बात एक बारिश वाली शाम से शुरू हुई थी। नीलम शाहजहाँपुर के एक निजी क्लिनिक में बैठती थी। पर्चा बनाने और पैसे लेने का काम। उस शाम बहुत पानी था और डॉक्टर ने उसे बस अड्डे तक छोड़ दिया। गाड़ी से, दो मिनट का रास्ता।

इसे किसी ने देखा।

देखने वाला कोई दुश्मन नहीं था। वह उसी मुहल्ले का एक आदमी था और उसने घर जाकर अपनी घरवाली से बात-बात में कह दिया। यह किस तरह फैलता है, इसे समझने के लिए किसी षड्यंत्र की ज़रूरत नहीं होती। ग्यारह दिन में यह पूरे मुहल्ले में था और बीस दिन में क्लिनिक तक पहुँच गया।

और इसमें कुछ था नहीं। यह कहने की ज़रूरत इसलिए है कि पढ़ने वाला भी वही सोचने लगता है जो वह मुहल्ला सोच रहा था। शिवकुमार बिजली विभाग में था। उसे यह चौथे दिन मालूम हो गया।

आदमी को अपने बारे में फैली बात सबसे बाद में मालूम होती है, यह कहावत है और झूठ है। मर्द को सबसे पहले मालूम होती है, क्योंकि उसे कोई न कोई हमदर्दी जताने आ ही जाता है। उसके पास तीन रास्ते थे और तीनों वहाँ आज़माए जाते हैं।

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जवाब

पहला यह कि वह उस आदमी के घर जाकर लड़े। दूसरा यह कि वह क्लिनिक जाकर डॉक्टर से बात करे। तीसरा यह कि वह नीलम की नौकरी छुड़वा दे। तीनों में एक ही ख़राबी थी और शिवकुमार ने वह देख ली।

तीनों करने से बात पक्की हो जाती।

जिस बात पर आदमी लड़ने जाता है, मुहल्ला उसे सच मान लेता है। और जो औरत नौकरी छोड़ देती है, उसके बारे में यह तय हो जाता है कि छुड़वाई गई है। इसलिए उसने तीनों नहीं किए। जो उसने किया, वह इतना था कि वह रोज़ शाम सात बजे नीलम के साथ बाज़ार निकलने लगा।

पहले भी वे कभी-कभी जाते थे। अब रोज़ जाने लगे। एक ही रास्ता। मुहल्ले की गली से निकलकर, चौक से होते हुए, सब्ज़ी मंडी तक और वापस। इसमें चालीस मिनट लगते थे और उसमें कम से कम तीस लोग उन्हें देखते थे।

वे सौदा भी करते थे, क्योंकि बिना सौदे के घूमना और साफ़ दिखता। यह आठ महीने चला। अब वह बात जो इस मामले की सबसे कड़ी है और जिसे छोड़ देना बेईमानी होगी। ग्यारहवें दिन शिवकुमार ने नीलम से पूछ लिया था।

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उसने घुमाकर नहीं पूछा। उसने सीधा पूछा कि कुछ है क्या। रात के साढ़े दस बजे, रसोई के दरवाज़े पर खड़े होकर, और उसने दोबारा नहीं पूछा। नीलम ने जवाब नहीं दिया। उसने उस रात खाना नहीं बनाया और अगले तीन दिन बहुत कम बोली, और चौथे दिन उसने कहा कि तुमने पूछ लिया, यह मुझे याद रहेगा।

और उसे याद रहा।

आगे जो आठ महीने की सैर है, वह उस सवाल का प्रायश्चित नहीं थी। शिवकुमार उसे उसी दिन शुरू कर चुका था जिस दिन उसने पूछा नहीं था। पर उन दोनों के बीच वह सवाल दो बरस पड़ा रहा। अफ़वाह आठ महीने में मर गई और वह सवाल दो बरस चला।

यह बात उन दोनों को अब भी मालूम है और इसे कभी हल किया हुआ नहीं कहा गया। बीच में एक और चीज़ हुई। उनका बड़ा लड़का उस वक़्त सोलह का था। उसने स्कूल में एक लड़के को मारा, क्योंकि उसने कुछ कह दिया था।

उसे दो हफ़्ते के लिए निकाल दिया गया। शिवकुमार ने उसे डाँटा नहीं। उसने उन दो हफ़्तों में उसे रोज़ शाम अपने साथ ले जाना शुरू कर दिया। वही सात बजे वाली सैर, वही रास्ता, और लड़का उन दोनों के पीछे-पीछे चलता था और थैला उठाता था।

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दूसरे हफ़्ते में उसने बाप से पूछा कि आप कुछ कहते क्यों नहीं। शिवकुमार ने कहा कि कह रहा हूँ। लड़का उस वक़्त नहीं समझा और उसने बाद में समझा, और आज वह गुड़गाँव में है और उसकी अपनी गृहस्थी है।

अफ़वाह मरी कैसे, यह भी बताने लायक़ है। उसे किसी ने ग़लत साबित नहीं किया।

मुहल्ले को कोई नई बात मिल गई। एक घर में बँटवारा हुआ और दो भाई आपस में लड़ पड़े और पुलिस तक बात गई, और उसके बाद क्लिनिक वाली बात किसी को याद नहीं रही। अफ़वाहें इसी तरह ख़त्म होती हैं। वे हारती नहीं, उकता जाती हैं।

नीलम उसी क्लिनिक में आज भी है और अब वहाँ का पूरा हिसाब उसी के पास रहता है। उसे ग्यारह बरस हो गए।

सात बजे वाली सैर अब भी होती है और अब उसमें कोई बात नहीं है। वह बस उनके दिन का आख़िरी काम है, और सर्दियों में जब जल्दी अँधेरा हो जाता है तब भी वे निकलते हैं। एक चीज़ शिवकुमार अब भी करता है और शायद उसे ख़ुद मालूम नहीं।

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चौक से मुड़ने वाले मोड़ पर, जहाँ चार दुकानें हैं और जहाँ शाम को सबसे ज़्यादा लोग खड़े होते हैं, उसकी चाल धीमी हो जाती है। हर बार। वहाँ से निकलने में उन्हें तीस सेकंड ज़्यादा लगते हैं। नीलम ने यह बहुत पहले देख लिया था और उसने आज तक नहीं पूछा।