बरसाती के काम में असली चीज़ टहनी नहीं थी।

टहनी वह साथ रखता था और लोग उसी को देखते थे। दुफाँकी, हरी, दोनों सिरे मुट्ठी में। वह उसे लेकर ज़मीन पर चलता था और जहाँ वह नीचे को खिंचती थी वहाँ वह रुक जाता था।

वह जानता था कि टहनी अपने आप कुछ नहीं करती।

जो वह सचमुच देखता था, वह ज़मीन थी। किस जगह कौन सी घास उगी है। बरसात के बाद कहाँ की मिट्टी सबसे बाद में सूखती है। कहाँ शाम को कीड़े ज़्यादा हैं। किस पेड़ की जड़ें किधर को गई हैं, जो उसके तने के झुकाव से पता चलता है।

यह सब बताने पर कोई पैसा नहीं देता।

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टहनी पर देता है। इसलिए टहनी चलती थी और बरसाती इस बात को अपनी बेईमानी नहीं मानता था, क्योंकि पानी वहीं निकलता था जहाँ वह कहता था।

उसकी सबसे बड़ी कमाई ताल थी।

कुआँ एक घर का होता है। ताल पूरे इलाक़े का होता है और उसे बताने वाले का नाम बहुत दूर तक जाता है। बरसाती ने अपनी उम्र में चार बताए थे और चारों में पानी था।

जंगल वाला उनमें सबसे अच्छा था।

वह उसने बहुत पहले बताया था, तब जब वह जवान था। वहाँ पानी नीचे से आता था, इसलिए वह गरमी में भी नहीं सूखता था, और उस रास्ते से जाने वाले उसी पर रुकते थे।

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उस दिन वह इसी सिलसिले में उधर था।

उससे कहा गया था कि ताल के पास कुछ हुआ है।

वह पहुँचा तो किनारे पर चार आदमी पड़े थे।

बरसाती ने पहले यही सोचा जो कोई भी सोचता। ज़हर। यह होता है। ऊपर की तरफ़ से चीज़ें बहकर आती हैं और ठहरे हुए पानी में बैठ जाती हैं, और तब ताल ऊपर से पहले जैसा ही रहता है और नीचे से बदल चुका होता है।

उसने वह किया जो उसे आता था।

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उसने किनारे की मिट्टी उठाकर सूँघी। उसने पानी में उँगली डालकर देखी। उसने किनारे की घास देखी और उसमें कीड़े देखे और उनमें से एक को उठाकर देखा कि वह चल रहा है या नहीं। उसने तली की मिट्टी निकाली।

पानी ठीक था।

वह इसे जानता था और इसका कोई सबूत उसके पास नहीं था। यही उसके काम की पूरी कमज़ोरी है। पानी अच्छा है, यह कहने का कोई तरीक़ा नहीं है सिवाय इसके कि कोई पिए और ठीक रहे।

उसने पिया।

उसने एक बार नहीं, तीन बार पिया, और उन चारों के पास बैठकर पिया, और वह ठीक रहा।

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इससे कुछ नहीं हुआ।

फिर वे उठ गए।

यह उसने अपनी आँखों से देखा। पाँचवाँ आदमी वहीं था, बैठा हुआ, और वह उससे पहले भी वहीं बैठा था, और चारों उठ गए और खड़े हो गए और उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था जैसा ज़हर उतरने के बाद होता है।

अब उसके पास दो चीज़ें थीं और दोनों बेकार थीं।

पहली यह कि उसका पानी ठीक था। दूसरी यह कि वह जो हुआ था, उसे वह किसी को समझा नहीं सकता था, क्योंकि उसे ख़ुद समझ नहीं आया था।

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बात इलाक़े में उस तरह फैली जिस तरह ऐसी बातें फैलती हैं।

जो हिस्सा उसके काम आता, वह किसी ने नहीं लिया। जो हिस्सा फैला वह यह था कि उस ताल पर चार आदमी गिरे थे।

उसका काम उसी बरस बैठ गया।

यह एक साथ नहीं हुआ। पहले लोग मोल-भाव करने लगे, जो पहले नहीं करते थे। फिर दो जगह उसे बुलाकर दूसरे से भी पुछवाया गया। फिर एक बड़ा काम, जो लगभग तय था, किसी और को चला गया।

उसने कुछ महीने वह किया जो सही था।

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वह लोगों से कहने लगा कि उसे लगता है यहाँ पानी होना चाहिए। यह सच था। यह हमेशा से सच था। इससे पहले वह कहता था कि यहाँ पानी है, और वह भी उतना ही सच था और उतना ही अंदाज़ा था।

किसी ने उससे काम नहीं करवाया।

यह उसे थोड़े दिन में समझ आ गया। आदमी अंदाज़े के पैसे नहीं देता। वह पानी खोदने में जो मेहनत और पैसा लगाता है, वह इस भरोसे पर लगाता है कि बताने वाला जानता है। अगर बताने वाला ख़ुद कह दे कि मुझे लगता है, तो वह अपने पैसे अपनी जेब में रखेगा और ख़ुद कहीं भी खोद लेगा, क्योंकि लगना तो उसे भी लगता है।

जाड़ों तक बरसाती के घर में अनाज ख़त्म हो गया।

उसके बाद वह वापस पहले की तरह बोलने लगा।

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अब वह टहनी लेकर चलता है, रुकता है, ज़मीन पर निशान लगाता है और कहता है कि यहाँ पानी है। पूरे भरोसे से कहता है, क्योंकि आधे भरोसे से कही हुई बात कोई नहीं ख़रीदता।

काम धीरे-धीरे लौट आया। पूरा नहीं लौटा, पर इतना लौट आया कि घर चलने लगा।

जंगल वाला ताल आज भी वहीं है और उसका पानी आज भी अच्छा है। बरसाती उधर से नहीं जाता। इसकी वजह डर नहीं है। वजह यह है कि उस तरफ़ के लोग उसे देखकर वही बात छेड़ देते हैं, और उसे हर बार वही कहना पड़ता है कि उसने पानी जाँचा था, और हर बार सुनने वाला सिर हिला देता है और मान नहीं पाता।