सुरजा का असली काम बोलने का था।
लोग समझते थे कि उसका काम हाथ पकड़ना है। हाथ पकड़ना उसमें सबसे कम था। हाथ तो कोई भी पकड़ सकता है।
असल काम यह था कि चलते हुए वह लगातार बताता रहे। नीची डाल। दो क़दम बाद ढाल। दाएँ से पानी आ रहा है। यह पत्थर हिलता है।
इसमें एक चीज़ सबसे मुश्किल है और वह यह कि आगे का सोचना पड़ता है। जो चीज़ अभी दिख रही है उसे बताने का कोई फ़ायदा नहीं। जब तक शब्द मुँह से निकलेगा, पैर वहाँ पहुँच चुका होगा। इसलिए वह हमेशा चार क़दम आगे देखकर बोलता था और यह उसे सीखने में दो बरस लगे थे।
यह उसने तेईस बरस किया।
वह उस घर में तब आया था जब वह ख़ुद जवान था और वह घर बड़ा था। फिर वह घर छोटा होता चला गया और जंगल में आ गया, और सुरजा साथ रहा, क्योंकि उसे और कुछ आता नहीं था और यहाँ खाना मिल जाता था।
उस आदमी की आँखें बहुत पहले चली गई थीं।
सुरजा ने उन्हें कभी काम करते नहीं देखा। उसके लिए वह हमेशा से ऐसा ही था और यह बात उनके बीच कभी उठी ही नहीं।
घर में तीन लोग थे और चौथी वह लड़की आई थी, जो कुछ बरस पहले ब्याह कर आई थी।
घर का लड़का लकड़ी काटने जाता था।
यह भी उस घर के छोटे होने का हिस्सा था। जो लड़का पहले किसी और तरह रहता, वह अब कुल्हाड़ी लेकर जाता था और शाम को गट्ठर लेकर लौटता था। वह अच्छा काटता था और उससे घर चलता था।
उस दिन दोनों साथ गए थे, वह और उसकी पत्नी।
सुरजा दिन में घर पर था। उसका काम तब का नहीं था। वह उस आदमी को सुबह बाहर बिठा देता था, दोपहर बाद भीतर ले आता था, और ढलती धूप में नाले तक घुमा लाता था।
उस शाम भी वह उसे घुमाने ले गया।
वह रास्ता उसे इतना याद था कि वह बिना देखे बता सकता था। नीची डाल तीसरे मोड़ पर आती है। ढाल उसके बाद। पत्थर नाले से पहले।
लौटते हुए अँधेरा हो गया और दोनों नहीं आए थे।
सुरजा ने पहले कुछ नहीं कहा।
यह उसका फ़ैसला था और उसे इसका अफ़सोस नहीं है। लकड़ी काटने वाला कभी-कभी देर से आता है और अगर उससे कह दिया जाए तो वह आदमी उठकर खड़ा हो जाएगा और बाहर जाना चाहेगा, और अंधे आदमी को रात के जंगल में ले जाना नहीं होता।
एक पहर उसी तरह बीत गया।
उसके बाद उसने कह दिया।
वह उसकी उम्र का सबसे बुरा काम था और उसने उसे उसी तरह किया जिस तरह वह बाक़ी सब करता था, यानी साफ़ और आगे का। उसने कहा कि दोनों अभी नहीं लौटे हैं और अब देर हो चुकी है।
उस आदमी ने कुछ नहीं कहा और उठकर बैठ गया और बैठा रहा।
उस पूरी रात सुरजा उसके पास बैठा रहा।
उसे बीच-बीच में बताना पड़ता था। अभी कुछ नहीं। हवा है। कोई नहीं आया। यह भी उसी काम का हिस्सा था और उस रात वह ग्यारह बार बोला, और उसे यह गिनती याद है।
पौ फटने से थोड़ा पहले वह आदमी बोला कि उसे कुछ दिख रहा है।
सुरजा ने पहले उसकी बात नहीं मानी।
बहुत बूढ़े और बहुत थके हुए लोग अँधेरे में चीज़ें बताते हैं और उसने यह पहले भी सुना था। उसने वही कहा जो वह ऐसे मौक़ों पर कहता था, कि अभी अँधेरा है, सो जाइए।
फिर उस आदमी ने उसकी तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया।
यह छोटी बात है और सुरजा के लिए सबसे बड़ी थी। तेईस बरस में वह आदमी उठते वक़्त हमेशा हाथ आगे बढ़ाता था, अपने आप, बिना सोचे, इस भरोसे पर कि वहाँ कंधा होगा। उस सुबह उसने नहीं बढ़ाया। वह ख़ुद उठा और दरवाज़े की तरफ़ चला और चौखट पर हाथ रखकर रुका, वहाँ जहाँ चौखट थी।
बाक़ी सब उसी दिन हुआ। दोनों लौट आए। लड़का ज़िंदा था और उसके बारे में जो कहा गया, वह सुरजा ने भी सुना और उसमें उसका कोई हिस्सा नहीं है।
उसका हिस्सा उसके बाद का है।
उसे रखा गया। उससे यह कभी नहीं कहा गया कि अब उसकी ज़रूरत नहीं रही। उसे खाना मिलता रहा और उसे काम भी दिया गया, बकरियाँ और पानी और छत का काम, और वह इन तीनों में औसत था।
पर एक चीज़ बिलकुल बंद हो गई।
वह चीज़ यह थी कि अब उससे कोई कुछ नहीं पूछता था। तेईस बरस उसका पूरा दिन बताने में जाता था और अब दिन भर में उससे दो बात होती थीं।
उस पूरे बरस में एक ही बात हुई जो उसे याद रह गई।
जाड़ों में, एक दोपहर, वह आदमी उसे देख रहा था। देर तक। सुरजा उस वक़्त बकरियों का चारा काट रहा था और उसे लगा कि शायद कोई काम है, इसलिए वह रुक गया।
उस आदमी ने कहा कि उसे लगता था कि सुरजा लंबा होगा।
उसने बस इतना कहा।
सुरजा ने कुछ जवाब नहीं दिया, क्योंकि इसका कोई जवाब नहीं था। वह वापस चारा काटने लगा। वह आदमी थोड़ी देर और बैठा रहा और फिर उठकर भीतर चला गया, अपने आप, बिना किसी के।