बेचन बढ़ई है और मलिहाबाद के पास वाले गाँव में उसकी दुकान है। उसने अपनी बेटी की शादी में जो एतराज़ किया था, वह ज़ात का नहीं था। यह साफ़ रहना चाहिए, क्योंकि लोग ऐसे मामलों में सबसे पहले वही मान लेते हैं।
एतराज़ इतना था कि दिनेश्वर की सगाई पहले एक जगह हो चुकी थी और वह टूटी थी। टूटने में उसका कोई क़ुसूर नहीं था और यह बेचन को भी मालूम था। पर गाँव में उस लड़के का नाम एक बार लिया जा चुका था और बेचन को अपने घर में वह नाम नहीं चाहिए था।
यह छोटी बात है। बहुत छोटी। और इसी छोटी बात पर नौ बरस चले गए। रेखा ने शादी कर ली। बिना बाप की मरज़ी के। उसकी माँ आई थीं, चुपचाप, और बेचन नहीं आया, और उसके बाद उसने बेटी से बात नहीं की।
बात न करने का मतलब वहाँ यह होता है कि आदमी आपके सामने से गुज़र जाता है और उसकी आँख आप पर पड़ती ही नहीं। रेखा दो बार गई थी। दोनों बार वह उठकर अंदर चला गया। तीसरी बार वह नहीं गई।
दिनेश्वर की अपनी कोई बाग़ नहीं है। वह लखनऊ में एक दफ़्तर में काम करता है। पहली गर्मियों में उसने एक काम किया। उसने मलिहाबाद की मंडी से दशहरी की एक पेटी ख़रीदी और उसे बस पर चढ़ा दिया, उस गाँव के लिए, बेचन बढ़ई के नाम।
भेजने वाले की जगह उसने कुछ नहीं लिखवाया। यह उसने रेखा को भी बाद में बताया, और तब तक पेटी जा चुकी थी। बस वाला उस गाँव के मोड़ पर सामान उतार देता है और वहीं से लोग ले जाते हैं।
बेचन ने पहली पेटी उतार ली। उसने किसी से पूछा नहीं कि किसने भेजी। पूछने की ज़रूरत भी नहीं थी। अगली गर्मियों में फिर गई। उससे अगली में फिर। नौ बरस, नौ पेटियाँ। हर बार जून के दूसरे हफ़्ते में, हर बार उसी बस से, और हर बार बिना नाम के।
इन नौ बरसों में दोनों तरफ़ से एक शब्द नहीं गया।
रेखा को यह मालूम था और उसने कभी अपने पति से यह नहीं कहा कि रहने दो, और यह उसकी तरफ़ से जो चीज़ थी वह भी उतनी ही थी। बीच में एक बरस ऐसा भी आया जब आम बहुत महँगे थे और घर में पैसे की तंगी थी और पेटी फिर भी गई।
सातवें बरस में बेचन का हाथ आरी से कट गया था। तीन उँगलियाँ गईं, दाहिने हाथ की, जो बढ़ई के लिए काम का ख़त्म होना है। रेखा को यह ख़बर तीसरे दिन मिली और वह नहीं गई। उसने नहीं जाना ख़ुद चुना, क्योंकि जाने पर जो होता वह उसने दो बार देख लिया था और तीसरी बार वह अपने बच्चों के सामने नहीं देखना चाहती थी।
यह अकेली बात है जिसका हिसाब वह आज तक अपने आप से नहीं कर पाई है। उस बरस भी पेटी गई थी। जून में, ठीक वक़्त पर। दसवें बरस की जून में दसवीं पेटी गई। और जुलाई के पहले हफ़्ते में उसी बस से कुछ वापस आया।
वह वही पेटी थी। ख़ाली।
बस वाले ने बताया कि गाँव के मोड़ से चढ़ाई गई है और लखनऊ में दिनेश्वर के नाम उतारनी है, और भेजने वाले ने पर्ची पर सिर्फ़ नाम लिखवाया है और कुछ नहीं। दिनेश्वर ने उसे शाम को घर लाकर खोला।
उसमें कुछ नहीं था। पर पेटी वह पेटी नहीं रह गई थी।
आम की पेटी सस्ती लकड़ी की होती है और उसे इस तरह जोड़ा जाता है कि एक बार खुल जाए तो दोबारा किसी काम की नहीं रहती। पटरियाँ पतली होती हैं, कीलें छोटी होती हैं, और कोने खुल जाते हैं।
इस पेटी की सारी पटरियाँ उतारकर दोबारा जोड़ी गई थीं।
कीलें नई थीं और सीधी ठुकी थीं। चारों कोनों पर अंदर की तरफ़ लकड़ी की तिकोनी गुटकियाँ लगाई गई थीं, जो पेटी को खुलने नहीं देतीं। ऊपर के किनारे रंदे से चिकने किए गए थे ताकि हाथ में गड़ें नहीं।
और नीचे की पटरी बदल दी गई थी, क्योंकि पुरानी में दरार थी। यह चार-पाँच घंटे का काम है।
इसे करने के लिए आदमी को पेटी खोलनी पड़ती है, नाप लेनी पड़ती है, लकड़ी काटनी पड़ती है, और यह सब उस चीज़ पर करना पड़ता है जिसकी बाज़ार में क़ीमत तीस रुपये है। रेखा उस शाम काफ़ी देर तक उस पेटी के पास बैठी रही।
उसने अपने बाप को उस तरह की गुटकियाँ लगाते बचपन से देखा था और वह उन्हें पहचानती थी। उसके बाद भी वह गाँव नहीं गई और उसे बुलाया भी नहीं गया। अगले जून में ग्यारहवीं पेटी गई और उससे अगले में बारहवीं, और वे भी बिना नाम के गईं।
बेचन ने आज तक इस पर एक शब्द नहीं कहा। न बेटी से, न दामाद से, न अपनी पत्नी से। वह पेटी लखनऊ वाले घर में है।
उसमें जाड़ों के रज़ाई-गद्दे रखे जाते हैं और गर्मियों में वह पलंग के नीचे चली जाती है। रेखा उसे हर बरस झाड़-पोंछकर धूप दिखाती है और उसके चारों कोनों की वे तिकोनी गुटकियाँ अब भी उतनी ही कसी हुई हैं, और उस पेटी में आज तक एक भी आम नहीं रखा गया।