बरसात में धौंकल का काम सोने का नहीं रह जाता था। बाक़ी महीनों में वह रात को दो बार उठता था। सावन-भादों में वह लेटता ही नहीं था। वह छप्पर के नीचे बैठा रहता, पीठ हवा की तरफ़, और आग को उस तरफ़ से आड़ देता रहता जिस तरफ़ से उस रात हवा आ रही होती।

वह आग बुझनी नहीं थी। यही उसका पूरा काम था और यही उसकी पूरी कमाई।

घाट पर मुर्दा जलाने आने वाले को तीन जगह पैसे देने पड़ते थे और यह बात नई नहीं थी, बहुत पुरानी थी। लकड़ी का दाम अलग, जो तौल से लगता था। आग का दाम दूसरा, जो धौंकल का था। और तीसरा, घाट का कर, जो न लकड़ी वाले का था न धौंकल का, बल्कि उस आदमी का था जिसके नाम पर घाट चलता था। तीनों अलग-अलग हाथों में जाते थे, तीनों अलग-अलग गिने जाते थे, और तीनों में से किसी एक के बिना काम आगे नहीं बढ़ता था।

धौंकल इक्कीस बरस से वहाँ था। उससे पहले उसका चाचा था और उससे पहले किसी और का कोई था, और यह आग तब से जल रही थी जब से कोई बताने वाला ज़िंदा नहीं था। धौंकल ने इसे कभी नई नहीं जलाया था और यही उसका इकलौता घमंड था। वह अंगारा एक मिट्टी की कुल्हिया में डालकर देता था, ऊपर राख की एक परत, और उतने में वह आदमी के साथ चिता तक पहुँच जाता था।

उस साल पानी ज़्यादा था। नदी सीढ़ियाँ चढ़ आई थी और जलाने की जगह ऊपर सरका दी गई थी, जिससे सबका काम बढ़ा था। धौंकल का सूखा ईंधन ख़त्म होने पर था। सूखा ईंधन वह अलग रखता था, गोबर के उपले और महीन लकड़ी, और उसे बरसात से पहले जमा करना पड़ता था। उस बरस उसने कम जमा किया था, क्योंकि पिछले बरस बच गया था।

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उस रात, जब यह हुआ, वह अपनी आख़िरी सूखी टोकरी में हाथ डाल चुका था। टोकरी आधी थी।

घाट पर उन दिनों जो आदमी कर वसूलता था, वह नया था। छह-सात महीने से रहा होगा। धौंकल ने उसे पहले दिन देखा था और सोचा था कि यह टिकेगा नहीं, क्योंकि वह इस काम के लिए बना नहीं लगता था। उसकी आवाज़ में वह चीज़ नहीं थी जो इस काम में चाहिए। पर वह टिका, और धौंकल ने बाद में यह भी देखा कि वह किसी से एक पैसा कम नहीं लेता और ज़्यादा भी नहीं लेता।

यह दूसरी बात पहली से मुश्किल है। धौंकल ने अपने इक्कीस बरस में कर वसूलने वाले चार आदमी देखे थे और तीन ने ग़रीब से कम लिया था और अमीर से ज़्यादा, और सब उन्हें अच्छा आदमी कहते थे। यह वाला दोनों नहीं करता था। इसलिए उसे कोई अच्छा आदमी नहीं कहता था।

रात के पिछले पहर में एक औरत आई। अकेली। पैदल। उसके साथ कोई नहीं था, न कहार, न कोई बूढ़ा, और यह अपने आप में इतनी अजीब बात थी कि धौंकल खड़ा हो गया।

उसकी गोद में एक बच्चा था। सात-आठ बरस का, इससे ज़्यादा नहीं। वह उसे ऐसे लिए थी जैसे सोते हुए को लिया जाता है, कमर पर नहीं, दोनों बाँहों में, और उसकी अपनी बाँहें काँप रही थीं क्योंकि वह उसे बहुत दूर से लाई थी। बच्चा भीगा हुआ था।

