पालकी का सारा हिसाब क़दम का है और यह बात बाहर वाले को कभी समझ नहीं आती।
वज़न बँटा हुआ होता है और चार आदमी उसे आसानी से उठा लेते हैं। मुश्किल उठाने में नहीं है। मुश्किल यह है कि चारों एक ही पैर एक ही पल में आगे रखें। अगर एक भी आधा पल पीछे है, तो बाँह ऊपर-नीचे होने लगती है, और भीतर बैठे आदमी को लगता है कि वह नाव में है।
रामसुख उन्नीस बरस से आगे बाईं बाँह पर था। आगे वाला क़दम देता है और बाक़ी तीन उसे पकड़ते हैं। इसीलिए आगे वाले को सबसे ज़्यादा मिलता है और सबसे पहले पूछा जाता है।
उसके कंधे पर घट्टा था। हड्डी के ऊपर, हथेली भर का, इतना सख़्त कि उस पर चुटकी काटो तो पता न चले। यह उन्नीस बरस में बना था और वह इसे अपने काम का सबूत मानता था, जैसे किसी और के हाथ में कुदाल का निशान होता है।
उस सफ़र में उनका एक आदमी बीमार पड़ गया और रास्ते में ही छोड़ना पड़ा।
इस हालत में क़ायदा यही है कि पास के गाँव से कोई पकड़ लिया जाए। यह अच्छी बात नहीं है और रामसुख को यह कभी अच्छी नहीं लगी, पर पालकी रुक नहीं सकती, और इस बात का फ़ैसला उसका नहीं था।
जिसे लाया गया वह अधेड़ था और मोटा-ताज़ा था, कंधे चौड़े, और देखने में सबसे बेहतर विकल्प था। उसने कोई एतराज़ नहीं किया। उसने कुछ कहा ही नहीं।
पहला मील ठीक गया।
दूसरे मील में रामसुख के कंधे पर वह चीज़ आई जिसे वह पंद्रह बरस से पहचानता है। बाँह एक बार हल्की हुई और फिर लौटकर ठुकी। एक बार में कुछ नहीं होता। तीन बार में कमर पर पड़ता है। दिन भर में आदमी की चाल बिगड़ जाती है।
उसने पीछे देखे बिना आवाज़ दी कि दायाँ पहले।
अगले कुछ क़दम ठीक रहे और फिर वही हुआ।
रामसुख ने रुकवाया और नए आदमी को समझाया, धीरे और साफ़, जैसे वह हर नए को समझाता था। पैर देखकर मत चलो। सामने वाले की एड़ी देखो। एड़ी उठे तब उठाओ।
आदमी ने सिर हिलाया और फिर वही किया।
दोपहर तक रामसुख को ग़ुस्सा आ चुका था और उसने एक ऐसी बात कर दी जो पंद्रह बरस से उसने नहीं की थी। उसने आदमी को आगे कर दिया और ख़ुद पीछे चला गया, ताकि वह उसे देख सके।
और तब उसने देखा।
आदमी अपना पैर सीधा नहीं रख रहा था। वह हर बार, या लगभग हर बार, उसे ज़मीन पर रखने से पहले थोड़ा हटा लेता था। कभी दो उँगली दाएँ, कभी थोड़ा आगे। यह लड़खड़ाना नहीं था। यह बहुत साफ़ हरकत थी और वह हर बार जगह देखकर करता था।
नीचे देखने पर उसे वजह मिल गई।
भादों बीत रहा था और उस रास्ते पर बरसात के बाद वाली चीज़ें थीं। चींटियों की क़तार, जो उस मौसम में रास्ता काटती है। छोटे मेंढक, जितने उन दिनों हर जगह होते हैं। घोंघे।
यह देख लेने के बाद भी उसका ग़ुस्सा कम नहीं हुआ और उसे इस बात पर बाद में ख़ुद हैरानी हुई।
उसने आदमी से कहा कि इससे कुछ नहीं होता, इतने बचाने से कोई नहीं बचता, और चार आदमियों की पीठ इससे ज़्यादा क़ीमती है। आदमी ने इस पर भी कुछ नहीं कहा।
शाम को भीतर से आवाज़ आई।
रामसुख ने वह आवाज़ पहले भी सुनी थी, बहुत बार, अलग-अलग लोगों की। वह हमेशा एक ही तरह की होती है। पूछा गया कि कौन नया है और वह अपने आप को क्या समझता है।
नया आदमी उस वक़्त बोला, पहली बार, और बहुत देर तक बोला।
रामसुख ने वह सब नहीं सुना। इसकी वजह अदब नहीं थी। वजह यह थी कि पालकी उतारी जा चुकी थी और उसका अपना कंधा उस दिन बुरी तरह दुख रहा था, और वह ज़मीन पर बैठकर उसे दबा रहा था और उसके कान में अपनी ही साँस की आवाज़ थी।
उसने इतना देखा कि भीतर वाला बाहर आया।
और फिर उसने वह देखा जो उसने अपनी पूरी नौकरी में नहीं देखा था, और जिसके बारे में उसने बाद में कभी किसी को नहीं बताया, क्योंकि बताने पर लोग उससे और सवाल पूछते और उसके पास जवाब नहीं थे। भीतर वाला ज़मीन पर गया, उस आदमी के सामने, अपने पूरे कपड़ों में, धूल में।
उसके बाद वहाँ बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ।
पालकी वहीं छोड़ दी गई। कहारों को उसी शाम छुट्टी दे दी गई और मज़दूरी पूरे सफ़र की मिली, जो होनी नहीं चाहिए थी और मिल गई। रामसुख घर लौट आया।
उसे दोबारा बुलावा नहीं आया।
यह कोई सज़ा नहीं थी। उस तरफ़ से पालकी चलनी ही बंद हो गई और चार आदमियों को इसकी वजह किसी ने नहीं बताई। कुछ महीने वह इंतज़ार करता रहा, फिर उसने भाड़े पर बैल चलाना शुरू कर दिया, जो कम पैसे का काम है पर रोज़ का है।
जाड़े में उसे एक बात दिखी और वह उसे रोज़ दिखने लगी।
घट्टा नरम पड़ने लगा था। ऊपर की सख़्त परत हल्की-हल्की उतर रही थी और उसके नीचे की खाल पतली और चिकनी थी, और उस पर छूने से पता चलता था। जितने बरस में वह बना था, उसके सामने चार महीने कुछ भी नहीं थे।
वह उसे दिन में कई बार छूता है, बैल हाँकते हुए भी। अभी वह पूरा गया नहीं है। हड्डी के ठीक ऊपर एक छोटा सा हिस्सा अब भी सख़्त है, नाख़ून के बराबर, और उसे नहीं पता कि वह रहेगा या वह भी चला जाएगा।