मुनसी का काम बीमारों का नहीं था। वह बोरियों का था।
दवाख़ाने में जो लोग दवा देते थे, वे पढ़े हुए थे और उनकी गिनती अलग थी। मुनसी के पास चाबी थी। वह तौलकर देता था, हिसाब लिखवाता था, और जो ख़त्म होने वाला हो उसका पहले से इंतज़ाम करता था।
लड़ाई लंबी हो तो सबसे पहले यही काम टूटता है।
पीछे से आना कम हो जाता है। जो आता है वह देर से आता है। और माँग वैसी की वैसी रहती है, बल्कि बढ़ जाती है।
उसने पहली बार मिलावट दूसरे बरस में की।
एक जड़ थी जो पहाड़ से आती थी और महँगी थी। उसकी जगह उसने वह डाल दी जो पास के नाले पर मिलती है और जिसका रंग और रेशा लगभग वैसा ही है। सूखने पर दोनों में फ़र्क़ बताना मुश्किल है।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
यह उस दिन उसे राहत की बात लगी थी और बाद में यही उसे सबसे बुरी लगी। जो लोग दवा दे रहे थे, वे भी उसे पहचान नहीं पाए। यानी उस पूरे दवाख़ाने में कोई नहीं था जो जानता हो।
उसके बाद उसने यह और किया।
यह लालच नहीं था और उसने बाद में इसे लालच कहने वालों से कभी बहस नहीं की। जो बचता था वह उसने बेचा नहीं। बची हुई मात्रा हिसाब में पूरी दिखती थी और उसी से दवाख़ाना चलता रहता था, और किसी को ख़ाली हाथ नहीं लौटना पड़ता था। यह उसने अपने आप से कई बार कहा और हर बार यह पूरी तरह सच नहीं लगा।
पाँच बरस में वह चौदह चीज़ों में यह कर चुका था।
उस रात जो हुआ, वह ऐसी रात थी जिसके लिए वह कभी तैयार नहीं था।
एक आदमी बहुत बुरी हालत में लाया गया और वह मामूली आदमी नहीं था, यह भीड़ से पता चल रहा था। और तब जो चीज़ माँगी गई, वह नाम लेकर माँगी गई।
मुनसी के पास वह नहीं थी। एक चुटकी भी नहीं।
उसके पास वह जो थी, वह नाले वाली थी। उसने वही निकाली और फिर वह किया जो इतने बरसों में उससे कभी नहीं हुआ था। उसने कह दिया कि यह वह नहीं है।
उससे पूछा गया कि असली कहाँ मिलेगी।
उसने जो बताया वह उसकी सबसे ईमानदार बात थी और सबसे बेकार भी। उसने कहा कि वह पहाड़ पर एक ख़ास ढलान पर होती है और उसे उगी हुई देखकर पहचानना उसे नहीं आता, क्योंकि उसके पास वह हमेशा सूखी और बँधी हुई ही पहुँची है। फिर यह पूछा गया कि उस ढलान तक कौन ले जाएगा, और इसका भी जवाब उसके पास नहीं था, क्योंकि सामान लाने वाले बीच के लोग होते थे और वे भी उसे किसी और से लेते थे।
एक आदमी उसी रात भेजा गया। रातों-रात।
वह लौटा। दूसरे दिन।
जो वह लाया, उसके बारे में उस पूरे इलाक़े में बरसों बात हुई और मुनसी उसे दोहराता नहीं। उसका अपना हिस्सा सुबह का है, जब वह बाहर निकला।
उसके दवाख़ाने के सामने पूरी ढलान पड़ी हुई थी।
पेड़, झाड़ियाँ, बेलें, घास, पत्थर, और उन सबके साथ की मिट्टी। जो चीज़ चाहिए थी वह उसमें कहीं थी और उसके साथ हज़ार चीज़ें और थीं।
मुनसी को समझ आ गया कि जिसे भेजा गया था वह भी पहचान नहीं पाया।
और यह उसी वजह से हुआ था जिस वजह से उसकी मिलावट पाँच बरस चली थी।
उस दिन के बाद वह उसी ढेर पर बैठ गया।
जो काम उसने किया, वह किसी ने उससे नहीं कहलवाया। उसने छाँटना शुरू किया। एक-एक करके, ढेर के एक सिरे से।
पहला महीना बेकार गया। वह पत्तों की शक्ल से छाँट रहा था और पत्ते सूखने पर बदल जाते हैं। दूसरे महीने उसने तने काटकर देखने शुरू किए, भीतर का रंग, दूध निकलता है या नहीं, रेशा कैसे टूटता है।
तीसरे महीने में उसने सूँघना शुरू किया।
यहीं से बात बनी। सूखी जड़ की गंध नहीं जाती। वह मंद हो जाती है, पर बदलती नहीं, और दो जड़ें जो देखने में एक जैसी हों वे सूँघने में अलग होती हैं।
उस ढेर में उसे नौ महीने लगे। पूरे नौ।
जिस चीज़ की ज़रूरत थी, वह उसे तीसरे महीने में ही मिल गई थी। बाक़ी छह महीने उसने अपने लिए किए।
अब वह उस दवाख़ाने का सबसे काम का आदमी है और यह किसी की मेहरबानी नहीं है। लड़ाई ख़त्म हो चुकी है और वह वहीं है और अब वे उसे पढ़े हुए लोगों के साथ बिठाते हैं।
उसे रात में बुलाया जाता है, क्योंकि रात में दीये की रोशनी में रंग नहीं दिखता और उसे रंग की ज़रूरत नहीं पड़ती।
मिलावट उसने बंद कर दी। यह उसकी सबसे कम अहम बात है और वह इसे किसी को बताता नहीं, क्योंकि इसमें बताने लायक़ कुछ नहीं।
जो वह बताता है वह दूसरा है।
दो जड़ें ऐसी हैं जो उससे आज तक अलग नहीं होतीं। दोनों की गंध एक है और भीतर का रंग एक है और एक दवा है और दूसरी बेअसर है।
जब वे दोनों में से कोई सामने आती है, तो वह हाथ रोक देता है और कह देता है कि इसमें उसे यक़ीन नहीं है। हर बार। सामने कोई भी हो।
पहले वह ऐसा नहीं कहता था और तब उससे कोई पूछता भी नहीं था।