टेकू के पास दो घड़े थे और उन्हीं से उसका घर चलता था।
सुबह जानवर चरने जाते तो वह एक घड़े से दूसरे में कंकड़ डालता जाता, एक जानवर पर एक कंकड़। शाम को लौटते तो उलटी तरफ़ डालता। रात को पहला घड़ा ख़ाली होना चाहिए। अगर उसमें कुछ बचा है तो कुछ बाहर है, और उसे उसी रात ढूँढ़ने जाना है, चाहे जितना अँधेरा हो।
ग्यारह घर उसके ज़िम्मे थे और उनके कुल दो सौ चार जानवर। यह गिनती उसे इतनी अच्छी तरह याद थी कि वह नींद में बता सकता था, और कई बार बताई भी थी, क्योंकि उसकी घरवाली कहती थी कि वह सोते में गिनती करता है।
जो नहीं लौटा, उसका दाम उसका था। यह कोई लिखा हुआ नियम नहीं था। यह उससे भी मज़बूत चीज़ थी, यानी वह चीज़ जो सब जानते हैं और कोई कहता नहीं। एक बछड़ा उसके दो महीने का था।
जिस सुबह झड़ी लगी, उसी सुबह पहला घड़ा ख़ाली नहीं हुआ।
दो कंकड़ पड़े थे। टेकू ने उन्हें उठाकर हथेली पर रखा और देखा, जैसे देखने से कुछ बदल जाएगा। फिर उसने दोबारा गिना, पूरा, दो सौ दो। फिर तीसरी बार, क्योंकि दूसरी बार वह हड़बड़ी में गिना था।
दोनों धपली के थे। धपली के बछड़े छोटे थे, इतने छोटे कि वे झुंड के पीछे चलते थे और अक्सर किसी की टाँगों के बीच खो जाते थे और फिर मिल जाते थे। टेकू ने सोचा कि दोपहर तक मिल जाएँगे।
दोपहर तक पानी ऐसा हो गया जैसा उसने अपनी उम्र में नहीं देखा था।
यह बारिश नहीं थी। बारिश में बूँदें होती हैं। इसमें बूँदें नहीं थीं, बस पानी था, ऊपर से नीचे तक जुड़ा हुआ, और उसमें साँस लेना मुश्किल पड़ता था अगर मुँह ऊपर कर लो। छप्पर बैठने लगे। नीचे वाले खेत पहले घंटे में डूब गए।
फिर वह हुआ जिसके बारे में टेकू आगे चलकर कुछ नहीं कहता था।
उसने ऊपर देखा और ऊपर पहाड़ था। पहाड़ पहले भी वहीं था, पर वह ज़मीन पर था। अब वह ज़मीन पर नहीं था। लोग उसके नीचे भाग रहे थे और चिल्ला रहे थे और जानवर हाँके जा रहे थे, और टेकू उस भीड़ में अपने दोनों घड़े छाती से लगाए खड़ा था, क्योंकि उस वक़्त उसके दिमाग़ में एक ही चीज़ थी, कि अगर ये फूट गए तो हिसाब कहाँ से शुरू होगा।
अंदर वह सात दिन रहे।
जो लोग बाद में उन सात दिनों के बारे में पूछते थे, वे यह सुनना चाहते थे कि ऊपर कैसा लगता था। टेकू इसका जवाब नहीं दे पाता था, क्योंकि उसने ऊपर लगभग देखा ही नहीं। अंदर अँधेरा था और पैरों की जगह नहीं थी और गीले जानवरों की भाप से साँस भारी हो जाती थी। तीसरे दिन एक बूढ़ी बैल के पैर के नीचे आ गई और उसे खींचकर निकाला गया। यह उसे याद है। पहाड़ का नीचे वाला हिस्सा उसे याद नहीं है।
उसने गिनने की चार बार कोशिश की।
पहली बार वह अस्सी तक पहुँचा और भीड़ ने उसे हटा दिया। दूसरी बार जानवर बैठे हुए थे और बैठे जानवर गिनना नहीं आता, क्योंकि सींग एक जैसे लगते हैं। तीसरी बार कल्लर ने उसे पकड़कर बिठा दिया और कहा कि टेकू, ऊपर पहाड़ है और तू कंकड़ गिन रहा है। चौथी बार उसने कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे ख़ुद लगने लगा था कि कल्लर ठीक कह रहा है।
पर उसने घड़े नहीं छोड़े। सात दिन उसने उन्हें अपने और दीवार के बीच में दबाए रखा और वे नहीं फूटे।
सातवें दिन पानी बंद हुआ। बंद होना भी अजीब था, धीरे-धीरे नहीं, एक साथ, जैसे कोई ऊपर से हाथ रोक ले। लोग बाहर निकलने लगे और बहुत देर तक निकलते रहे, क्योंकि भीतर जितने थे उतने बाहर आने में समय लगता है।
टेकू सबसे आख़िर में निकला और उसने वहीं, कीचड़ में, दोनों घड़े रख दिए और गिनना शुरू किया।
जानवर एक-एक करके निकल रहे थे और वह डाल रहा था। कंकड़ की आवाज़ मिट्टी के घड़े में एक ही तरह की होती है और उसे वह इतनी बार सुन चुका था कि उसे गिनने के लिए देखना भी नहीं पड़ता था। दो सौ पर वह रुका। फिर दो सौ चार पर पहुँचा और उसका हाथ रुक गया, क्योंकि जानवर अभी भी निकल रहे थे।
दो सौ छह।
वह वहीं बैठ गया। उसने घड़ा उलटा और पूरा दोबारा गिना, और दोबारा दो सौ छह निकला।
धपली के दोनों बछड़े नहीं मिले। वे उन सात दिनों में कहीं नहीं दिखे और उसके बाद भी कभी नहीं दिखे। जो दो ज़्यादा थे, वे भीतर पैदा हुए थे। एक बछिया थी, दूसरा बछड़ा, और दोनों की माँएँ अलग-अलग घरों की थीं, यानी वे धपली के भी नहीं थे।
गाँव में इस पर किसी ने बात नहीं की। लोगों के पास उन दिनों बात करने को और चीज़ थी, बहुत बड़ी चीज़, और उसके सामने दो बछड़े कोई चीज़ नहीं थे। कल्लर ने इतना ज़रूर कहा कि टेकू, तेरा हिसाब तो बराबर हो गया, और हँसा।
टेकू ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि हिसाब बराबर नहीं हुआ था। गिनती बराबर हुई थी। ये दो अलग चीज़ें हैं और यह फ़र्क़ उसके सिवा किसी को नहीं समझना था। धपली को उसने उस साल दो बछड़ों के दाम दिए, पूरे, हालाँकि धपली ने कहा कि रहने दे।
उसके बाद उसने एक तीसरा घड़ा रख लिया। छोटा वाला, जो पानी के काम का नहीं रहा था। उसमें वह वे कंकड़ डालता है जिनके बारे में वह तय नहीं कर पाता, यानी जो गया भी नहीं और जो है भी नहीं। उसमें आज तक ग्यारह पड़े हैं और उसने कभी उन्हें वापस बड़े घड़े में नहीं मिलाया।