बंसी सूरज निकलने से पहले दरवाज़े पर बैठ जाता था और तब तक बैठा रहता था जब तक भीतर से कहा न जाए कि बस।
उस घर का नियम मशहूर था। सुबह जो माँगने आए, वह ख़ाली नहीं जाता। यह नियम बहुत पुराना था और उसे कभी तोड़ा नहीं गया, और इसी वजह से बंसी का काम बना था।
क्योंकि सुबह छोटी होती है और क़तार लंबी।
सब को भीतर नहीं भेजा जा सकता। बंसी तय करता था कि कौन कब जाएगा, और आख़िर में जो बचे रह जाते थे उनसे कह दिया जाता था कि कल आना, और कल फिर वही होता था।
उसका काम देखने का था।
इसमें वह अच्छा था और यह डींग नहीं है। क़तार में खड़ा आदमी बहुत कुछ बता देता है, बशर्ते देखने वाला जानता हो कि कहाँ देखना है। बंसी पैर देखता था। भूखे आदमी के पैर एक तरह से पड़ते हैं। वह पेट नहीं देखता था, क्योंकि पेट कपड़े के नीचे रहता है। गरदन और हाथ की पीठ, ये दो जगहें उसकी थीं।
और वह उन्हें देखता था जो अच्छे कपड़े पहनकर आते हैं।
ये सबसे मुश्किल होते हैं। ग़रीब आदमी अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनकर आता है क्योंकि वह दरवाज़े पर जा रहा है। और नक़ली आदमी भी वैसा ही पहनकर आता है, ताकि उसे पढ़ा-लिखा माना जाए। दोनों एक जैसे दिखते हैं और उन्हें अलग करना ही बंसी का पूरा हुनर था।
अठारह बरस में वह ग़लत नहीं हुआ था। यह उसकी अपनी गिनती है और उसे जाँचने का कोई तरीक़ा नहीं है, पर उसे इस पर पूरा भरोसा था।
अब दूसरी बात, जो कम अच्छी है।
वह जगह बेचता था।
क़तार में आगे की जगह की क़ीमत होती है और यह हर उस दरवाज़े पर होता है जहाँ क़तार लगती है। बंसी छोटी रक़म लेता था और अकसर अनाज में लेता था, और वह इसे चोरी नहीं मानता था। उसकी अपनी मज़दूरी बहुत कम थी और यह बात उस घर को भी मालूम थी।
उस सुबह जाड़े की शुरुआत थी और कोहरा था।
क़तार में उन्तीस लोग थे। बंसी को यह इसलिए याद है कि उसने उस दिन दो बार गिना, क्योंकि कोहरे में पीछे वाले दिख नहीं रहे थे।
एक आदमी ने उससे बात की और आगे की जगह माँगी। उसने अनाज नहीं दिया। उसने कुछ नहीं दिया। उसने सिर्फ़ कहा कि उसे जल्दी है।
बंसी ने उसे देखा।
वह बूढ़ा था और उसका पहनावा पढ़ने-लिखने वालों जैसा था, न बहुत अच्छे न बहुत बुरे। उसके पैर ठीक थे। उसकी गरदन ठीक थी। हाथ की पीठ पर वह चीज़ नहीं थी जो भूख से आती है।
यानी वह ज़रूरतमंद नहीं था।
बंसी को यह उसी वक़्त दिख गया और उसने उसे आगे कर दिया।
इसकी वजह उसने बाद में बहुत बार ढूँढ़ी। पैसा नहीं था, क्योंकि पैसा मिला ही नहीं। डर भी नहीं था। सबसे क़रीब की बात यह है कि उस आदमी के कहने में जल्दी थी और बंसी उस जल्दी में बह गया, जैसे कोई भी बह जाता है जब सामने वाला यह मानकर चले कि काम हो ही जाएगा।
उसने उसे तीसरे नंबर पर लगा दिया।
जो हुआ, वह उसने नहीं देखा। दरवाज़े के भीतर की बात दरवाज़े पर बैठने वाले को नहीं दिखती। उसे इतना पता चला कि वह आदमी बहुत जल्दी बाहर आ गया और सीधा चला गया, और किसी से कुछ नहीं कहा।
दोपहर तक घर में कुछ हुआ था।
बंसी को कभी पूरा नहीं बताया गया और उसने पूछा भी नहीं। जो थोड़ा-बहुत उसे मिला, उससे उसने इतना समझा कि उस सुबह जो माँगा गया वह अनाज नहीं था और वह देने वाली चीज़ नहीं थी, और वह दे दी गई।
उसे नौकरी से नहीं निकाला गया।
यह सबसे बुरा हिस्सा था। अगर निकाल दिया जाता तो बात ख़त्म हो जाती। उससे यह तक नहीं पूछा गया कि वह आदमी आगे कैसे आया, क्योंकि उस घर में यह किसी के दिमाग़ में ही नहीं आया कि क़तार में कोई तरतीब होती है।
वह अगली सुबह फिर दरवाज़े पर बैठा।
और तब उसे वह चीज़ पता चली जो उसके साथ हुई थी।
क़तार में उसे कोई नहीं दिखा।
यानी लोग दिखे। पर उनमें से कौन सचमुच का है और कौन नहीं, यह अब उसे नहीं दिख रहा था। वह पैर देखता था और उसे कुछ समझ नहीं आता था। वह गरदन देखता था और वही। अठारह बरस में जो चीज़ उसके पास आँख उठाते ही आ जाती थी, वह चली गई थी।
उसने कुछ दिन कोशिश की। फिर उसने कोशिश करनी छोड़ दी।
अब वह क़तार को उसी तरह भीतर भेजता है जिस तरह वह लगी होती है। जो पहले आया वह पहले। इसमें कोई राय नहीं लगती और कोई ग़लती नहीं होती।
जगह उसने बेचनी भी बंद कर दी, इसलिए नहीं कि उसे बुरा लगने लगा, बल्कि इसलिए कि आगे की जगह का दाम तभी बनता है जब बेचने वाले को यह भरोसा हो कि वह किसे आगे कर रहा है।
उसकी कमाई कम हो गई और उसका काम आसान हो गया।
सुबह वह कुंडा खोलता है, बैठ जाता है, और गिनता है। गिनती उसे अब भी आती है। उन्तीस को वह उन्तीस ही गिनता है और उससे आगे कुछ नहीं देखता।