घूरे के पास उस ज़मीन का कोई काग़ज़ नहीं था और उसने कभी माँगा भी नहीं। ज़रूरत नहीं पड़ी।
उसके बाप को वहाँ रखा गया था, बहुत पहले, जब आश्रम चलता था। मज़दूरी अनाज में मिलती थी और साल में दो बार मिलती थी। फिर आश्रम उजड़ गया। अनाज आना बंद हो गया। उसका बाप वहाँ जाता रहा।
घूरे ने यह उससे पूछा था, एक ही बार, और जो जवाब मिला वह यह था कि जिस दिन नहीं जाएगा उस दिन देख लेंगे।
बाप के बाद वह जाने लगा। इसमें कोई फ़ैसला नहीं था। वह उसके साथ जाता था और फिर अकेले जाने लगा, जैसे बच्चे बाप का काम ले लेते हैं। कोई पूछता भी नहीं।
ज़मीन बड़ी थी और उसका ज़्यादातर हिस्सा जंगल हो चुका था। घूरे उसे साफ़ नहीं करता था। वह चार चीज़ें करता था। पानी का नाला खुला रखता था। सामने वाली दीवार का जो हिस्सा गिरता था उसे चुन देता था। कुएँ पर से बेल हटाता रहता था। और उस पत्थर के इर्द-गिर्द की घास काटता था।
पत्थर बीच वाले आँगन में था।
उस पत्थर में कोई ख़ास बात नहीं थी। लंबाई में एक आदमी से थोड़ा कम, चौड़ाई में कम, ज़मीन में आधा धँसा हुआ। रंग वहाँ के बाक़ी पत्थरों जैसा था। उस पर कुछ खुदा नहीं था। घूरे ने उस पर कभी कुछ चढ़ाया भी नहीं, न फूल, न पानी।
वह बस उसके चारों तरफ़ की घास काटता था, बरसात में महीने में दो बार और बाक़ी दिनों में एक बार।
घेरा उसने नाप कर नहीं बनाया था। जितनी दूर तक हँसिया आसानी से पहुँचता है, उतना। वह उसके चारों तरफ़ घूमता जाता था। यह उसका सबसे छोटा काम था, आधे पहर से भी कम का।
अट्ठाईस बरस में उसने किसी को इसकी वजह नहीं बताई, ज़्यादातर इसलिए कि उसके पास वजह थी नहीं।
लोगों ने कई बार पूछा। उसका साला उस पर हँसता था और उसे इसमें कोई बुराई नहीं लगती थी, क्योंकि बात हँसने लायक़ थी। बड़े लड़के ने एक बार सीधे कहा कि यह ज़मीन इतनी अच्छी है कि इसमें कुछ बोया जा सकता है और तुम इसमें घास काटते हो।
उसने उसका जवाब नहीं दिया। वह बहस करने वाला आदमी नहीं था। उसे यह भी दिख रहा था कि लड़का ग़लत नहीं कह रहा।
पड़ोस वाले ने दो बार भैंस बाँधने की कोशिश की और दोनों बार घूरे ने खोल दी। इसमें एक बार हाथापाई तक बात पहुँची। यह उसकी उम्र की इकलौती लड़ाई थी। उसके बाद पड़ोसी ने कोशिश नहीं की।
फिर एक दिन वे तीन लोग आए।
दो जवान थे और एक उम्रदराज़, और तीनों पैदल थे। वे उस रास्ते से आए जो नदी की तरफ़ से आता है। धूप तेज़ थी। घूरे उस वक़्त नाले पर था और उसने उन्हें आते देखा।
उजड़ी जगह पर लोग आते रहते हैं, ज़्यादातर छाँव के लिए या पानी के लिए, और वह उन्हें रोकता नहीं था। वह अपना काम करता रहा।
जब वह आँगन की तरफ़ आया तो वे तीनों वहीं थे और खड़े थे।
उसके बाद जो हुआ उसे घूरे ने पूरा नहीं देखा, और उसने बाद में यह बात हमेशा साफ़ कही, चाहे लोग उसे पूरा सुनने में दिलचस्पी न लें। वह आँगन के किनारे पर था और उसके और उनके बीच गिरी हुई दीवार का एक हिस्सा था। उसने इतना देखा कि जो जवान आगे था वह आगे बढ़ा।
और फिर वहाँ चार लोग थे।
घूरे उस जगह से हिला नहीं। वह हिल नहीं पाया। जो औरत वहाँ खड़ी थी वह उसकी माँ से बड़ी उम्र की लगती थी और उसके कपड़े उस तरह के थे जो घूरे ने सिर्फ़ बहुत पुराने लोगों पर देखे थे।
वे चारों उसी दिन चले गए। उम्रदराज़ आदमी बाद में आया, अलग से, और उसे साथ ले गया, और यह घूरे ने भी नहीं देखा, यह उसे बताया गया।
उस दिन के बाद आँगन में पत्थर नहीं था।
यह सबसे अजीब बात है और घूरे ने इसे कई बार जाँचा। वह वहाँ गया, बैठा, ज़मीन टटोली। जहाँ पत्थर आधा धँसा हुआ था वहाँ एक गड्ढा था, उसी नाप का, और उसके किनारे साफ़ थे। मिट्टी सूखी थी।
वह अगले हफ़्ते फिर आया, आदत से, और हँसिया साथ था।
उसने घास काटी।
उसके बाद उसने दो महीने तक काटी। फिर उसे ख़ुद ही अजीब लगने लगा, क्योंकि बीच में कुछ नहीं था और वह एक ख़ाली गोले के चारों तरफ़ घूम रहा था। एक दिन उसने हँसिया उठाया और नहीं काटा और लौट आया, और उसके बाद उसने कभी नहीं काटा।
बाक़ी तीनों काम वह करता रहा, बुढ़ापे तक।
घास वहाँ लौटी, पर वैसी नहीं लौटी।
अट्ठाईस बरस तक बार-बार कटने से वहाँ की घास बदल चुकी थी। जो बार-बार कटती है वह छोटी और घनी रहती है और उसकी जड़ें फैलती हैं, और लंबी वाली उसमें जगह नहीं बना पाती। बाहर की घास घुटनों तक आती है। घेरे की घास टख़ने तक आती है और उसका रंग हल्का है।
वह गोला आज भी दिखता है। बरसात में कम दिखता है और जाड़ों में साफ़ दिखता है। घूरे उधर से निकलता है तो उसे देख लेता है और आगे बढ़ जाता है, और अब वहाँ रुकने की उसे कोई ज़रूरत नहीं पड़ती।