हरदी दिहाड़ी पर हल चलाता था और उसका हिसाब खेत से था, दिन से नहीं।

यह फ़र्क़ मामूली लगता है और है नहीं। दिन का मज़दूर शाम को पैसे लेकर घर जाता है, चाहे काम पूरा हो या न हो। खेत का मज़दूर तब तक कुछ नहीं पाता जब तक खेत पूरा न जुत जाए। अगर ज़मीन ठीक नहीं है तो उसका दिन बेकार गया।

और गीली ज़मीन जोती नहीं जाती। हल नीचे धँसता है, बैल थकते हैं, और जो कूँड़ बनती है वह बैठ जाती है।

उस खेत में उसे तीन दिन से जाना था।

वह आश्रम का खेत था और उसका काम पिछले बरस से चला आ रहा था। पैसा वहाँ से ठीक मिलता था, देर से मिलता था पर पूरा मिलता था, और हरदी को इससे कोई शिकायत नहीं थी।

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तीनों दिन वह लौट आया था। ऊपर वाली नहर से पानी छूटा हुआ था और खेत भरा हुआ था।

चौथे दिन वह अँधेरे में ही निकल पड़ा।

उसकी सोच सीधी थी। अगर रात में पानी उतर गया होगा तो सुबह की ठंडी ज़मीन जुत जाएगी, और अगर वह देर से पहुँचा तो धूप में ऊपर की परत सूख जाएगी और नीचे गीली रहेगी, जो सबसे ख़राब हालत होती है।

बैल आगे थे और वह पीछे था और अभी ठीक से उजाला नहीं हुआ था।

मेड़ पर पहुँचकर उसने पहले पानी देखा।

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पानी नहीं जा रहा था।

यह उसके लिए अच्छी ख़बर थी और उसने अपने आप से यही कहा। उसने आगे बढ़कर देखा कि दरार कहाँ है, क्योंकि दरार तो थी, वह उसे पहले दिन ही दिख गई थी। ऊपर की मेड़ बीच से टूटी थी और वहीं से पानी नीचे उतर रहा था।

दरार में कुछ था।

उसने पहले सोचा कि किसी ने बोरी में मिट्टी भरकर डाल दी है, जो लोग डालते हैं और जो टिकती नहीं।

फिर वह हिला।

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हरदी वहीं रुक गया और उसने बैलों को रोका। उजाला थोड़ा और हुआ। दरार में एक लड़का लेटा हुआ था, पेट के बल, आड़ा, और पानी उसकी पीठ के ऊपर से नहीं जा रहा था क्योंकि उसने अपने ऊपर मिट्टी और घास खींच रखी थी।

वह पंद्रह सोलह का रहा होगा।

हरदी ने उसे उठाने की कोशिश की। लड़के ने मना कर दिया।

यह उस पूरी सुबह की सबसे अजीब बात थी और हरदी उसे कभी ठीक से नहीं समझा सका। उसने बाँह पकड़ी और खींचा और लड़का हिला नहीं और उसने कहा कि नहीं।

हरदी ने पूछा कि कब से।

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लड़के ने बताया कि रात से।

उसने पूछा कि हटता क्यों नहीं। लड़के ने जो कहा उसमें उसके गुरु का नाम था और यह भी था कि उसे रोकने को कहा गया था और उससे रुकी नहीं, इसलिए वह ख़ुद वहाँ लेट गया।

हरदी ने कहा कि अब सुबह हो गई है, अब उठ जा।

लड़के ने कहा कि उसे किसी ने उठने को नहीं कहा।

इसके आगे हरदी के पास कुछ नहीं था।

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वह उसे ज़बरदस्ती नहीं उठा सकता था। पंद्रह बरस का लड़का, आधी रात से पानी में, अकड़ा हुआ, और अगर उसे खींचकर निकालो तो पानी उसी वक़्त पूरे ज़ोर से नीचे वाले खेत में जाएगा। यह भी एक वजह थी और हरदी ने आगे चलकर माना कि यह उसके दिमाग़ में उस वक़्त आई थी।

वह बैल लेकर आश्रम की तरफ़ गया और उसने वहाँ बता दिया।

उसके बाद जो हुआ, उसमें वह नहीं था।

लोग आए। गुरु आए। लड़के को गुरु के कहने पर उठाया गया और वह अपने आप उठा, और उस दिन उसे लेकर बहुत कुछ कहा गया, और वह सब हरदी ने बाद में सुना।

उसका अपना दिन गया।

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पाँचवाँ दिन भी गया, क्योंकि मेड़ बनने में समय लगा। छठे दिन वह जुता। हरदी को उसकी मज़दूरी मिली, पूरी, और पाँच दिन का कुछ नहीं मिला, जो ठीक ही था क्योंकि उसने काम नहीं किया था।

अब आख़िरी बात, और वह उसके बारे में है, लड़के के बारे में नहीं।

यह उसने बहुत बार सुनाया।

यह उसके पास सुनाने लायक़ इकलौती चीज़ थी। दिहाड़ी पर हल चलाने वाले के जीवन में और कुछ नहीं होता। लोग सुनते थे और आगे सुनाते थे, और उससे बार-बार पूछते थे।

और हर बार वह थोड़ा आगे बढ़ता गया।

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पहले बरसों में वह कहता था कि उसने देखा और आश्रम को ख़बर की। दस बरस बाद वह यह कहने लगा कि उसने उससे बहुत देर बात की और समझाया। बीस बरस बाद उसकी बात में यह आ गया कि उसने उसे बाहर निकाला।

उसे मालूम है कि उसने नहीं निकाला।

यह उसे हर बार बताते हुए मालूम रहता है। पर सुनने वाले उस जगह पर रुक जाते हैं और आगे झुक जाते हैं, और अगर वहाँ कह दो कि मैंने उसे छोड़ दिया और चला गया, तो बात वहीं बैठ जाती है और लोग उठकर चले जाते हैं।

अब वह बहुत बूढ़ा है और उससे कोई नहीं पूछता। जब कोई पूछता है तो वह वही सुनाता है, वैसे ही, बाहर निकालने वाला हिस्सा भी, और उसके बाद चुप हो जाता है।