चेतू के काम के बारे में लोग यह समझते थे कि वह कपड़ा सिलता है। कपड़ा सिलना उसके काम का आख़िरी हिस्सा था और सबसे आसान हिस्सा था। असल काम किताब का था।
उसके पास एक बही थी जिसमें दरबार के इकतालीस लोगों के नाप लिखे थे। छाती, बाँह, कंधा, कमर, गला, और नीचे एक हाशिया जिसमें वह वे बातें लिखता था जो नाप में नहीं आतीं। किसका बायाँ कंधा दाएँ से नीचा है। कौन झुककर चलता है, इसलिए पीछे की लंबाई ज़्यादा चाहिए। किसे कोहनी पर कसा हुआ पसंद नहीं।
नाप हर बार दोबारा लिए जाते हैं, चाहे आदमी वही हो। यह उसके उस्ताद का पहला सबक़ था। शरीर बदलता रहता है और आदमी को अपने बदलने का पता सबसे बाद में चलता है।
राजा के नाप वह अठारह बरस से रख रहा था और उन अठारह बरसों में जो हुआ था, वह वही था जो होना चाहिए। कमर साल में लगभग चौथाई अंगुल बढ़ी थी। पचास के बाद कंधा भीतर की तरफ़ आने लगा था, जो सबका आता है। बाँह चौबीस अंगुल पर पंद्रह बरस से टिकी हुई थी, क्योंकि बाँह की लंबाई नहीं बदलती। यही होना चाहिए था।
हाशिये में उसने बहुत पहले एक बात लिखी थी। बायाँ कंधा चौथाई अंगुल ऊँचा। यह जवानी में हँसली टूटने से हुआ था और ठीक से जुड़ने के बाद भी वहाँ एक उभार रह गया था। चेतू बाईं तरफ़ हमेशा चौथाई अंगुल ऊँचा काटता था और यह उसके सिवा किसी को मालूम नहीं था, राजा को भी नहीं।
उस जाड़े में उसे भारी कपड़े के लिए बुलाया गया।
उसने नाप लेकर अपनी बही खोली और दोनों को साथ रखकर देखा। फिर उसने बही बंद कर दी और नाप दोबारा लिए, क्योंकि उसे यक़ीन हो गया था कि उससे कहीं चूक हुई है।
दूसरी बार वही निकला।
तीसरी बार उसने गज़ बदल लिया, यह सोचकर कि लकड़ी का गज़ सीलन में थोड़ा फूल जाता है। तीसरी बार भी वही निकला।
कमर पौने चार अंगुल कम थी। कंधा सवा अंगुल भीतर आ चुका था। गला ढीला था, यानी वहाँ माँस बैठ गया था। और बाँह, जो पंद्रह बरस से नहीं हिली थी, आधा अंगुल छोटी थी। चारों जगह फ़र्क़ था।
बाँह छोटी नहीं होती। यह वह चीज़ है जो एक दर्ज़ी को उस्ताद पहले हफ़्ते में बता देता है। बाँह तब छोटी लगती है जब कंधा गिर जाए और कोहनी सीधी न हो, और वह बहुत बुढ़ापे में होता है, दस बरस में, पंद्रह बरस में।
राजा को उसने चार महीने पहले नापा था।
चेतू ने वहाँ कुछ नहीं कहा। उसने कपड़ा समेटा और अपनी कोठरी में आया और दरवाज़ा भेड़ लिया और बहुत देर तक बैठा रहा। फिर उसने वे नाप लिख दिए, क्योंकि न लिखना उसके बस में नहीं था। यह उसका काम था और उसने उन्नीस की उम्र से यही किया था। फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।
अगले दिन भंडार का अफ़सर उसकी कोठरी में आया, जो पहले कभी नहीं आया था। वह अकेला आया था।
उसने बही माँगी और पन्ना देखा और उसे कुछ देर देखता रहा। फिर उसने कहा कि सिलाई पुराने नाप पर होगी। चेतू ने बताया कि वह उतार आएगा। अफ़सर ने कहा कि नहीं उतरेगा, वही पुराने वाले चलेंगे। चेतू ने कहा कि तब वह पहनने लायक़ नहीं रहेगा। अफ़सर ने उसकी बात पूरी होने दी और फिर कहा कि वह तुम्हारा काम नहीं है।
