जुगती की दुकान पर तीन बोरियाँ रहती थीं और तीनों में चिउड़ा था, अलग-अलग तरह का।
मोटा वाला सबसे सस्ता था और वह गाड़ीवानों के काम आता था, क्योंकि वह भीगने पर भी बिखरता नहीं। बीच वाला घरों में जाता था। पतला वाला सबसे महँगा था और वह महीने में दो बार बिकता था, ज़्यादातर तब जब किसी के यहाँ कोई आ रहा हो।
चिउड़ा कूटने का काम वह ख़ुद नहीं करता था। वह कुटवाता था, बस्ती के बाहर वाले चार घरों से, और उन्हें धान के हिसाब से देता था। इसमें सबसे मुश्किल हिस्सा यह था कि कूटने वाला अगर धान एक दिन ज़्यादा भिगो दे तो चिउड़ा नरम पड़ जाता है, और नरम चिउड़ा दो दिन में ही बासी लगने लगता है, हालाँकि वह ख़राब नहीं हुआ होता। जुगती हर खेप में से एक मुट्ठी निकालकर उँगलियों में मलता था और उसी से तय करता था कि लेनी है या लौटानी है। लौटाने पर झगड़ा होता था। वह फिर भी लौटा देता था, और यही वजह थी कि उसके यहाँ का पतला चिउड़ा दूर तक जाता था।
उस सुबह मंडी में भीड़ नहीं थी। सावन के आख़िरी दिन थे और आधे लोग खेत में थे।
औरत बीच वाली बोरी के सामने खड़ी हो गई और उसने पूछा कि दाम क्या है। जुगती ने बताया। उसने फिर पूछा कि सबसे कम कितने में दे दोगे। जुगती ने वही दाम दोबारा बता दिया, क्योंकि उसकी दुकान पर मोल-भाव नहीं होता था और यह उसका सबसे पुराना नियम था।
औरत ने कहा कि उसे तीन मुट्ठी चाहिए।
यह ख़रीदने लायक़ मात्रा नहीं थी। जुगती इससे कम भी दे देता था और कई बार मुफ़्त भी, ख़ास तौर पर बच्चों को, और उसने सोचा कि वह इसे ऐसे ही दे देगा।
फिर औरत ने अपना कंगन उतार लिया।
वह उसने आँचल में नहीं रखा और गिनकर नहीं रखा। उसने उसे सीधे बोरी के किनारे पर रख दिया, जैसे कोई पैसा रखता है, और कहा कि इसमें से तीन मुट्ठी दे दो।
जुगती ने अपने पैंतीस बरस में बहुत कुछ बदले में लिया था। अनाज, कपड़ा, एक बार एक बकरी। उसने कभी किसी का ज़ेवर नहीं लिया था, और इसमें कोई ऊँची बात नहीं थी। ज़ेवर लेने पर बात दुकान से बाहर चली जाती है और मुहल्ले में पहुँच जाती है, और तब आदमी की दुकान बदनाम हो जाती है।
उसने कहा कि यह वापस पहन लो और चिउड़ा ले जाओ।
औरत ने नहीं उठाया।
जुगती ने दोबारा कहा। उसने तब भी नहीं उठाया, और उसने जो कहा वह जुगती को उस पूरे मामले में सबसे साफ़ बात लगी। उसने कहा कि अगर वह मुफ़्त ले गई तो उसे बताना पड़ेगा कि कहाँ से आया, और वह बताना नहीं चाहती।
जुगती ने कंगन उठा लिया।
उसने तीन मुट्ठी नहीं दीं। उसने एक पूरी पोटली बाँधी, बीच वाले चिउड़े की, और साथ में थोड़ा गुड़ भी रख दिया, और औरत ने पोटली देखी और कुछ नहीं कहा और उसे उठाकर चली गई।
उसने नाम नहीं पूछा। यह उसे बाद में बहुत खला।
कंगन उसने उस दिन गल्ले में नहीं डाला। उसने उसे दुकान के पीछे वाले कमरे में, बाटों की डिबिया में रख दिया, और उसी शाम अपनी घरवाली को बता दिया, क्योंकि न बताना उसे ठीक नहीं लगा।
उस बरस जुगती पर ख़ुद क़र्ज़ था। बड़ी बोरी वाले सौदागर का, जिसे वह हर फ़सल पर थोड़ा-थोड़ा दे रहा था और जो कभी घटता हुआ नहीं लगता था। कंगन उससे बड़ा था। यह उसने पहले दिन ही अंदाज़े से समझ लिया था और यह बात उसके दिमाग़ में कई महीने रही।
उसने उसे नहीं बेचा।
उसने तय किया कि वह लौटाएगा, और उसके बाद उसने वही तरीक़े आज़माए जो कोई भी आज़माता। आने-जाने वालों से पूछना शुरू किया। हुलिया बताया। किस तरफ़ गई थी, यह भी बताया।
दो बार उसे लगा कि पता चल गया है। दोनों बार कोई और निकला।
फिर धीरे-धीरे पूछना कम हो गया, जैसा होता है, और एक साल में पूरी तरह बंद हो गया।
बरसों बाद उस तरफ़ की एक बात मंडी तक पहुँची। कहा गया कि फ़लाँ घर की हालत बदल गई, और उसके साथ जो नाम जुड़ा वह इतना बड़ा था कि आधे लोगों ने हँसकर टाल दिया। जुगती ने भी टाल दिया। पर उसने उस दिन दुकान जल्दी बंद की और भीतर जाकर डिबिया खोली और कंगन देखा, और उसे पहली बार यह ख़याल आया कि हो सकता है वह औरत लौटकर आना ही न चाहे।
यह ख़याल उसे बुरा लगा और वह इस पर ज़्यादा नहीं टिका।
उसकी दुकान बाद में ठीक चली। क़र्ज़ नौ बरस में उतरा, धीरे, बिना किसी की मदद के, और जुगती को इस पर हमेशा थोड़ा घमंड रहा।
कंगन वहीं रहा।
साल में एक बार, फ़सल के बाद जब वह अपने सारे बाट जाँचता है, वह उसे भी तराज़ू पर रख देता है और तोल लेता है। इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। सोना घटता नहीं और यह उसे मालूम है। तोल हर बार वही आती है और वह उसे वापस डिबिया में रखकर ढक्कन लगा देता है, और उसके बाद उस दिन का काम ख़त्म होता है।