उस ढाबे पर जाने वाले कहते थे कि खाना अच्छा है और लड़ाई उससे अच्छी। यह मुरैना वाली सड़क पर है, पेट्रोल पंप से आगे। बुद्धिराम और अनारो ने उसे इकतीस बरस चलाया और उन इकतीस बरसों में शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो जिसमें वे दोनों किसी बात पर न लड़े हों।

और लड़ाई अंदर नहीं होती थी। बाहर होती थी। चारपाइयों के बीच, दस-बारह ड्राइवरों के सामने, पूरी आवाज़ में। झगड़े की बातें भी बड़ी नहीं होती थीं। दाल में नमक। छुट्टे पैसे। तवा किसने ठंडा छोड़ा। अनारो का भाई पिछली बार कितने दिन रुका। बुद्धिराम की माँ ने अट्ठाईस बरस पहले क्या कहा था।

उसमें गाली नहीं होती थी और मार तो कभी नहीं।

बस दोनों ऊँचा बोलते थे और एक-दूसरे की बात बीच में काटते थे और आख़िर में कोई एक चुप हो जाता था, और चुप वही होता था जिसे रसोई में जाना होता था।

ड्राइवर इसके आदी हो चुके थे।

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कुछ तो इसीलिए रुकते थे। आगरा से ग्वालियर की उस लाइन पर बीस ढाबे हैं और उनका खाना एक जैसा है, और आदमी वहाँ रुकता है जहाँ उसे कुछ सुनने को मिले। एक ड्राइवर ने उसका नाम ही लड़ाई वाला ढाबा रख दिया था और वह नाम चल निकला।

बुद्धिराम को दौरा उस बरस सावन में पड़ा। रात के ग्यारह बजे थे और आख़िरी ट्रक निकल चुका था और वह चूल्हे के पास बैठा था। अनारो ने पहले सोचा कि गैस है। यह ग़लत सोचना उस उम्र में बहुत लोग सोचते हैं।

आधे घंटे बाद वह घबराई और उसने सामने के ट्रक वाले को जगाया। ग्वालियर पहुँचने में डेढ़ घंटा लगा और वह बच गया, और डॉक्टर ने कहा कि आधा घंटा और लगता तो नहीं बचता। चार महीने वह ढाबे पर नहीं गया।

अनारो ने अकेले चलाया। दो लड़के काम पर रखे और दोनों वक़्त ख़ुद खड़ी रही। खाना वैसा ही रहा। कोई कमी नहीं आई। पर वह ढाबा उन चार महीनों में चुप हो गया। यह बात छोटी लगती है और वहाँ बैठने वालों को बहुत बड़ी लगी।

वहाँ अब सिर्फ़ बर्तन की आवाज़ थी और चूल्हे की, और सड़क से गुज़रते ट्रकों की, और आदमी खाकर उठ जाता था। उन चार महीनों में अनारो ने एक नई चीज़ शुरू की। उसने रसोई में रेडियो रख लिया और उसे दिन भर चलता छोड़ने लगी।

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इकतीस बरस में उसने वहाँ कभी रेडियो नहीं चलाया था, क्योंकि उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी थी। तीसरे महीने में एक ड्राइवर ने कह ही दिया। वह पुराना था, बीस बरस से आ रहा था, और उसने खाते-खाते कहा कि माई, लड़ती काहे नहीं आजकल।

उसने यह हँसकर कहा था और उसकी नीयत में कुछ नहीं था। अनारो ने इसका जवाब नहीं दिया। वह बर्तन उठाकर अंदर चली गई और काफ़ी देर तक बाहर नहीं आई, और वह ड्राइवर अपना खाना ख़त्म करके पैसे चारपाई पर रखकर चला गया।

बुद्धिराम नवंबर में लौटा।

वह पतला हो गया था और डॉक्टर ने कह रखा था कि खड़ा नहीं रहना है और वज़न नहीं उठाना है और गुस्सा नहीं करना है।

पहली दोनों बातें मानी गईं।

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उसके लिए गल्ले के पास एक कुर्सी लगा दी गई और वह वहीं बैठने लगा, और यह उस आदमी के लिए इकतीस बरस में पहली बार था कि वह ढाबे पर बैठा हो। रेडियो उसने बुद्धिराम के लौटने वाले दिन बंद कर दिया और उसके बाद उसे कभी नहीं चलाया, और वह आज भी रसोई के आले में वहीं रखा है।

लौटने के दिन दोपहर में सात-आठ ड्राइवर थे। अनारो दाल की बाल्टी लेकर निकली और उसने आते ही ज़ोर से कहा कि इसमें नमक किसने डलवाया था। बुद्धिराम ने कुर्सी से ही जवाब दिया। उसने कहा कि जिसने कड़ाही चढ़ाई थी उसी ने डाला होगा, और यह उसने पूरी आवाज़ में कहा, और गला अभी कमज़ोर था फिर भी पूरी आवाज़ में कहा।

अनारो ने कहा कि कड़ाही तो तुम्हारी माँ चढ़ाती थी। बुद्धिराम ने कहा कि माँ को बीच में मत लाओ। अनारो ने कहा कि इकतीस बरस से तुम्हीं लाते हो। वहाँ बैठे ड्राइवरों में वही पुराना वाला भी था। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस सिर नीचे किया और अपनी थाली में देखता रहा और मुस्कुराता रहा, और उसने उस दिन दो रोटी ज़्यादा खाईं।

बुद्धिराम अब गल्ले पर ही बैठता है और अनारो रसोई सँभालती है।

उनकी लड़ाई आज भी उतनी ही ज़ोर की होती है और उसमें एक चीज़ बदल गई है, जो शायद उन दोनों ने तय नहीं की और अपने आप हो गई।

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अब जो आख़िर में चुप होता है, वह हमेशा अनारो होती है। वह बात बीच में छोड़कर रसोई में चली जाती है, चाहे जीत रही हो। और उस कुर्सी के पीछे दीवार पर एक कील ठुकी है जिस पर उसकी दवाइयों का झोला टँगा रहता है, और वह झोला हर सुबह अनारो उतारकर देखती है और वापस टाँग देती है, और यह वह लड़ते-लड़ते करती है।