चूल्हे की राख में अभी आँच बची थी जब मैना घर से निकली। सावन का दूसरा हफ़्ता था। रात भर पानी गिरा था और अब नहीं गिर रहा था, पर पत्ते इतने भारी थे कि उनके नीचे से निकलो तो अपने ऊपर एक और बारिश गिरा लो।
वह लकड़ी बीनती थी। बीनना और काटना दो अलग काम हैं, और यह फ़र्क़ जंगल में सबको मालूम रहता है। काटने वाले के पास कुल्हाड़ी होती है और उसका हक़ माना जाता है। बीनने वाला वही उठाता है जो अपने आप गिर चुका हो, इसलिए उसका कोई हक़ नहीं माना जाता। उससे झगड़ा भी कोई नहीं करता, और मैना के हिसाब से यह इस काम की इकलौती अच्छी बात थी।
उसकी लकड़ी नीचे बस्ती के कुम्हार के यहाँ जाती थी, जो आँवा भरता था। बारिश में यह सौदा उलट जाता है। गीली लकड़ी भारी होती है, यानी ढोने में दुगनी लगती है, और दाम उसके आधे मिलते हैं, क्योंकि गीली लकड़ी आँवे में सुलगती भर है, जलती नहीं। सावन में मैना दुगना ढोती थी और आधा पाती थी। पिछले हफ़्ते कुम्हार ने उससे यह भी कह दिया था कि ऊपर वाले टोले से भी अब लकड़ी आने लगी है, और उसने यह बात ऐसे कही थी जैसे मौसम की बात कर रहा हो।
उस सुबह वह ऊपर वाले रास्ते से गई, जो लंबा है पर जिस पर पानी नहीं ठहरता। महुए के नीचे एक लड़का बैठा था।
पहली नज़र में उसे लगा कि कोई खो गया है। लड़का पाँच बरस का रहा होगा, शायद छह। कपड़े इस तरफ़ के बच्चों जैसे नहीं थे, बारीक और ठीक से सिले हुए, पर उन पर जो मिट्टी बैठी थी वह एक दिन की नहीं थी।
उसने पूछा कि घर किधर है। लड़के ने जवाब नहीं दिया। उसने दोबारा पूछा, ज़ोर से, यह सोचकर कि शायद सुनाई कम देता हो। तब भी कुछ नहीं। लड़का आँखें मूँदे बैठा था और उसके होंठ हिल रहे थे, बहुत धीरे, जैसे कोई अपने आप से गिनती कर रहा हो।
मैना ने बोझ उतारा और थोड़ी देर खड़ी रही। उसे लगा कि यह किसी बड़े घर का मामला है और बड़े घरों में बच्चों को सज़ा देने के अपने तरीक़े होते हैं, जिनके बीच में पड़ना उस जैसी औरत के लिए ठीक नहीं। फिर उसने अपनी पोटली खोली। उसमें सत्तू था और गुड़ की एक डली, जो उसका अपना दिन भर का खाना था। उसने दोनों पास पड़े एक चपटे पत्थर पर रख दिए और लड़के से इतना कहा कि यह यहाँ रखा है।
शाम को लौटते हुए उसने देखा कि सत्तू वैसे का वैसा है। गुड़ पर चींटियाँ थीं।
दूसरे दिन उसने फिर रखा। तीसरे दिन भी। चौथे दिन उसने सत्तू में थोड़ा नमक मिला दिया, यह सोचकर कि हो सकता है मीठा उसे पसंद न हो।
इन दिनों में उसका बोझ हल्का रहने लगा। रुकने में समय जाता था, ऊपर वाला रास्ता वैसे भी लंबा है, और कुम्हार का आँवा दोपहर बाद बंद हो जाता था। एक दिन वह देर से पहुँची और उसे लकड़ी वापस लानी पड़ी, जो जंगल का सबसे बेकार काम है, क्योंकि उतरने में बोझ आगे को खींचता है और चढ़ने में पीछे को। उसका अपना लड़का बिरसू आठ बरस का था और जंगल के छोर पर उसका इंतज़ार करता था। आख़िरी हिस्सा वह साथ में उठाता था। उस शाम उसने पूछा कि खाना वापस क्यों आया। मैना ने बस इतना कहा कि गिर गया था।
