कदमा को महीने की तेरह तारीख़ से पहले निकलना पड़ता था और यह तारीख़ उसने ख़ुद नहीं चुनी थी।

साहूकार का हिसाब महीने की पंद्रह को बैठता था। जो उससे पहले आ गया वह उस महीने में गिना जाता, और जो नहीं आया वह अगले महीने में चला जाता और उस पर ब्याज चढ़ जाता। कदमा को वसूली का सोलहवाँ हिस्सा मिलता था। जो वसूल नहीं हुआ, उसका उसे कुछ नहीं मिलता था।

इस काम में सबसे मुश्किल हिस्सा दरवाज़े पर पहुँचना नहीं है। सबसे मुश्किल हिस्सा यह तय करना है कि किस दरवाज़े पर जाना है।

कदमा के पास एक झोला था और उसमें एक कच्ची बही थी, जिसमें उसने अपने हिसाब से लोगों को तीन तरह में बाँट रखा था। जो दे देंगे। जो टालेंगे पर आख़िर में दे देंगे। और जिनके पास है ही नहीं।

तीसरे वालों पर वह समय ख़र्च नहीं करता था। यह बेरहमी नहीं थी। जिसके पास नहीं है उससे बैठकर बात करने में पूरा दिन जाता है और हाथ कुछ नहीं आता, और उस दिन के दूसरे चार दरवाज़े छूट जाते हैं।

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वह घर उसकी बही में तीसरे वालों में था और तीन महीने से था।

उस महीने वह वहाँ इसलिए गया कि साहूकार ने ख़ुद कहा। कहा गया कि जाकर देखो और जो मिले ले आओ, बरतन भी चलेगा।

जेठ का महीना था और वह दोपहर बाद पहुँचा, क्योंकि रास्ता लंबा था।

घर बड़ा था और उसी से समझ आता था कि पहले कुछ रहा होगा। अब उसमें दरवाज़े नहीं थे, यानी लकड़ी निकल चुकी थी। आँगन में एक भी बरतन उलटा हुआ नहीं रखा था, जो कदमा के लिए सबसे साफ़ इशारा होता है, क्योंकि खाना बनने वाले घर में कुछ न कुछ धुला हुआ उलटा पड़ा रहता है।

भीतर लोग थे और वे कम बोल रहे थे।

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जो आदमी बाहर आया वह पतला था, इतना कि कदमा ने पहले उसे बीमार समझा। बाद में उसे बताया गया कि उस घर में उस दिन अड़तालीसवाँ दिन था। यह उसने वहीं आँगन में खड़े-खड़े सुना और उस वक़्त उसे इसका मतलब पूरा समझ नहीं आया।

उसने अपना काम शुरू किया। उसने वही कहा जो वह हर जगह कहता था, कि साहूकार का इतना बाक़ी है और आज तेरह है।

आदमी ने उसकी बात पूरी सुनी और उससे बहस नहीं की। उसने यह भी नहीं कहा कि थोड़ा और वक़्त दे दो, जो हर कोई कहता है। उसने सिर हिलाया और भीतर की तरफ़ आवाज़ दी कि बाहर कोई आया है।

और उसके बाद वहाँ जो हुआ, उसके लिए कदमा तैयार नहीं था।

उसके सामने पानी रखा गया और फिर खाना रखा गया।

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उस दिन उस घर में जो बना था, वह उस पूरे महीने में पहली बार बना था। कितना बना था, यह कदमा को नहीं बताया गया और उसने देखकर अंदाज़ा लगाया, और उसका अंदाज़ा यह था कि एक आदमी के लिए भी पूरा नहीं है।

उसने मना किया।

उससे कहा गया कि दरवाज़े पर आया हुआ आदमी भूखा नहीं जाता, और यह बात इतने सीधे ढंग से कही गई कि उसमें कोई एहसान नहीं था।

कदमा उस वक़्त सुबह से चल रहा था और उसने कुछ नहीं खाया था, क्योंकि उस दिन उसे पाँच जगह जाना था और उसने सोचा था कि लौटते में खा लेगा।

उसने खा लिया।

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वह इस बारे में बाद में अपने आप से बहुत बार बात करता रहा और हर बार उसे यही समझ आया कि उसने यह भूख की वजह से खाया, किसी ऊँची बात की वजह से नहीं। वह भूखा था और सामने खाना था और उसने खा लिया।

खाने के बाद वह वसूली नहीं कर सका।

यह कोई फ़ैसला नहीं था। जिस घर में आदमी खा ले, उस घर से वह उसी दिन बरतन उठाकर नहीं ला सकता। यह लिखा हुआ क़ायदा नहीं है और इसे तोड़ने वाले भी होते हैं, पर कदमा उनमें नहीं था।

उस दिन उस आँगन में और भी लोग आए। एक के बाद एक। कदमा उन्हें आते हुए देखता रहा, बहुत देर तक, बिना उठे।

उसने साहूकार से जाकर कह दिया कि उस घर से कुछ नहीं आएगा।

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साहूकार ने पूछा कि बरतन। कदमा ने कहा कि बरतन भी नहीं। इस पर उससे कुछ नहीं कहा गया, पर उस रक़म का सोलहवाँ हिस्सा उसकी उस महीने की कमाई में से काट लिया गया, जो क़ायदे के हिसाब से ठीक था।

यह उसकी पूरी नौकरी का इकलौता ऐसा दिन नहीं था। ऐसे दिन और भी आए और कई बार उसने वसूल भी किया, उन घरों से भी जिनके पास नहीं था। वह अपने काम में अच्छा था और उसने उसे सोलह बरस और किया।

एक बात उसने उसी दिन तय कर ली और उसे कभी नहीं तोड़ा।

वह किसी दरवाज़े पर कुछ नहीं खाता। पानी भी नहीं। उसने अपने झोले में एक कपड़े की पोटली रखनी शुरू कर दी और उसमें सुबह की दो रोटियाँ और थोड़ा नमक रहता है।

जिस गाँव में जाना हो, उससे थोड़ा पहले वह रुकता है, किसी पेड़ के नीचे या किसी मेड़ पर बैठता है, और वह खा लेता है। दोपहर तक वे रोटियाँ ठंडी और सख़्त हो चुकी होती हैं और बरसात में कई बार सीली भी। वह उन्हें वैसे ही खा लेता है, बिना पानी के, और उसके बाद ही भीतर जाता है।