उस स्कूल में पुष्पलता पढ़ाती थी और छोटेलाल चपरासी था। इमारत छोटी है। चार कमरे, एक बरामदा, और पीछे रसोई। एक सिरे से दूसरे सिरे तक चालीस क़दम पड़ते हैं। उनकी शादी को उस वक़्त तीन बरस हो चुके थे जब उसका तबादला उसी स्कूल में हुआ।
यह इत्तिफ़ाक़ था और उसने रुकवाने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि स्कूल घर से आठ मिनट पर था और उससे पहले वह चौदह किलोमीटर जाती थी। पहले ही हफ़्ते में उसने नियम बना दिया। गेट के अंदर वे एक-दूसरे को नहीं जानते।
नमस्ते नहीं, बात नहीं, साथ आना-जाना नहीं, और स्कूल के किसी काम में एक-दूसरे का नाम नहीं। यह उसने तय किया और उसी ने उसे लागू भी किया। छोटेलाल ने इसमें अपनी कोई राय नहीं दी। वह ऐसा ही आदमी है और यह इस पूरे क़िस्से में उसकी सबसे बड़ी बात है और उसकी सबसे बड़ी कमी भी।
कारण उसने उसे उसी रात बता दिया था। उसने कहा कि अगर वहाँ यह मालूम हो गया तो मैं मैडम नहीं रहूँगी।
उसने कहा कि तीन सौ बच्चे हैं और उनके घर हैं, और जिस दिन उन घरों में यह बात पहुँचेगी उस दिन से मैं चपरासी की घरवाली हो जाऊँगी और मेरी पढ़ाई की बात कोई नहीं सुनेगा। यह बात कड़वी है और सच है।
उस क़स्बे में यही होता है और वह इसे जानती थी, क्योंकि उसने अपने पिछले स्कूल में एक और औरत के साथ यही होते देखा था। छोटेलाल ने कहा कि ठीक है। और उसके बाद अठारह बरस तक यही चला।
अब यह सोचिए कि इसका मतलब क्या होता है। वे दोनों सुबह घर से अलग-अलग निकलते थे। वह पहले, वह दस मिनट बाद। अंदर वह बरामदे में रहता था और वह कमरों में। आठ घंटे। एक ही इमारत में। उसने अठारह बरस में उसे कभी अपने कमरे में नहीं बुलाया।
जो कागज़ात इधर से उधर जाने होते हैं, वे किसी और के हाथ भेजे जाते थे, और यह वहाँ किसी को अजीब नहीं लगा क्योंकि किसी को कुछ मालूम ही नहीं था। दोपहर के खाने में वह बरामदे के कोने में बैठकर खाता था और वह कमरे में।
खाना एक ही घर से आता था। एक ही डिब्बे में बना, दो अलग थैलों में। इसे किसी ने नहीं पकड़ा और यह अपने आप में बताता है कि लोग कितना ध्यान देते हैं। घर में वे आम पति-पत्नी थे।
बच्चे दो हुए और वे उसी स्कूल में नहीं पढ़े, बल्कि दूसरे स्कूल में, और उसकी वजह भी वही थी।
अठारहवें बरस नए प्रधानाचार्य आए।
वे शहर से आए थे और उन्हें यहाँ आना पसंद नहीं था, और ऐसे आदमी अक्सर अपना ग़ुस्सा नीचे उतारते हैं। मार्च की एक सुबह प्रार्थना सभा में यह हुआ।
मंच पर रखी कुर्सी टूट गई थी। उसका पाया दो हफ़्ते से हिल रहा था और उसकी मरम्मत के लिए दो बार कहा जा चुका था और पैसा नहीं आया था। प्रधानाचार्य उस पर बैठे और कुर्सी बैठ गई। वे गिरे नहीं। वे सँभल गए।
पर तीन सौ बच्चों के सामने ऐसा होना अपनी जगह एक बात है और उन्होंने वही किया जो ऐसे में किया जाता है। उन्होंने छोटेलाल को बुलाया और वहीं, माइक के सामने, उसे सुनाया। उन्होंने कहा कि तुम लोग खाते हो और काम नहीं करते।
उन्होंने यह भी कहा कि तुम्हारी जगह कोई और रख लूँ तो चार दिन में स्कूल चमक जाएगा। छोटेलाल सिर झुकाए खड़ा रहा। उसने कोई सफ़ाई नहीं दी। उसने यह भी नहीं कहा कि मैंने दो बार लिखकर दिया था।
पुष्पलता पीछे की क़तार में खड़ी थी, अपनी कक्षा के साथ। वह आगे आई। क़तार छोड़कर। उसने माइक नहीं लिया। वह मंच के पास तक गई और वहाँ से बोली, इतनी आवाज़ में कि आगे की चार क़तारें सुन लें।
उसने कहा कि सर, ये मेरे पति हैं। और उसके बाद उसने कुछ और नहीं कहा। उसने प्रधानाचार्य से बहस नहीं की, कुर्सी की बात नहीं की, और अपनी बात का कोई मतलब नहीं समझाया। वह पीछे जाकर अपनी क़तार में खड़ी हो गई और प्रार्थना सभा चलती रही और उस दिन बाक़ी सब वैसे ही हुआ जैसे रोज़ होता है।
उस हफ़्ते कुछ नहीं हुआ। कुछ भी नहीं। प्रधानाचार्य ने इस पर दोबारा कुछ नहीं कहा, न उससे और न छोटेलाल से, और कुर्सी की मरम्मत अगले महीने हो गई। बच्चों ने चार-पाँच दिन बात की और फिर छोड़ दी, क्योंकि बच्चों के लिए यह उतनी बड़ी बात थी ही नहीं।
घर वालों में भी कुछ नहीं बदला। जो बदला, वह छोटा था और उसे पकड़ने में पुष्पलता को ख़ुद कई महीने लगे। अठारह बरस का वह नियम उस दिन के बाद दोबारा नहीं लगा। किसी ने उसे ख़त्म नहीं किया और किसी ने उसे तोड़ने की बात भी नहीं की।
बस अगले सोमवार को छोटेलाल ने ग्यारह बजे उसके कमरे में चाय रख दी। वह सबके लिए चाय बनाता ही है और अब तक वह उसकी चाय किसी और के हाथ भिजवाता था।
उस दिन वह ख़ुद ले गया और मेज़ पर रखकर वापस आ गया। अब उसे नौ बरस हो गए हैं और वह रोज़ ऐसा ही करता है। पुष्पलता अब भी उसी स्कूल में है और अगले बरस उसका रिटायरमेंट है।
स्कूल के बच्चे यह जानते हैं और उन्हें इसमें कुछ नहीं लगता। जो बच्चे उस प्रार्थना सभा में थे, वे अब बीस-पचीस के हो गए हैं और उनमें से किसी को यह याद नहीं। और ग्यारह बजे जब वह चाय रखने आता है तो कक्षा वैसी ही चलती रहती है, क्योंकि वहाँ बैठे बच्चों के लिए वह रोज़ की चीज़ है और उन्होंने उसे देखना बंद कर दिया है।