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लकड़ी वाला उठकर आया। धौंकल भी अपनी कुल्हिया लेकर आया। दोनों ने वही किया जो उस रात करने लायक़ था। लकड़ी वाले ने कहा कि तौल छोड़ो, ले जाओ। उसने तौला भी नहीं। धौंकल ने कुल्हिया आगे कर दी और कहा कि इसका कुछ नहीं।

फिर कर वाला आया।

उसने वही कहा जो उसे कहना था। घाट का कर इतना है। औरत ने कहा कि उसके पास कुछ नहीं है। उसने सुना और वही वाक्य दोहरा दिया, शब्द दर शब्द, और उसमें इतना जोड़ा कि यह उसका अपना नहीं है, इसलिए वह इसे छोड़ नहीं सकता। उसने दोबारा नहीं देखा।

धौंकल ने कहा कि इसका दाम मैं दे देता हूँ। कर वाले ने उसे देखा और पूछा कि तुम्हारे पास इतना है क्या। धौंकल के पास नहीं था और यह दोनों को मालूम था।

औरत ने अपनी साड़ी का किनारा पकड़ा और उसे फाड़ने लगी, यह कहकर कि यह आधा रख लो और आधे में मैं इसे ढाँप दूँगी। और तभी बादल थोड़े हटे और चिता की तरफ़ से रोशनी इस तरफ़ आई, और उस रोशनी में कर वाले ने बच्चे का चेहरा देखा।

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धौंकल ने आदमियों को टूटते देखा था। इक्कीस बरस उसी घाट पर काटे थे। उसने यह भी देखा था कि टूटने पर लोग आवाज़ करते हैं। यह आदमी बिलकुल चुप रहा और सिर्फ़ नीचे बैठ गया, वहीं, गीली सीढ़ी पर, और उसका हाथ अब भी उसी तरह आगे बढ़ा हुआ था जिस तरह कर लेते वक़्त बढ़ा होता है, और वह उसे वापस नहीं खींच पा रहा था।

आगे जो हुआ उसमें धौंकल का कोई हिस्सा नहीं था। बाद में घाट पर बहुत कुछ कहा गया, और उसमें से आधा उसे ग़लत लगा, इसलिए उसने आगे किसी को कुछ नहीं बताया।

उसका अपना हिस्सा यह था। वह अंगारा उसने उस रात दे दिया था और लौटकर देखा तो उसकी आग नीचे तक उतर आई थी। हवा छप्पर के नीचे घुस चुकी थी। उसने आख़िरी सूखी टोकरी उलट दी और अपने घुटनों पर बैठकर मुँह से हवा दी, बहुत देर तक, इतनी देर कि सुबह उसकी आँखें लाल थीं और गला बैठ गया था।

आग बची रही। कितने कम से बची, यह उसने किसी को नहीं बताया, क्योंकि यह बताने वाली बात नहीं थी।

उस बरसात के बाद उसने एक चीज़ बदली और किसी से कहकर नहीं बदली। बच्चों का अंगारा उसने लेना बंद कर दिया। दाम बड़ों का वही रहा, पूरा, और उसमें उसने कभी छूट नहीं दी। बच्चों का उसने फिर कभी नहीं लिया।

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किसी को कई बरस तक पता नहीं चला। इसकी वजह हिसाब है। घाट पर बच्चे कम आते हैं, बहुत कम, और महीने के अंत में वह फ़र्क़ इतना छोटा पड़ता है कि किसी की नज़र में नहीं आता। कर वाले की नज़र में भी नहीं आया।

उस रात मुँह से हवा देते-देते जो गला बैठा था, वह पूरा नहीं खुला। कुछ हफ़्ते बाद थोड़ा ठीक हुआ और फिर वहीं रुक गया। धौंकल घाट के इस सिरे से उस सिरे तक दाम चिल्लाकर बताया करता था, जैसे वहाँ सब बताते हैं, और अब वह नहीं बता पाता। उसे पास जाकर, झुककर, आदमी के कान के क़रीब कहना पड़ता है। लोग इसे उसकी तमीज़ समझते हैं और घाट पर उसका नाम इसी से चलता है। वजह वह नहीं है।