हरदोई वाली सड़क से जब बाईपास निकला, तब उस बाज़ार की तेईस दुकानें बैठ गईं। दिनेश की साइकिल के पुर्ज़ों की दुकान उनमें से एक थी। यह किसी की ग़लती नहीं थी। सड़क सरकार ने बदली, ट्रक उधर से जाने लगे, और जो बाज़ार ट्रकों से चलता था वह दो बरस में ख़ाली हो गया।
दुकान उसने तीसरे बरस बेच दी। उस पैसे से क़र्ज़ चुका और कुछ नहीं बचा। इसके बाद जो हुआ, वह उस घर का अपना मामला है और उसमें कुछ भी अनोखा नहीं है। दिनेश पीने लगा। वह मारपीट करने वाला आदमी नहीं था और उसने कभी हाथ नहीं उठाया, और यह बात कहनी ज़रूरी है क्योंकि इसके बिना बाक़ी सब ग़लत समझा जाएगा।
वह चुप हो जाता था।
कभी-कभी चार-चार दिन। घर में रहता था, खाना खाता था, और किसी से एक शब्द नहीं बोलता था, और बच्चे उसके सामने से निकलना छोड़ देते थे। और जब बोलता था तो काटकर बोलता था। मालती ने यह दो बरस झेला।
फिर एक दिन वह चली गई। दोनों बच्चों के साथ, बस से, अपनी माँ के घर।
जाने का दिन उसने चुना नहीं था। वह चौथी बार का चौथा दिन था और उस दिन बड़े लड़के ने स्कूल की एक बात बताई और दिनेश ने उसे बीच में ही चुप करा दिया। मायका बीस किलोमीटर पर है और उसमें उसका भाई और भाभी रहते हैं।
वह सात महीने वहाँ रही। उन सात महीनों में उसने सिलाई का काम पकड़ा और महीने के तीन-चार हज़ार बनाने लगी, और यह बात आगे काम आई। दिनेश पाँचवें महीने में आया। वह अकेला आया था और उसने घर के बाहर से ही कहा कि चलो।
मालती ने मना कर दिया। उसने कोई बहस नहीं की और कोई शिकायत नहीं गिनाई। उसने बस कहा कि नहीं, और दरवाज़े से हट गई। दिनेश उस दिन लौट गया। सातवें महीने में वह फिर आया। बरसात थी और वह भीगा हुआ था।
इस बार वह अंदर बैठा। मालती का भाई भी बैठा और यह मालती ने ही चाहा था, क्योंकि उसे इस बात के गवाह चाहिए थे। उसने बच्चों की कापी से एक पन्ना फाड़ा। उस पर उसने दो लाइनें लिखीं। पहली यह कि दुकान का, कमाई का और ख़र्च का हिसाब वाली कापी उसके पास रहेगी और पैसा उसके हाथ से निकलेगा।
दूसरी यह कि जिस दिन वह पीकर आएगा, उस रात वह घर में नहीं सोएगा। दूसरी वाली में उसने जगह भी लिख दी। लिखा कि उस रात वह गैरेज में सोएगा और सुबह आ जाएगा और उस पर कोई बात नहीं होगी।
इसमें कहीं यह नहीं लिखा था कि पीना छोड़ दो।
मालती को मालूम था कि वह लिखने से छूटता नहीं। और यह भी कि जो चीज़ माँगी ही न जा सके, उसे शर्त बना देने से सिर्फ़ झूठ पैदा होता है। इसलिए उसने वह माँगा जो वह दे सकता था।
दिनेश ने पन्ना पढ़ा और काफ़ी देर तक हाथ में लिए बैठा रहा। फिर उसने नीचे अपना नाम लिख दिया। उसके भाई ने भी नीचे लिख दिया, बिना कहे, और यह उस काग़ज़ की सबसे बेकार लाइन थी और सबसे ज़रूरी भी।
मालती अगले हफ़्ते लौट गई। बच्चों के साथ जो हुआ, उसका ज़िक्र यहाँ ज़रूरी है, क्योंकि लौटने से सब ठीक नहीं होता। बड़ा लड़का उस वक़्त ग्यारह का था और उसने लौटने के बाद अपने बाप से लगभग एक बरस बात नहीं की।
वह उसके सामने से निकल जाता था और पूछने पर हाँ या ना में जवाब दे देता था, और वह ठीक वैसा ही था जैसा दिनेश उन दो बरसों में किया करता था। दिनेश ने इस पर कभी नाराज़गी नहीं दिखाई।
उसने उस लड़के की साइकिल हर इतवार को खोलकर साफ़ की, पूरे एक बरस, और लड़के ने कभी मना नहीं किया और कभी शुक्रिया भी नहीं कहा। वह बात कब पटरी पर आई, यह घर में किसी को याद नहीं।
दुकान वापस नहीं आई। दिनेश ने दूसरे के गैरेज में काम पकड़ा, मिस्तरी का, जो अपनी दुकान चला चुके आदमी के लिए उतरना ही कहलाता है। वह हर सुबह वहाँ जाता है और शाम को लौटता है और अब वह चुप नहीं होता।
मालती की सिलाई भी चलती रही और अब उसके पास दो मशीनें हैं। इसे नौ बरस हो गए हैं। इन नौ बरसों में दिनेश चौदह बार गैरेज में सोया है।
मालती ने गिना है। उसने कभी बताया नहीं कि गिना है और दिनेश को यह मालूम है कि वह गिनती है, और यह भी उन दोनों के बीच कभी कहा नहीं गया। चौदह में से आख़िरी बार तीन बरस पहले था।
बड़ा लड़का अब बाहर पढ़ रहा है और छोटी दसवीं में है, और घर वैसा नहीं है जैसा उन दो बरसों में था, और कोई यह नहीं कहता कि सब ठीक हो गया।
वह पन्ना अब भी है।
अलमारी में, कपड़ों के नीचे, एक पुराने लिफ़ाफ़े में तह करके रखा हुआ। नौ बरस में उसे किसी ने खोलकर नहीं पढ़ा और किसी ने फाड़ा भी नहीं, और दोनों को याद है कि उस पर क्या लिखा है, इसलिए पढ़ने की ज़रूरत कभी पड़ी ही नहीं।