बाज़ किसी का नहीं होता। वह उसके पास रहता है जो उसे खिलाता है।
नन्हकू यह बात नए लोगों को पहले दिन बता देता था और वे इसे अच्छी बात समझकर हँस देते थे। यह अच्छी बात नहीं थी। यह उसके काम की सबसे डरावनी बात थी।
उसका पूरा घर उस एक पक्षी पर था।
दस्ताना उसके बाएँ हाथ पर रहता था और वह चमड़े की चार तहों का था। पहला उसने ख़ुद सिया था और वह अब तीसरा था। उस पर पंजों के निशान इतने गहरे थे कि चमड़ा वहाँ से चिकना हो गया था।
पक्षी को भूखा रखना पड़ता है और यही इस काम की जड़ है।
जो भरा हुआ है वह नहीं झपटेगा। जो ज़्यादा भूखा है वह मार तो लेगा, पर वापस नहीं आएगा, क्योंकि वह वहीं बैठकर खा लेगा और जिस दिन उसने अपने मारे हुए को अपने हिसाब से खा लिया, उस दिन से वह अपना हो जाता है और आपका नहीं रहता।
बीच का यह रास्ता नन्हकू ग्यारह बरस से निकाल रहा था और उसमें ग़लती की गुंजाइश आधे दिन की होती है।
उस दिन वे बाहर थे और शिकार जल्दी हो गया।
पक्षी ने एक कबूतर लिया। ठीक लिया, ऊपर से, और उसे लेकर वह नीचे नहीं बैठा बल्कि नन्हकू की तरफ़ लौटा, जो सबसे अच्छी बात होती है और जिसके लिए बरसों लगते हैं।
फिर कबूतर छूट गया।
यह होता है। पंजा फिसलता है और घायल पक्षी नीचे चला जाता है। कबूतर आँगन की तरफ़ गिरा, जहाँ लोग बैठे हुए थे।
उसके बाद जो हुआ, उसे नन्हकू ने पूरा देखा और वह उसे अब तक ठीक से नहीं समझ पाया।
जो आदमी वहाँ बैठा था, उसने कबूतर उठा लिया और अपने कपड़े में रख लिया।
नन्हकू ने वही किया जो उसे करना था। उसने आगे बढ़कर कहा कि यह उसके पक्षी का है और उसे वापस चाहिए। यह माँगना नहीं था। यह क़ायदा है और शिकार के हर मैदान पर यही चलता है।
आदमी ने उसे देने से मना कर दिया।
फिर उसने वह बात कही जिससे पूरा दिन ख़राब हुआ। उसने कहा कि वह इसके बदले कुछ और देगा।
तराज़ू मँगवाया गया।
यहाँ से वह चीज़ शुरू हुई जिसे नन्हकू आज तक शिकार का हिस्सा नहीं मानता। एक तरफ़ कबूतर रखा गया और दूसरी तरफ़ उस आदमी ने अपनी तरफ़ से चीज़ें रखनी शुरू कीं, और वह पलड़ा नीचे नहीं गया, और फिर उसने और रखा, और फिर उसने वह करना शुरू किया जिसके बारे में बाद में सब बात करते रहे।
नन्हकू ने वह सब देखा और उसका ध्यान वहाँ नहीं था।
उसका ध्यान अपने हाथ पर था।
पक्षी दस्ताने पर बैठा था और वह हिल रहा था। वह पंजे बदल रहा था, बार-बार, जो बेचैनी का पहला निशान है। उसने दो बार पंख फुलाए और छोड़े। एक बार उसने चोंच से पट्टी खींची।
देखते-देखते दोपहर हो गई।
एक भूखे बाज़ के लिए दोपहर बहुत होती है। सुबह की उड़ान के बाद उसे खाना उसी वक़्त मिलना चाहिए, गरम, और वह मिल जाए तो सारी बात दिमाग़ में एक साथ बैठती है, कि झपटा, लौटा, मिला। बीच में जितना समय जाता है, वह जोड़ उतना ढीला होता है।
नन्हकू ने दो बार कहा कि पक्षी को कुछ दे दिया जाए, कुछ भी।
पहली बार उसे हाथ के इशारे से चुप कराया गया। दूसरी बार किसी ने सुना ही नहीं, क्योंकि तब तक वहाँ जो हो रहा था उसके सामने एक पक्षी की भूख कोई चीज़ नहीं थी।
मामला शाम को ख़त्म हुआ।
कैसे ख़त्म हुआ, इसकी बहुत सी बातें चलीं और उनमें से आधी नन्हकू को बढ़ी हुई लगीं, इसलिए वह अपनी तरफ़ से चुप ही रहा। उसे कबूतर लौटा दिया गया। उसने उसे अपने पक्षी के आगे डाल दिया।
पक्षी ने खा लिया।
पर वह ठंडा था और वह शाम थी और उसके बीच में नौ घंटे थे।
उस दिन के बाद वह पक्षी उड़ता रहा। वह लौटता भी रहा। नन्हकू ने उसे तीन बरस और रखा।
उसने दोबारा कभी नहीं मारा।
वह ऊपर जाता था, चक्कर लगाता था, और वापस दस्ताने पर आ बैठता था। शिकार उसके नीचे से निकल जाता था और वह उसके पीछे नहीं जाता था। नन्हकू ने सब आज़माया। भूख बढ़ाई, घटाई, जगह बदली, दूसरा मैदान लिया। कुछ नहीं हुआ।
उससे कई लोगों ने कहा कि इसे छोड़ दे और नया ले ले।
उसने नहीं छोड़ा और इसकी कोई बड़ी वजह उसके पास नहीं है। नया पक्षी लेने में दो बरस लगते हैं और उन दो बरसों में घर कैसे चलता, यह भी एक बात थी, और उसने बाद में मान लिया कि यह पूरी बात नहीं थी।
तीन बरस उसने उसे अपने हाथ से खिलाया।
यह वह चीज़ है जो इस काम में नहीं की जाती। हाथ से खिलाया हुआ पक्षी मरा हुआ पक्षी है, ऐसा उसके उस्ताद ने उससे कहा था। नन्हकू रोज़ शाम को माँस के टुकड़े काटता था और दस्ताने पर रखता था और वह उन्हें उठा लेता था।
दस्ताना उसी से घिसा। पंजों से नहीं, चोंच से। बीच वाली जगह पर चमड़ा पतला होकर फट गया और उसने वहाँ एक चौकोर टुकड़ा और सिल दिया, और उसके बाद उसने वह दस्ताना कभी नहीं बदला।