वह घर बाईस बरस में बना था। यह कहने का ढंग नहीं है। यह हिसाब है।

दो हज़ार तीन में दो कमरे बने थे, खपरैल के। दो हज़ार ग्यारह में छत पड़ी। दो हज़ार उन्नीस में ऊपर का हिस्सा बना, जिसमें एक कमरा और छज्जा है। बीच के बरसों में सीढ़ी बनी, नल आया, आँगन में फ़र्श पड़ा।

वीरेंद्र ने इसमें अपना हाथ भी लगाया था। मज़दूरी बचाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि वह ऐसा ही आदमी है। हरदा के उस मुहल्ले में उनके जैसे बाईस घर हैं और सब इसी तरह बने हैं। बाईपास का सर्वे तेईसवें बरस हुआ।

नक़्शे पर एक लाल लकीर खिंची और वह उस मुहल्ले की उस क़तार के ऊपर से गुज़री। छह घर उसमें आए। उनका तीसरा था। मुआवज़ा आठ लाख बीस हज़ार तय हुआ। यह रकम कलेक्टर दर से बनी थी। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकारी दर और बाज़ार की दर में उस इलाक़े में ढाई गुने का फ़र्क़ था।

उतना ही घर उसी शहर में दोबारा बनाने में उन्नीस लाख लगते। वीरेंद्र ने लड़ने का तय किया। उसी हफ़्ते। उसने वह सब किया जो किया जाता है। एसडीएम के दफ़्तर के चक्कर, आपत्ति दाख़िल, वकील, और मुहल्ले के लोगों की एक समिति जिसका नाम भी रखा गया।

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पार्वती इसके ख़िलाफ़ थी। शुरू से। उसका कहना यह था कि पैसा लेकर हट जाओ। उसकी उम्र अड़तालीस थी और वीरेंद्र की इक्यावन और घर में एक लड़की थी जिसकी शादी करनी थी। उसका कहना था कि तीन बरस मुक़दमे में जाएँगे और वे तीन बरस हमारे पास हैं ही नहीं।

इस पर घर में नौ महीने खिंचाव रहा।

यह वह खिंचाव नहीं था जिसमें लोग बात करना बंद कर देते हैं। बात होती रही और रोज़ होती रही और उसी बात पर होती रही, जो ज़्यादा थकाने वाला होता है। उन नौ महीनों में वीरेंद्र ने अठारह बार एसडीएम दफ़्तर के चक्कर लगाए।

पार्वती चार बार साथ गई। सिर्फ़ चार। और उन चार बार में उसने वह देखा जिसने बाद में सब बदल दिया। उसने अपने आदमी को धूप में खड़े देखा। बरामदे में, दो घंटे, और फिर बुलावा नहीं आया। उसने यह भी सुना कि अंदर उससे किस तरह बात की गई।

नौवें महीने में वीरेंद्र वकील के यहाँ फ़ाइल देखने बैठा। उस बाईपास पर उसी तरह के मामले पहले भी लड़े जा चुके थे और उनका हिसाब सामने था। छह में से जिन दो ने पहले ले लिया था, उन्हें आठ मिले।

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जिन चार ने लड़ा, उन्हें चार बरस बाद ग्यारह फ़ीसदी ज़्यादा मिला। चार बरस में ग्यारह फ़ीसदी का मतलब कुछ नहीं होता। मकान बनाने का ख़र्च उन्हीं चार बरसों में उससे ज़्यादा बढ़ जाता है। वीरेंद्र उस दिन घर आया और उसने कहा कि ले लेते हैं।

और पार्वती ने मना कर दिया। यह अचानक नहीं था। यह नौ महीने में बना था और उसने ख़ुद इसे तब समझा जब उसने कह दिया।

उसकी वजह पैसा नहीं थी।

उसने इतना कहा कि तुमने नौ महीने वहाँ खड़े होकर काटे हैं और अब जाकर हाँ कह दोगे तो वे यही समझेंगे कि थक गया। वीरेंद्र ने कहा कि समझने दो। पार्वती ने कहा कि मुझे नहीं समझने देना। इस पर वे दोनों तीन हफ़्ते और अटके रहे और इस बार जगहें उलटी थीं।

आख़िर में उन्होंने पैसा ले लिया। तेईसवें बरस के आख़िर में। यह फ़ैसला वीरेंद्र का था और पार्वती ने उसे माना, क्योंकि उसने कहा कि तुम ठीक कह रही हो और फिर भी हम यह नहीं कर सकते। यह सही फ़ैसला था और उस दिन दोनों को हारने जैसा लगा, और दोनों बातें एक साथ सच थीं।

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तारीख़

मकान गिराने का दिन फागुन में पड़ा। वे लोग सुबह छह बजे ही सामान हटा चुके थे और मशीन नौ बजे आई और उसमें कुल चालीस मिनट लगे। बाईस बरस, चालीस मिनट। नया मकान शहर के दूसरे सिरे पर बना। छोटा, एक मंज़िल का, और उसमें आँगन नहीं है।

पुराने मकान से जो चीज़ें निकाली गईं, वे वही थीं जो निकाली जाती हैं। खिड़कियों के लोहे के जँगले, दो दरवाज़े, बिजली का सामान, और सीढ़ी की रेलिंग। और एक चौखट। सिर्फ़ एक। वह सागौन की है और वीरेंद्र ने उसे दो हज़ार तीन में बनवाया था।

लकड़ी उसने वन विभाग की नीलामी से ख़रीदी थी और बढ़ई घर पर बैठाकर बनवाई थी, और उस पर उसने उस वक़्त छियालीस सौ रुपये लगाए थे, जो उस बरस उसकी दो महीने की कमाई थी। नए मकान में उसे लगाना आसान नहीं था।

आजकल के दरवाज़े की चौड़ाई अलग होती है और वह चौखट दो इंच सँकरी पड़ रही थी। इसका सीधा हल यह था कि उसे छोड़ दिया जाए। दूसरा हल यह था कि उसे काटकर चौड़ा किया जाए, जो सागौन में हो जाता है और उसके बाद जोड़ दिखता है।

वीरेंद्र ने तीसरा किया। जो किसी ने नहीं सुझाया था। उसने राजमिस्त्री से कहकर दरवाज़े की जगह ही सँकरी करवा दी। यानी नए मकान का बीच वाला दरवाज़ा बाक़ी सब दरवाज़ों से दो इंच सँकरा है और उसमें बाईस बरस पुरानी चौखट लगी है।

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मिस्त्री ने उससे कहा भी था कि यह ठीक नहीं लगेगा। वीरेंद्र ने कहा कि लगने दो। उनकी लड़की की शादी उसके अगले बरस हुई।

उसका सामान जब घर से निकाला गया तो अलमारी उस दरवाज़े से नहीं निकली। उसे खिड़की के रास्ते उतारना पड़ा और उसमें चार आदमी और आधा घंटा लगा। उस दिन घर में बहुत लोग थे और इस पर कोई कुछ नहीं बोला, पार्वती भी नहीं।