छठे दिन उस रास्ते से दो आदमी आए। गेरुआ पहने थे और पैदल थे, और उनके पैरों की हालत बता रही थी कि वे बहुत दूर से आ रहे हैं। वे लड़के के पास काफ़ी देर बैठे और धीरे बोलते रहे। मैना थोड़ा हटकर खड़ी रही और सुनती रही। पूरी बात उसे नहीं आई, पर एक नाम दो बार आया।
ध्रुव।
जाते हुए एक ने उससे कहा कि माई, इसे उठाकर ले जाने की कोशिश मत करना। मैना बोली कि मैं क्यों ले जाऊँगी, मेरा अपना एक है। आदमी हँसा नहीं। उसने सिर हिलाया और चला गया, और मैना को बाद में लगा कि उसने सिर हामी में नहीं, किसी और वजह से हिलाया था।
सातवें और आठवें दिन पानी बहुत गिरा। महुए के नीचे भी अब बचाव नहीं था। लड़का उसी जगह था। पानी उसके कंधों से होकर नीचे जा रहा था और वह हिला नहीं। मैना ने आठवें दिन उसके सिर पर अपना गमछा डाल दिया। शाम को वह गमछा वहीं गिरा हुआ मिला, उसी तरह भीगा, और उसने उसे उठाकर निचोड़ लिया।
नौवें दिन वह पत्थर के पास बैठ गई। उसने कहा, सुन, तेरे घर वाले जो भी हों और जो भी उन्होंने किया हो, उसे बाद में देख लेना। पहले यह खा ले। लड़के ने आँखें नहीं खोलीं। मैना कुछ देर बैठी रही और फिर उठ गई। उस दिन उसने सत्तू पत्थर पर नहीं रखा। उसने उसे वापस पोटली में बाँधा और नीचे उतर गई, क्योंकि उस दिन उसे पूरा बोझ पहुँचाना था और पूरा ही पहुँचाया।
दसवें दिन वह जगह ख़ाली थी।
उसने आसपास देखा। न कपड़ा, न कोई निशान, और ज़मीन ऐसी भी नहीं थी जैसी किसी को घसीटने पर होती है। चपटा पत्थर वहीं था और उस पर काई जमने लगी थी। वह थोड़ी देर खड़ी रही, फिर उसने बोझ बाँधा और चल दी, क्योंकि दिन का काम दिन में ही होता है और उस दिन कुम्हार को पंद्रह बोझ चाहिए थे।
उस साल जाड़ों में उसे एक बात दिखी। मैना अँधेरे में निकलती थी, मुर्ग़े से भी पहले, और उसे तारों से अंदाज़ा लगाना आता था कि रात कितनी बची है। तारे सरकते हैं। सब सरकते हैं। पर उत्तर की तरफ़ एक तारा उसे हर बार उसी जगह मिला। पूरा महीना, फिर दूसरा महीना भी।
अब वह उसी से रास्ता तय करती है। जंगल में एक जगह ऐसी है जहाँ तीन पगडंडियाँ एक जैसी दिखती हैं और लोग वहीं भटकते हैं। मैना वहाँ रुकती है, गरदन उठाती है, और सीधी उतर जाती है। बिरसू अब बड़ा है और बोझ वही उठाता है। वह भी उसी जगह रुकता है और उसी तरह ऊपर देखता है, क्योंकि उसने चलना उसके पीछे चलकर सीखा था और रास्ता उसी के साथ याद किया था। उसे यह मालूम नहीं है कि वह क्या देख रहा है। वह बस वहीं रुकता है।