सोनभद्र के उस इलाक़े में पत्थर तोड़ने का काम सबसे ज़्यादा है और उसमें सबसे ज़्यादा आदमी कान से जाते हैं। यह धीरे-धीरे जाता है। बरसों में। बासदेव का एक दिन में गया। क्रशर के पास ब्लास्टिंग का माल रखा था और उसमें एक चार्ज वक़्त से पहले चल गया।
वह उससे तेरह क़दम पर था। उस दिन के बाद उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। दोनों कान। इलाज बनारस तक हुआ और वहाँ डॉक्टर ने साफ़ बता दिया कि परदा फट चुका है और अब कुछ नहीं होगा। उसकी उम्र इकतीस थी। शादी को छह बरस हो चुके थे और घर में दो बच्चे थे।
फुलझरी अट्ठाईस की थी। और यहीं से जो चीज़ शुरू हुई, वह इस पूरे मामले की असल बात है। फुलझरी बोलने वाली औरत नहीं थी।
ऐसे लोग हर गाँव में होते हैं। वह घर में बोलती थी और बाहर नहीं बोलती थी। बाज़ार में दाम भी नहीं करती थी, दुकानदार जो कहता वह दे देती थी, और यह उसके स्वभाव की बात थी। अब बाहर की सारी बात उसे करनी थी।
बस का कंडक्टर, बैंक, ब्लॉक का दफ़्तर, डॉक्टर, बच्चों का स्कूल, और वे सब लोग जो अचानक यह पूछने आ जाते हैं कि अब क्या करोगे। पहले महीने में वह ब्लॉक के दफ़्तर से बिना कुछ कहे लौट आई थी।
वह वहाँ दो घंटे बैठी रही और उसका नंबर आया और वह खड़ी हुई और उससे बोला नहीं गया, और वह लौट आई। यह उसने बासदेव को नहीं बताया। मुआवज़े की बात अगले महीने उठी। क्रशर वाले ने चालीस हज़ार कहे। नक़द, उसी दिन, और एक काग़ज़ पर दस्तख़त।
उस काग़ज़ में यह लिखा था कि हादसा काम के दौरान नहीं हुआ। गाँव के दो लोग यह पैगाम लेकर आए थे और उन्होंने समझाया कि लड़ने में कुछ नहीं रखा और चालीस हज़ार आजकल कोई नहीं देता। बासदेव ने फुलझरी की तरफ़ देखा।
उसने मना कर दिया। उसने यह ऊँची आवाज़ में नहीं कहा। उसने बस सिर हिलाया और कहा कि नहीं करेंगे, और वे दोनों आदमी उठकर चले गए।
इसके बाद चौदह महीने लगे।
इन चौदह महीनों में उसे बासठ बार बाहर जाना पड़ा। यह गिनती बासदेव ने रखी, कापी में, क्योंकि उसके पास और कोई काम नहीं था। श्रम विभाग, थाना, वकील, ज़िला अस्पताल का दुबारा परचा, और वह सुनवाई जिसमें उसे कमरे में खड़े होकर बोलना पड़ा।
उस कमरे में तीस से ऊपर आदमी थे और औरत वह अकेली थी। वह बोली। वह अच्छा नहीं बोली और उसकी आवाज़ काँपती रही और उसने वही बात दो बार दोहरा दी। पर उसने पूरी बात कह दी और आख़िर तक खड़ी रही।
फ़ैसला उनके हक़ में गया। दो लाख अस्सी हज़ार। पैसा आने पर उन्होंने आटे की चक्की डाली। क्रशर पर बासदेव अब जा नहीं सकता था और गाँव में चक्की एक ही थी और वह तीन किलोमीटर दूर थी, इसलिए यह सोच-समझकर लिया गया फ़ैसला था।
चक्की वही चलाता है। उसमें एक ही दिक़्क़त है और वह बड़ी है। चक्की की आवाज़ से पता चलता है कि पाट कब घिस गया है और कब गरम हो रहा है, और यह हर चक्की वाला कान से पहचानता है।
बासदेव नहीं पहचान सकता।
इसलिए फुलझरी दिन में तीन बार वहाँ आकर खड़ी होती है और सुनती है, और फिर एक इशारा करती है, और वह इशारा भी उन्हीं इकतालीस में से एक है। और घर के अंदर इन्हीं चौदह महीनों में दूसरा काम चल रहा था।
उन दोनों को आपस में बात करनी थी और लिखकर बात करना दिन भर नहीं चल सकता, क्योंकि फुलझरी को लिखना ठीक से नहीं आता। इसलिए उन्होंने अपने इशारे बनाए। यह किसी ने सिखाया नहीं। ज़रूरत के हिसाब से एक-एक करके बनता गया।
मेज़ पर सीधी हथेली रखने का मतलब है कि पानी आ गया है, भर लो। कान के पास दो उँगलियाँ घुमाने का मतलब है कि बड़ा लड़का झूठ बोल रहा है। ठोड़ी पर अँगूठा रगड़ने का मतलब यह है कि पैसे कम पड़ रहे हैं और इस महीने कुछ नहीं ख़रीदना।
ऐसे इशारे अब उनके पास इकतालीस हैं और उनमें से चौंतीस काम के हैं। बाक़ी सात मज़ाक़ के हैं। उनमें एक क्रशर वाले का है।
उस आदमी की एक आदत थी कि वह बोलने से पहले गला खँखारता था, और बहुत ज़ोर से खँखारता था, और बासदेव सुनने वाले दिनों में उसकी नक़ल उतारकर फुलझरी को हँसाता था। अब वह नक़ल नहीं उतार सकता, क्योंकि उसे अपनी आवाज़ भी नहीं सुनाई देती।
तो उसने उसका इशारा बना लिया। गले पर दो उँगलियाँ, और नाक सिकोड़कर। इसका मतलब है कि मुसीबत आ रही है। चौदहवें महीने की सुनवाई के दिन वे दोनों दफ़्तर के बरामदे में बैठे थे। वहाँ बहुत भीड़ थी। और उसी वक़्त क्रशर वाला अपने दो आदमियों के साथ उधर से निकला। वह उन्हें देखकर भी नहीं रुका और आगे बढ़ गया।
बासदेव ने फुलझरी की तरफ़ देखा और गले पर दो उँगलियाँ रखकर नाक सिकोड़ ली। फुलझरी वहीं, उस भरे बरामदे में, हँस पड़ी।
ज़ोर से हँसी। इतनी ज़ोर से कि आसपास के आठ-दस लोग मुड़कर देखने लगे और किसी की समझ में नहीं आया कि हुआ क्या है। वह हँसती रही और उसने अपना मुँह भी नहीं ढका, जो उस औरत ने अपनी उम्र भर में कभी नहीं किया था। बासदेव ने वह हँसी सुनी नहीं। उसने सिर्फ़ देखी, और चौदह महीने में यह पहली बार था।