रामनाथ की तीन बेटियाँ थीं और कोई बेटा नहीं था। ज़मीन चार बीघा थी, मधुबनी ज़िले के उस गाँव में, और वह अच्छी ज़मीन थी क्योंकि नहर का पानी उस तक आता है। मिथिलेश के घर में नौ लोग थे और आधा बीघा।
बात इसी हिसाब से तय हुई और दोनों तरफ़ को साफ़ मालूम था कि क्या तय हो रहा है। वह सुशीला के घर रहने आएगा। यानी वहीं का हो जाएगा। यह उस इलाक़े में होता है और अक्सर होता है और इसके बावजूद इसे कोई अच्छा नहीं मानता।
जिस दिन वह आया, उसी दिन से गाँव ने उसे नाम से बुलाना बंद कर दिया। वह घरजमाई हो गया। यह गाली नहीं है और गाली से कम भी नहीं है।
इसका मतलब यह निकाला जाता है कि आदमी अपने पैरों पर नहीं है और जो खा रहा है वह किसी और का है, और यह बात हर बार ताज़ा की जाती है। चौपाल पर ताश के खेल में यह चलता रहता था।
कोई हार जाए तो कह देता कि तुम तो घरजमाई हो, तुम्हें क्या। मिथिलेश हँस देता था। बाईस बरस तक। सबसे बुरा उसके बेटे के मुंडन में हुआ।
उसके अपने गाँव से एक रिश्तेदार आया था और उसने आँगन में, बीस लोगों के सामने, ऊँची आवाज़ में कहा कि इस बच्चे का ननिहाल और ददिहाल एक ही है, बड़ा आराम है।
उस दिन सुशीला की माँ रो पड़ी थीं। मिथिलेश चुप रहा और वह मुंडन आख़िर तक चलता रहा। उसका अपना बाप उससे छह बरस नहीं बोला। पूरे छह। इसकी वजह वही नहीं थी जो लोग समझते हैं।
बात इज़्ज़त की नहीं थी, गिनती की थी। घर में एक कमाने वाला हाथ कम हो गया था और आधे बीघे पर नौ लोग थे, और बाप को यह छूटना बहुत भारी पड़ा। यह मिथिलेश भी जानता था और इसीलिए उसने कभी शिकायत नहीं की।
सुशीला ने इन बाईस बरसों में एक चीज़ की। उसने कभी उसे अपने बाप के पास पैसे माँगने नहीं भेजा। एक बार भी नहीं। बच्चों की फ़ीस, दवा, कपड़े, शादी-ब्याह का लेन-देन। जो भी लगा, वह ख़ुद जाकर माँगती थी।
एक बार वह तेज़ बुख़ार में थी और तब भी वह ख़ुद उठकर गई।
इसमें उसे भी अच्छा नहीं लगता था और वह फिर भी जाती थी, क्योंकि उसे मालूम था कि उस घर में उस आदमी के पास सिर्फ़ एक चीज़ बची है और वह यही है। खेती वही देखता था। शुरू से आख़िर तक।
चार बीघा एक आदमी अकेले नहीं सँभालता, पर वह सँभालता था, और नहर की बारी रात में आती है और वह रात में उठकर जाता था। इन बाईस बरसों में उस ज़मीन ने जो दिया, उसमें दो शादियाँ हुईं। सुशीला की दोनों छोटी बहनों की।
वे दोनों अपने-अपने घर चली गईं और उसके बाद साल में एक-दो बार आती थीं। ग्यारहवें बरस माघ में रामनाथ को लकवा मारा। दाहिना हिस्सा गया। बोलना भी गया। वे तीन बरस और रहे और उन तीन बरसों में उन्होंने एक शब्द नहीं बोला।
और उसी माघ से ज़मीन की बात उठने लगी। रामनाथ के भाई के दो लड़के थे और वे उसी गाँव में थे। उनका कहना यह था कि बेटा कोई है नहीं और ज़मीन ख़ानदान की है। यह क़ानून में नहीं चलता और गाँव में चल जाता है, अगर काग़ज़ ढीले हों।
काग़ज़ ढीले थे। बहुत ढीले।
ज़मीन रामनाथ के नाम थी और उनके बाद कुछ तय नहीं था, और वसीयत उन्होंने कभी नहीं लिखी क्योंकि लिखने की सोचने वाली उम्र में उन्हें लगा था कि अभी बहुत वक़्त है। और मिथिलेश की उस ज़मीन में क़ानूनन कोई जगह नहीं थी।
ग्यारह बरस उसी पर काम किया था और काग़ज़ पर वह वहाँ कोई नहीं था। उसने जो किया, उसमें चौदह महीने लगे। और वह उस तरह का काम नहीं था जैसा कोई सोचेगा। उसने रामनाथ के अँगूठे से वसीयत नहीं करवाई, क्योंकि जो आदमी बोल न सके उसका अँगूठा अदालत में टिकता नहीं और वह इसे जानता था।
उसने रामनाथ के जीते-जी दानपत्र करवाया।
इसके लिए दो गवाह चाहिए थे और तहसील के छह चक्कर लगे और डॉक्टर से यह लिखवाना पड़ा कि आदमी समझ सकता है, जो सच था, क्योंकि रामनाथ समझते सब थे। और उस काग़ज़ में ज़मीन तीन हिस्सों में गई।
सुशीला और उसकी दोनों बहनों में। बराबर-बराबर। यानी जिन दो बहनों ने उस ज़मीन पर एक दिन काम नहीं किया था, उन्हें भी उतना ही मिला जितना सुशीला को। इसका मतलब यह था कि जो आदमी ग्यारह बरस से चार बीघा जोत रहा था, वह अब सवा बीघे से थोड़ा ज़्यादा जोतेगा।
सुशीला ने उससे यह पूछा। उसी रात। उसने कहा कि तीन क्यों, तुमने मेरा नाम भी अकेले डलवा दिया होता तो कोई कुछ नहीं कहता। मिथिलेश ने कहा कि तब कहते रहते। बात वहीं रुक गई। और यही असल जवाब था, हालाँकि वह पूरा नहीं था।
पूरा जवाब यह था कि अगर तीनों बहनों के नाम हो जाए तो चाचा के लड़कों के पास कहने को कुछ नहीं बचता, क्योंकि झगड़ा वहीं टिकता है जहाँ कोई एक आदमी ज़्यादा लेता दिखे। काग़ज़ बनने के बाद गाँव में यह बात दो हफ़्ते चली और फिर बंद हो गई।
किसी ने उसकी तारीफ़ नहीं की। यह उस गाँव का तरीक़ा नहीं है।
बस उसे घरजमाई कहना धीरे-धीरे कम हो गया और कुछ बरसों में बंद हो गया, और उसकी जगह उसे सुशीला का आदमी कहा जाने लगा, जो उससे बेहतर है और बहुत बेहतर नहीं है। अब उसे बाईस बरस बीत चुके हैं।
वह पचास का है।
उस गाँव में उसका नाम कोई नहीं लेता। बच्चे उसे काका कहते हैं, बड़े उसे सुशीला का आदमी कहते हैं, और दुकान पर उधार भी उसी नाम से लिखा जाता है।
जिस दानपत्र पर वह ज़मीन तीन बेटियों के नाम गई, उसमें दो गवाह हैं। एक पड़ोस का आदमी है और दूसरा वह ख़ुद है। उस काग़ज़ पर, नीचे बाईं तरफ़, उसका पूरा नाम लिखा हुआ है और उसके आगे उसके बाप का नाम भी। उस गाँव में वह अकेला काग़ज़ है जिस पर वह नाम मौजूद है।