रमोद ने एक चीज़ शुरू की। उसने जवाब देना शुरू कर दिया। पहले। जिस पल वह सवाल शुरू होता, वह बीच में बोल पड़ता था। इसका मतलब यह था कि सवाल आरती तक कभी नहीं पहुँचा।
उसने यह उससे पूछकर नहीं किया और आरती ने इसे रोका भी नहीं। उसके जवाब बरसों में छोटे होते गए। शुरू में वह मज़ाक़ करता था। कि जल्दी क्या है, मिठाई तैयार रखो। फिर वह कहने लगा कि देख रहे हैं।
पिछले चार बरस से वह सिर्फ़ नहीं कहता है। एक शब्द, और उसके बाद वह दूसरी तरफ़ देखने लगता है। इसकी क़ीमत उसने चुकाई और वह पूरी उसी की थी। जो आदमी ऐसा करता है वह बदतमीज़ कहलाने लगता है।
आठवें बरस उसके भाई का तिलक था और वहाँ उसकी अपनी माँ ने सबके सामने एक बात कह दी। उन्होंने किसी को ताना नहीं मारा। उन्होंने बस इतना कहा कि भगवान सबको एक जैसा नहीं देता, और यह कहते हुए उन्होंने आरती की तरफ़ देखा।
प्रमोद उस दिन तिलक बीच में छोड़कर चला आया और आरती वहीं रुकी और पूरा कार्यक्रम निपटाकर लौटी। घर आकर उसने उससे इतना ही कहा कि जाने से पहले सोच लिया करो, वहाँ मुझे ही जवाब देना पड़ता है। छठे बरस उसकी अपनी बुआ ने बुलाना बंद कर दिया।
उन्होंने अपनी बेटी की शादी में उन्हें नहीं बुलाया और घर में सबसे यही कहा कि वह ठीक से बात नहीं करता। प्रमोद ने कोई सफ़ाई नहीं दी। उसने आरती से इस पर एक बार भी नहीं कहा कि तुम्हारी वजह से।
अब वह बात जो शहर में नहीं मालूम थी। तीसरे बरस दोनों की जाँच हुई थी। जबलपुर में।
वहाँ जाने का इंतज़ाम भी अपने आप में एक काम था। दो बार बहाना बनाकर छुट्टी ली गई और किसी को नहीं बताया गया कि कहाँ जा रहे हैं, क्योंकि सतना से जबलपुर जाने वाले को कोई न कोई देख ही लेता है।
रिपोर्ट तीसरे दिन मिली।
डॉक्टर ने उसे दो लाइन में बता दिया और आगे यह भी कह दिया कि इलाज की एक लाइन है, महँगी है, और उसमें भी कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने वह इलाज दो बरस कराया और उसमें जो पैसा लगा वह आरती की तनख़्वाह से लगा।
लौटते वक़्त बस में वे दोनों चुप रहे और आरती ने बीच में एक बार उसका हाथ पकड़ा और छोड़ दिया, और यह उस पूरे मामले में उन दोनों के बीच हुई अकेली ऐसी बात है।
कमी उसमें थी।
यह ऐसी बात है जिसका उन दोनों को मालूम होना और शहर को न मालूम होना, दोनों तय था। शहर उलटा मानता है। हमेशा उलटा मानता है। जहाँ बच्चा न हो, वहाँ बात औरत की ही होती है और यह किसी को सिखाना नहीं पड़ता।
प्रमोद इसे कहना चाहता था। वह चौथे बरस अपनी माँ से कहने वाला था और आरती ने उसे रोक दिया। उसने बहुत सीधी बात कही थी। उसने कहा कि तुम कह दोगे तो लोग मुझसे पूछना बंद कर देंगे, और तुमसे पूछना शुरू कर देंगे, और उस शहर में तुम्हें उसी क्लिनिक पर बैठना है।
प्रमोद ने कहा कि तो क्या। आरती ने कहा कि तुम जानते नहीं हो कि क्या। और वह जानती थी, क्योंकि वह स्कूल में लड़कों को पढ़ाती है और उसने देखा है कि इस बात पर मर्दों के बारे में क्या-क्या कहा जाता है।
इसलिए वह चुप रहा और वह सुनती रही। ग्यारह बरस में यह हिसाब कभी बराबर नहीं हुआ और न उसने कभी कहा कि होना चाहिए, न आरती ने। ग्यारहवें बरस भादों में उसके चचेरे भाई की शादी थी। वहाँ बहुत लोग थे और खाने की जगह पर एक अधेड़ औरत आरती के पास आ खड़ी हुई।
प्रमोद तीन क़दम दूर था और उसने सुन लिया। औरत ने वही पूछा। प्रमोद ने मुँह खोला। और उसी वक़्त आरती बोल पड़ी। उसने कहा कि नहीं, नहीं हुए। बस इतना। न सफ़ाई, न मुस्कुराहट, न आगे कुछ।
उस औरत ने दो-तीन बातें और कहीं, वही जो ऐसे मौक़े पर कही जाती हैं, और आरती उन्हें सुनती रही और फिर उसने कहा कि खाना ठंडा हो रहा है। प्रमोद वहीं खड़ा रहा। उसने कुछ नहीं कहा और यह ग्यारह बरस में पहली बार था।
लौटते वक़्त वे शेयर वाले ऑटो में बैठे। रास्ते में आरती ने एक बात कही। उसने कहा कि अब मैं कह दिया करूँगी। प्रमोद ने हाँ या ना कुछ नहीं कहा।
उसने खिड़की की तरफ़ देखा और बाक़ी रास्ता उधर ही देखता रहा। ग्यारह बरस से हर भीड़ में वह सबसे पहले बोलने वाला आदमी था और उस ऑटो में उसके हाथों के पास करने को कुछ नहीं था, और उसने उन्हें दो बार घुटनों पर रखा और दोनों बार हटा लिया।