कुआँ खोदने का काम नीचे से ऊपर की तरफ़ ख़त्म होता है, और यही उसकी सबसे बड़ी परेशानी है।
पहले गड्ढा, फिर पानी, फिर भीतर की चिनाई, फिर ऊपर की जगत, और सबसे आख़िर में पाट। पाट वह पत्थर है जो मुँह पर रखा जाता है और जिसमें बाल्टी के लिए जगह छोड़ी जाती है। वह अलग से गढ़वाना पड़ता है और वह सबसे महँगा हिस्सा होता है। वह सबसे बाद में आता है।
अकलू के साथ यह होता आया था कि पाट के पैसे सबसे बाद में मिलते थे और कई बार महीनों बाद मिलते थे। लोग तब तक पानी निकालना शुरू कर चुके होते थे और जब पानी निकल रहा हो तो बाक़ी काम ज़रूरी नहीं लगता। वह याद दिलाता रहता था। यह उसके काम का सबसे बेकार हिस्सा था।
तीस बरस में उसने तेरह खोदे थे।
यह गिनती कम लगती है, पर एक कुएँ में तीन से पाँच महीने जाते हैं और हर साल एक नहीं मिलता। बाक़ी दिनों में वह मरम्मत करता था, गाद निकालता था, और फ़सल के वक़्त दूसरों के खेत में लग जाता था। काम ऐसे ही चलता था।
आश्रम वाला कुआँ बारहवाँ था।
वह उसने चैत में पूरा किया था और उसका पाट भादों तक नहीं चढ़ा था। पैसे की बात नहीं थी, वहाँ पैसा था ही नहीं, और यह अकलू को शुरू से मालूम था। उसने वह कुआँ अनाज पर खोदा था और अनाज उसे मिल गया था। पाट के पत्थर का इंतज़ाम अलग से होना था और वह होते-होते रह जाता था।
उसने चार बार कहा। पाँचवीं बार उसने नहीं कहा, क्योंकि पाँचवीं बार कहने पर आदमी माँगने वाला लगने लगता है। वह चुप रहा।
उसने कुएँ के मुँह पर कँटीली झाड़ियाँ रख दी थीं। यह सब करते हैं और यह काफ़ी नहीं होता, और यह भी सब जानते हैं।
उस आश्रम में लड़के रहते थे और अकलू ने उन्हें अपने काम के दिनों में देखा था। एक उनमें दुबला था, ज़रूरत से ज़्यादा दुबला, और वह गायों के पीछे जाता था। अकलू ने एक बार उसे अपनी रोटी में से आधी दी थी और उसने नहीं ली थी, और उसने वजह भी बताई थी, जो अकलू को समझ नहीं आई। बात वहीं रह गई।
भादों की शुरुआत में एक दोपहर वह उसी तरफ़ से गुज़र रहा था, दूसरे गाँव के काम से, और उसने आवाज़ सुनी।
आवाज़ कुएँ से आ रही थी।
अकलू के पास उस वक़्त रस्सी थी, क्योंकि उसके पास हमेशा रस्सी रहती थी। उसने वह डाली और नीचे उतरा। लड़का पानी में नहीं था। वह उस कगार पर अटका था जो चिनाई के पहले घेरे पर बनती है, तीन आदमी नीचे, और उसकी टाँग मुड़ी हुई थी।
ऊपर लाने में उसे बहुत समय लगा। वज़न कोई बात नहीं थी। लड़का पकड़ ही नहीं पा रहा था। वह हाथ ग़लत जगह डाल रहा था, बार-बार, और अकलू को समझने में कुछ देर लगी।
फिर उसे दिख गया कि लड़का आँखें खोले हुए है।
ऊपर आने के बाद उसने पूछा कि कब से। लड़के ने कहा कि दो दिन से। अकलू ने पूछा कि क्या खाया था। लड़के ने बताया, और उसने आक के पत्तों का नाम लिया, और अकलू ने वहीं ज़मीन पर हाथ मारा, क्योंकि आक इस इलाक़े में हर मेड़ पर उगता है और उसका दूध आँख के लिए क्या करता है, यह यहाँ के बच्चे भी जानते हैं।
उसने पूछा कि खाया क्यों। लड़के ने जो जवाब दिया वह उसके गुरु से जुड़ा था और अकलू ने उसे बीच में ही रोक दिया।
आश्रम से लोग आ गए और लड़के को ले गए। उसके गुरु आए और बहुत देर उसके पास बैठे रहे। उसके बाद जो हुआ, उसके बारे में उस इलाक़े में बहुत बात हुई, और उसमें एक बात यह भी थी कि लड़के की आँखें वापस आ गईं। अकलू ने यह ख़ुद नहीं देखा।
जो उसने देखा वह यह था कि किसी ने उससे कुछ नहीं कहा।
वह वहीं खड़ा रहा जब तक लोग गए, और वह इस बात के लिए तैयार था कि उससे पूछा जाएगा कि कुआँ खुला क्यों था। उससे नहीं पूछा गया। किसी ने उसकी तरफ़ ग़ुस्से से नहीं देखा। गुरु ने जाते हुए उसका कंधा छुआ और आगे बढ़ गए।
वह घर लौटा और उस रात सोया नहीं और उसे यह समझ आया कि क्यों नहीं पूछा गया। वह रात लंबी थी।
किसी ने उसे इसलिए दोष नहीं दिया क्योंकि किसी ने कभी सोचा ही नहीं था कि यह उसका काम है। कुआँ खोदने वाला खोदता है और चला जाता है। पाट का इंतज़ाम मालिक करता है। यह बात सही थी और वह इससे बच सकता था और उसने पाया कि वह बचना नहीं चाहता।
पाट उसने ख़ुद चढ़वाया।
पत्थर उसने अपने पैसे से ख़रीदा और गढ़वाने वाले को दो क़िस्तों में दिया, और चढ़ाने में उसके दो दिन गए जो कमाई के दिन थे। उसने यह किसी से नहीं कहा और आश्रम में भी नहीं कहा, और उन्होंने पूछा भी नहीं, क्योंकि उन्हें लगा कि इंतज़ाम हो गया।
बाक़ी बारह उसने नहीं ढँके।
उनमें से चार पर पाट पहले से था। आठ खुले थे, या अधूरे थे, या उन पर वही झाड़ियाँ पड़ी थीं। उसने गिनकर देखा था और उसने दाम का हिसाब भी लगाया था, एक शाम, बैठकर, और वह हिसाब उसकी पूरी साल की कमाई से ज़्यादा निकला। रक़म बड़ी थी।
उसने वह हिसाब लगाया और उसे छोड़ दिया।
इसके बाद उसने अपने काम में एक चीज़ बदली। जो नया कुआँ वह लेता है, उसका पाट अब वह सौदे में जोड़ता है और पहले ही तय करवाता है, और अगर कोई पाट अलग रखना चाहे तो वह काम नहीं लेता। इसकी वजह से उसे दो काम छोड़ने पड़े और दोनों बार दूसरे आदमी ने ले लिए।
जो आठ खुले हैं वे आज भी खुले हैं। अकलू को उनकी जगह याद है, तीनों गाँवों में, और वह उधर से निकलता है तो देख लेता है कि झाड़ियाँ हटी तो नहीं हैं। इससे ज़्यादा उसने कभी कुछ नहीं किया।