फिर उसने वह पन्ना अपनी उँगली से दबाया और कहा कि यहाँ जो लिखा है वह ग़लत लिखा गया है और इसे ठीक कर लेना।
चेतू ने उसे ठीक कर लिया।
उसके बाद के बरसों में उसने वे कपड़े सिले जो नाप के नहीं थे। बड़े कपड़े छोटे शरीर पर एक ख़ास तरह से गिरते हैं और दर्ज़ी उसे दूर से पहचान लेता है। दरबार में कोई कुछ नहीं कहता था। उसे इसकी आदत पड़ गई, जैसी सबको पड़ गई थी, और वह इस बारे में सोचना कम करता गया। किसी ने नहीं पूछा।
जो उसने बंद नहीं किया वह यह था कि वह सही नाप भी लेता रहा। हर बार, चुपचाप, और उन्हें बही में नहीं, बही के गत्ते के भीतरी हिस्से पर बहुत छोटे अंकों में लिखता रहा। इसकी कोई वजह उसके पास नहीं थी। वह बस पैंतीस बरस से नाप लिख रहा था।
बरसों बाद उसे फिर बुलाया गया, इस बार बसंत के कपड़ों के लिए, और उसे पहले से बता दिया गया था कि नए नाप लेने हैं।
उसने नाप लिए और उसके हाथ रुक गए।
कमर वही थी जो अठारह बरस पहले थी। कंधा वही। गला वही। और बाँह चौबीस अंगुल थी, पूरी, जैसे उसने पहली बार लिखी थी। पूरी चौबीस।
इस बात के दो मतलब हो सकते थे और चेतू ने दोनों सोचे। दूसरा मतलब यह था कि यह कोई और आदमी है। दरबारों में ऐसा होता आया है और वह इतना भोला नहीं था कि यह उसके दिमाग़ में न आए।
उसने बाएँ कंधे पर हाथ रखा।
उभार वहीं था। उसी जगह, उसी नाप का, चौथाई अंगुल। वह चीज़ किसी और के बदन पर नहीं आ सकती थी, क्योंकि वह किसी और के शरीर की चीज़ नहीं थी। यह उसे मालूम था। वह एक पुरानी टूटी हुई हड्डी थी जो अपने तरीक़े से जुड़ी थी।
उसी महीने उसे युवराज पुरु के नाप लेने भेजा गया।
पुरु के नाप उसकी बही में थे और वे जवान आदमी के नाप थे। जो उसने उस दिन लिए वे किसी और के थे। कंधा गिरा हुआ, गला भरा हुआ, कमर पर वह ढीलापन जो साठ के बाद आता है।
चेतू उस दिन कोठरी में लौटा और उसने बही नहीं खोली। वह गत्ते के भीतर वाले हिस्से को देखता रहा, जहाँ उसके छोटे-छोटे अंक ऊपर से नीचे तक भरे हुए थे, और उसे समझ आ गया कि उसके पास पूरे दरबार में इकलौती वह चीज़ है जिसे कोई देखना नहीं चाहता।
साल भर बाद अफ़सर ने बही जलाने को कहा। चेतू ने कह दिया कि जला दी है।
उसने नहीं जलाई। वह उसकी दुकान के फ़र्श में एक पत्थर के नीचे रही और वहीं रही, और उसने उसे दोबारा कभी नहीं खोला। इस बात का किसी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ, उसे भी नहीं।
जो उसने सचमुच किया वह अलग चीज़ थी। उसने दरबार का काम छोड़ दिया। अपने भाई सगुन को भेजने लगा, जिसका हाथ उससे कमज़ोर था पर बुरा नहीं था, और सगुन का उससे अच्छा चला। घर की हालत सुधरी। किसी ने कभी नहीं समझा कि उसने सबसे बड़ा ग्राहक क्यों छोड़ा।
जिसने भी पूछा, उससे उसने यही कहा कि इस काम में आँखें पहले जाती हैं। उसकी आँखें नहीं गई थीं। उसने उन्नीस बरस और सुई में धागा डाला, बिना किसी से पकड़वाए।