हरछठ पालिये गढ़ता था और उस काम का अपना क्रम होता है।
पहले पत्थर चुना जाता है और उसकी दिशा देखी जाती है, क्योंकि हर पत्थर की एक तरफ़ होती है जिस पर छेनी सीधी चलती है और दूसरी तरफ़ वह चटकता है। फिर ऊपर की शक्ल। फिर नाम। और सबसे आख़िर में तारीख़।
तारीख़ आख़िर में इसलिए पड़ती है कि वही सबसे बाद में मालूम होती है।
उसे यह काम उसके ससुर से मिला था और उसमें कमाई ठीक थी। लोग मोल-भाव नहीं करते, क्योंकि जिस मौक़े पर वे आते हैं उस मौक़े पर कोई मोल-भाव नहीं करता।
यह वाला काम उसके पास बसंत में आया।
आदमी अकेला आया और उसने पत्थर की नाप बताई और नाम बताया और आधे पैसे रख दिए। यहाँ तक सब वैसा ही था।
फिर उसने तारीख़ बताई।
हरछठ ने पहले उसे ठीक से समझा नहीं। उसने दोहरवाई। आदमी ने दोहरा दी और वह तारीख़ आगे की थी। उस दिन से लगभग सात महीने आगे की।
उसने पूछा कि लड़का कहाँ है।
आदमी ने कहा कि घर पर है।
इस काम में एक बात मानी जाती है और उसे कोई लिखता नहीं। ज़िंदा आदमी का नाम पत्थर पर नहीं जाता। हरछठ ने यह कहा।
आदमी ने बहस नहीं की। उसका जवाब सिर्फ़ इतना था कि तारीख़ मालूम है और वह बदलेगी नहीं, और उसने यह ऐसे कहा जैसे कोई मौसम की बात करता है।
हरछठ ने काम ले लिया।
इसकी कोई सफ़ाई उसके पास नहीं है। पैसा ज़रूरत का था, यह सच है। पर वह उससे बड़े काम छोड़ चुका था। असल में वह उस आदमी की आवाज़ थी, जिसमें कोई ज़िद नहीं थी, और उससे हरछठ को यह लगा कि मना करने का हक़ उसके पास है ही नहीं।
उसने पत्थर चुना और तीन महीने में गढ़ा।
वह उसका सबसे अच्छा काम था। यह उसकी अपनी राय है और वह इस पर अब तक क़ायम है। ऊपर की शक्ल उसने साधारण रखी और नाम के अक्षर उसने बड़े और खुले रखे, और उन्हें गहरा काटा, इतना गहरा कि उन पर हाथ फेरो तो उँगली उनमें बैठ जाए।
नीचे उसने जगह छोड़ दी।
उतनी ही जितनी तारीख़ को चाहिए। न ज़्यादा न कम। नाप उसने पहले से लगा ली थी, यह मानकर कि अंक कितने होंगे।
पत्थर उसके अहाते में पड़ा रहा।
गरमी गई। बरसात आई और उसने उसे ढक दिया, क्योंकि गीले पत्थर पर काई बैठती है और नए काम पर काई बुरी लगती है।
फिर वह महीना आया जिसकी तारीख़ पत्थर पर पड़नी थी।
हरछठ ने उन दिनों काम कम लिया। उसे मालूम था कि बुलावा आएगा और उसे जाना होगा और तारीख़ वहीं मौक़े पर काटनी होगी, जो होता है और जिसमें आधा दिन लगता है।
बुलावा नहीं आया, न उस हफ़्ते और न उसके बाद वाले में।
महीना निकल गया। उसके बाद वाला भी।
जाड़ों में वह ख़ुद उधर गया, किसी और काम से, और उसने उस तरफ़ से गुज़रते हुए पूछ लिया।
लड़का ठीक था और उसे किसी ने खेत की तरफ़ जाते देखा था।
उसने आगे कुछ नहीं पूछा और वह घर तक नहीं गया। उस बारे में जो बातें उस इलाक़े में चलीं, वे उसने भी सुनीं और उनमें से हर एक दूसरी से अलग थी।
पत्थर वहीं पड़ा रहा।
अब उसके सामने एक ऐसी चीज़ थी जो उसके काम में कभी नहीं आती। नाम गढ़ा हुआ पत्थर किसी और के काम नहीं आ सकता। और उसे तोड़ना भी नहीं होता, यह उसके ससुर का नियम था और उसने उसे कभी नहीं तोड़ा।
दो बरस वह वैसे ही पड़ा रहा। हरछठ ने उस पर बोरे रख दिए थे, इसलिए नहीं कि उसे छिपाना था, बल्कि इसलिए कि अहाते में जगह कम थी और खुली सतह पर सामान रखना सुभीते का था। दो बरस में उसने उसे तीन बार खिसकाया और तीनों बार बोरे उतारकर दोबारा रखे।
तीसरे बरस उसने उसे उठवाया और उसे नीचे रखकर वह उस पर बैठ गया, और उसने छेनी उठाई।
उसने नाम काटना शुरू किया।
यह छीलना नहीं होता। अक्षर गहरे थे, इसलिए उन्हें मिटाने का इकलौता तरीक़ा यह था कि पूरी सतह को उतने ही नीचे तक ले जाया जाए। पूरे पत्थर की ऊपरी सतह उसने उतार दी।
इसमें उसे बाईस दिन लगे और उसकी दाईं कलाई उस काम के बाद एक महीने ठीक से नहीं चली।
जो बचा वह एक सादा पटिया था। थोड़ा पतला, बस उतना, जितना कोई नापे तो पकड़ में आए।
आख़िर में उसने उसे बेच दिया।
नीचे बस्ती में एक घर बन रहा था और उन्हें देहरी के लिए पत्थर चाहिए था। यह उसका ठीक-ठाक इस्तेमाल है और पटिया मज़बूत था। दाम उसने कम लिया, क्योंकि उस पर मेहनत लगी हुई नहीं दिखती थी।
वह अब उसी घर के दरवाज़े पर है।
उस पर से दिन में कई बार लोग गुज़रते हैं। बरसात में उस पर पैर के निशान बनते हैं और सूख जाते हैं। घर वालों को यह मालूम नहीं कि वह पहले क्या था और उन्हें बताने की कोई वजह भी नहीं है, क्योंकि अब वह देहरी है और देहरी का काम कर रहा है।