अलमारी का बायाँ हिस्सा फरवरी के आख़िरी हफ़्ते में ख़ाली हो गया था। मृदुला ने अपने कपड़े दो बैगों में रखे और बैग नीचे वाले ख़ाने में डाल दिए, ताकि कमरे में वे दिखें नहीं। बाक़ी सब वैसा ही चलता रहा। खाना, दफ़्तर, दवाई, बिजली का बिल।

तय इतना हुआ था। इकतीस मार्च के बाद।

कमरा उसने ढूँढ़ भी लिया था। हरमू में, एक मकान की ऊपरी मंज़िल पर, दो कमरे और एक रसोई, जिसमें धूप सिर्फ़ दोपहर को आती है। मालिक ने कहा था कि पहली अप्रैल से मिल जाएगा। पेशगी दी जा चुकी थी। यह सब उसने बिरेंद्र को उसी शाम बता दिया था, और बिरेंद्र ने कहा था कि ठीक है।

जनवरी में एक रात मृदुला ने कहा था कि वह अलग रहना चाहती है। उसने यह ग़ुस्से में नहीं कहा था। झगड़ा नहीं हुआ। बिरेंद्र ने रोका भी नहीं, उसने सिर्फ़ इतना माँगा कि इकतीस मार्च तक रुक जाओ।

यह उसने किसी उम्मीद में नहीं माँगा था। मार्च के आख़िरी पंद्रह दिन उसके बरस के सबसे बड़े दिन होते हैं, और उन दिनों घर में कुछ और चल रहा हो तो काम नहीं होता।

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बिरेंद्र इक्कीस बरस से बीमा का काम करता था। कमाई कमीशन की थी। कुछ महीने बहुत आती थी और कुछ महीने कुछ भी नहीं। साल मार्च में बंद होता है, और जो लोग उस बरस एक तय रक़म तक पहुँच जाते हैं उनका नाम एक सूची में चढ़ता है। वे लोग उसे क्लब कहते हैं। उससे दफ़्तर में कुर्सी मिलती है और अगले बरस काम थोड़ा आसान हो जाता है।

हर बरस मार्च में वह कहता था कि इस बार क्लब हो जाएगा।

ग्यारह बरस से यही वाक्य था।

मृदुला रिम्स के पास एक जाँच घर में तकनीशियन थी। तनख़्वाह पक्की थी। हर महीने की सात तारीख़ को आती थी और घर उसी से चलता था। इससे उसे शिकायत कभी नहीं रही, और उसने इसका ज़िक्र भी कभी नहीं किया, न मायके में, न बाहर।

जनवरी में उसने जो कहा वह यह था कि पिछले ग्यारह बरसों में अप्रैल के पहले हफ़्ते में उसने एक ही चेहरा देखा है, और अब वह उसे और नहीं देखना चाहती।

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बिरेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया। यह सही था।

पंद्रह मार्च से वह सुबह आठ बजे निकलने लगा। पुराने लोगों की बंद पड़ी पॉलिसी दोबारा चालू करानी थी, दो स्कूलों के शिक्षकों से बात करनी थी, और हटिया की तरफ़ एक ठेकेदार था जो हर बरस टालता था और हर बरस आख़िर में कर देता था। दिन में वह ऑटो से चलता। शाम को पैदल। जो घर पास-पास हैं, उनमें ऑटो का किराया बेकार जाता है।

सरहुल उन्हीं दिनों पड़ा और चैत शुरू हो चुका था। मेन रोड और कचहरी की तरफ़ दो दिन जुलूस रहा और उधर से निकलना मुश्किल हो गया। उन दो दिनों में वह कांके की तरफ़ गया, क्योंकि उधर जुलूस नहीं जाता। रास्ते भर पलाश लाल था। उसने उसे देखा नहीं।

घर में वे दोनों रोज़ मिलते रहे। वह देर से लौटता और खाना ढँका रखा मिलता। दोनों एक ही कमरे में सोते रहे। दूसरा कमरा नहीं था।

एक रात उसने पूछ लिया कि कितना बचा है। उसने बताया कि दो लाख अस्सी हज़ार। मृदुला ने उस पर कुछ नहीं कहा। अगली सुबह जाने से पहले उसने अपने जाँच घर के तीन लोगों के नंबर उसे दे दिए, और इतना कहा कि कह देना मैंने भेजा है।

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अट्ठाईस को वह रात एक बजे लौटा। उनतीस को वह लौटा नहीं। वह बोकारो चला गया था और वहीं किसी के यहाँ रुक गया। तीस की सुबह फ़ोन आया, और उसने बताया कि दो हो गए हैं और एक बाक़ी है।

तीस मार्च की रात साढ़े ग्यारह बजे उसने दरवाज़ा खटखटाया, अंदर आकर बैठ गया, और कहा कि हो गया।

मृदुला ने पानी का गिलास दिया। उसने पूछा कि कितने से हुआ। सत्रह हज़ार ऊपर।

फिर दोनों बैठे रहे। बिरेंद्र ने उस रात यह नहीं कहा कि अब रुक जाओ। मृदुला ने यह नहीं कहा कि अब भी जाऊँगी। दोनों में से किसी ने अलमारी की तरफ़ नहीं देखा।

इकतीस को दफ़्तर में हिसाब बंद होता है। वह सुबह गया और शाम को लौटा और बताया कि सूची में उसका नाम आ गया है। उस शाम खीर बनी। घर में कुछ न कुछ तो बनना ही था।

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पहली अप्रैल को नया बरस शुरू होता है और उस दिन भी काम होता है, क्योंकि जो पॉलिसी कल नहीं बनी वह आज बनती है। वह नौ बजे निकल गया।

उस घर में रज़ाइयाँ पहली अप्रैल को ऊपर जाती हैं। ऐसा कोई नियम बना नहीं था, बस अठारह बरस से यही चलता आया था। उस दोपहर मृदुला ने दोनों रज़ाइयाँ छत पर धूप में डालीं, शाम को उतारीं, तह कीं, और अलमारी के सबसे ऊपर वाले ख़ाने में रख दीं। नीचे बायाँ हिस्सा वैसे ही ख़ाली पड़ा था और उसमें दोनों बैग वैसे ही रखे थे, और उस तरफ़ का पल्ला अब ठीक से बंद नहीं होता, क्योंकि अंदर उसे रोकने के लिए कुछ है ही नहीं।