छावनी में पहिये का काम रात में होता है और यह बात लड़ने वालों को कभी समझ नहीं आती।

दिन में रथ बाहर रहते हैं। शाम को लौटते हैं और तब पता चलता है कि किसका क्या गया। मिठ्ठन के पास वे रात भर आते रहते थे। हर एक को सुबह से पहले लौटाना होता था, वरना उस दिन वह रथ खड़ा रह जाता, और खड़े रथ का हिसाब किसी और के पास जाता था।

पहिये में असल चीज़ तीलियाँ हैं। नाभि और हाल के बीच जो लकड़ी की छड़ें लगती हैं, वही पूरा बोझ लेती हैं। वे सूखी होनी चाहिए, बहुत सूखी। सुखाने में महीने लगते हैं।

मिठ्ठन के पास सूखी तीलियों का एक गट्ठर हमेशा रहता था और उसे वह अपने सिरहाने रखता था। यह उसकी सबसे क़ीमती चीज़ थी और छावनी में उसे इसी से जाना जाता था। वह उसे गिनकर रखता था।

उस बरस लड़ाई लंबी खिंच गई और गट्ठर घटता चला गया।

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उस रात तीन रथ आए और तीनों को सुबह चाहिए था। सूखी तीलियाँ चार बची थीं। ज़रूरत सात की थी।

उसने वही किया जो उस हालत में किया जाता है। उसने अधसूखी लकड़ी में से सबसे अच्छी चुनी, उसे छीला, तेल में डुबोया, और आग के पास रखकर जितना सुखा सकता था सुखाया।

तेल का यह काम पुराना है और इसका फ़ायदा यह है कि लकड़ी बाहर से कड़ी लगने लगती है। नुक़सान यह है कि भीतर से वह वैसी ही रहती है। मिठ्ठन को यह मालूम था।

छह तीलियाँ उसने सूखी लगाईं और एक वह वाली लगाई।

यह किस रथ में लगी, यह उसे याद है। वह छोटा वाला रथ था, हल्का, जिसमें कम उम्र का चलाता है, और उसका पहिया बाक़ियों से थोड़ा छोटा होता है। उसने वह पहिया सुबह होने से कुछ पहले लौटाया और सो गया। दिन चढ़ आया था।

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उस दिन जो हुआ, उसकी ख़बर छावनी में दोपहर बाद आई।

ख़बर एक साथ नहीं आती। पहले यह आया कि कोई भीतर चला गया है और घिर गया है। फिर यह कि वह बहुत छोटा है। फिर नाम आया और उसके साथ यह भी कि वह अकेला था।

शाम तक जो बात मिठ्ठन तक पहुँची, उसमें पहिये का ज़िक्र था।

कहा गया कि उसका पहिया उतर गया। और यह भी कहा गया कि उसने वही पहिया उठा लिया और उसी से लड़ा, आख़िर तक।

दूसरी बात सुनकर पूरी छावनी में जो हुआ, वह मिठ्ठन के साथ नहीं हुआ।

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उसने वह बात दो बार पूछकर पक्की की। पहिया उठाया गया था। यानी वह उठाने लायक़ बचा था। यानी वह पूरा नहीं बिखरा था। एक तीली टूटने पर पहिया लड़खड़ाता है और उतर सकता है, पर वह एक टुकड़े में रहता है और उसे उठाया जा सकता है।

और पहिया बिना किसी तीली के टूटे भी उतर सकता है। धुरी की कील निकल जाए तो उतर जाता है। नाभि गरम होकर बैठ जाए तो बैठ जाता है। ज़मीन का एक गड्ढा भी उसे उतार देता है।

मिठ्ठन के सामने तीन वजहें थीं और उनमें से एक उसकी थी।

उसके पास इसे जानने का कोई तरीक़ा नहीं था।

लड़ाई के बाद टूटा सामान इकट्ठा होता है और उसमें से जो काम का हो वह निकाल लिया जाता है। मिठ्ठन तीसरे दिन उस ढेर पर गया।

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पहिये वहाँ थे। उसने उन्हें एक-एक करके देखा।

यहीं उसे वह बात समझ आई जो उसने पहले कभी नहीं सोची थी। वह पूरी छावनी के लिए पहिये बनाता था। उस मौसम में उसने चालीस से ऊपर बनाए या सुधारे होंगे। वे सब एक जैसे थे। एक ही नाप, एक ही लकड़ी, एक ही तरह की छिलाई, क्योंकि अच्छे कारीगर का काम यही होता है कि उसके सारे पहिये एक जैसे हों। यही उसकी पहचान थी।

उसने अपने हाथ का काम पहचानने की कोशिश की और नहीं पहचान पाया।

एक पहिया ऐसा था जिसकी एक तीली भीतर से काली पड़ी थी, जैसी तेल वाली पड़ जाती है। पर उस साल तेल उसके अलावा दो और लोगों ने डाला था, क्योंकि सबकी सूखी लकड़ी ख़त्म हो गई थी।

वह उस ढेर पर बहुत देर बैठा रहा और फिर उठकर चला आया।

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उसने किसी को कुछ नहीं बताया और इसकी वजह डर नहीं थी। पूछने वाला कोई था ही नहीं। लड़ाई में पहिये टूटते हैं और उसके बाद कोई यह नहीं पूछता कि कौन सी तीली किसने लगाई थी।

उसका काम चलता रहा। वह बूढ़ा होने तक चलता रहा और उसका हाथ बुढ़ापे तक अच्छा रहा।

एक चीज़ उसके साथ रह गई और वह उसके बस में नहीं थी।

वह टूटा हुआ पहिया देखकर आगे नहीं बढ़ पाता। कोई भी टूटा पहिया। गाँव की बैलगाड़ी का, किसी छकड़े का, रास्ते के किनारे पड़ा हुआ जिसे कोई लेने नहीं आया। वह रुकता है, नीचे बैठता है, और तीलियाँ गिनकर देखता है कि कौन सी गई और वह नाभि की तरफ़ से टूटी या हाल की तरफ़ से।

इसमें उसका समय जाता है और साथ चलने वाले खीजते हैं। वह देख लेने के बाद उठ जाता है और आगे चल देता है और उस पहिये के बारे में कुछ नहीं कहता, क्योंकि कहने को कुछ है भी नहीं। किसी और की गाड़ी है, किसी और का पहिया है, और वह टूट चुका है।