मँगरू के काम में सबसे मुश्किल हिस्सा बटना नहीं था, सुखाना था। ताँत को इतना सुखाओ कि वह भुरभुरा हो जाए तो पहली खींच में टूटती है, और कम सुखाओ तो बरसात में वह लंबी हो जाती है और धनुष ढीला पड़ जाता है। यह बात सीखने में उसे ग्यारह साल लगे थे और अब भी हर मौसम में उसे नए सिरे से तय करना पड़ता था।
वह जंगल के किनारे रहता था, जहाँ बस्ती ख़त्म होती है और उसके बाद कोई नहीं रहता। जगह उसने सोच-समझकर चुनी थी। ताँत की गंध ऐसी होती है कि उसे बस्ती के बीच में कोई बर्दाश्त नहीं करता, और मूँज काटने की जगह भी पास पड़ती थी।
उसके ग्राहक तीन तरह के थे। शिकारी, जो साल में एक डोरी लेते थे और उसी को घिसते रहते थे। नीचे की चौकी के सिपाही, जिनकी डोरियाँ सरकारी थीं और जिन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि वे कैसी हैं। और शौक़ीन लोग, जो शहर से आते थे, महँगी डोरी ख़रीदते थे और दो महीने बाद भी वैसी की वैसी लौटा ले जाते थे, बिना घिसे।
फिर वह लड़का आया।
जाड़ों की शुरुआत थी। लड़का चौदह पंद्रह का रहा होगा, गहरे रंग का, बाल उलझे हुए, और उसके साथ कोई बड़ा नहीं था। उसके हाथ में एक हिरन की ताँत थी, साफ़ की हुई और ठीक से लपेटी हुई। उसने कहा कि इसकी डोरी बना दो, मज़दूरी दे दूँगा।
मँगरू ने ताँत देखी और थोड़ी देर उसे उलटता-पलटता रहा। सफ़ाई अच्छी थी। इतनी अच्छी कि उसने पूछ ही लिया कि यह किसने साफ़ की। लड़के ने इतना ही कहा कि मैंने।
पहली डोरी उसने अठारह दिन में ली। यह मँगरू को याद है क्योंकि उसे लगा कि लड़का खो गया या डोरी बेच दी। दूसरी डोरी उसने चौबीस दिन में ली।
तीसरी के बाद मँगरू ने दीवार पर लकीर खींचनी शुरू कर दी। वह हिसाब रखने के लिए नहीं था। वह इसलिए था कि उसे अपने आप पर भरोसा नहीं हो रहा था।
क्योंकि डोरी बनाने वाला यह जानता है, और शायद उसके सिवा कोई नहीं जानता, कि आदमी कितना चलाता है। धनुष देखकर कुछ पता नहीं चलता। तरकश देखकर भी नहीं। पर डोरी घिसती है वहीं से, जहाँ उँगलियाँ पड़ती हैं और जहाँ बाण की गाँठ बैठती है, और उस घिसाव को छूकर बताया जा सकता है कि कितनी बार खींची गई है। शिकारी की डोरी में साल भर में एक चपटी जगह बनती है। इस लड़के की डोरी में वह जगह डेढ़ महीने में बन जाती थी और उसके बग़ल में दूसरी बनने लगती थी।
उस साल लड़के ने सत्रह डोरियाँ लीं।
मँगरू ने अपनी पूरी उम्र में किसी को छह से ज़्यादा लेते नहीं देखा था। उसने एक बार पूछने की कोशिश की कि तू करता क्या है इतना। लड़के ने कहा कि अभ्यास। बस इतना। मँगरू ने पूछा कि किसके पास। लड़के ने जवाब नहीं दिया और मज़दूरी रखकर चला गया।
उस पूरे साल में मँगरू ने एक बात और देखी। लड़का हर बार ताँत ख़ुद लाता था, और उसकी सफ़ाई हर बार पहले से थोड़ी बेहतर होती थी। यानी वह डोरी की मज़दूरी देते हुए डोरी बनाना भी सीख रहा था, और मँगरू को यह बुरा नहीं लगा। उसे उम्मीद रही कि किसी दिन लड़का पूछेगा कि बटते कैसे हैं, और वह बता देगा, क्योंकि उसके अपने लड़के लखना का इस काम में मन नहीं लगता था और यह हुनर उसके साथ ही ख़त्म होने वाला था।
पूछने से पहले ही अगला जाड़ा आ गया।
इस बार लड़का सत्रहवीं के बाद तीन महीने नहीं आया। मँगरू ने तब तक उसके लिए एक डोरी अलग बना रखी थी। वह उसकी सबसे अच्छी चीज़ थी। तीन ताँतों की, बीच में मूँज की एक पतली परत, ताकि पसीने से फिसले नहीं। उसने वह किसी और को नहीं दी, हालाँकि दो ग्राहकों ने माँगी।
लड़का चौथे महीने आया। दाहिना हाथ कपड़े में बँधा था।
मँगरू ने कपड़ा नहीं खोला। उसे खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि पट्टी की बनावट से पता चल जाता है कि नीचे क्या नहीं है। उसने बस इतना पूछा कि कैसे। लड़के ने बताया कि माँगा गया था और उसने दे दिया। किसने माँगा, यह उसने बताया, और मँगरू ने वह नाम पहले सुन रखा था, जैसे उस इलाक़े में सब ने सुन रखा था। द्रोण।
मँगरू कुछ देर चुप रहा। जो बात उसके दिमाग़ में आई वह वह नहीं थी जो शायद किसी और के दिमाग़ में आती। उसने यह सोचा कि इस तरफ़ का हर तीरंदाज़ अँगूठे से खींचता है। डोरी अँगूठे के पहले जोड़ पर बैठती है और बाक़ी उँगलियाँ उसे बस ताला लगाती हैं। दाहिने अँगूठे के बिना उस खींच का कोई तरीक़ा नहीं है। कोई भी नहीं। एक भी नहीं। यह उसका पेशा था और वह इस बारे में ग़लत नहीं हो सकता था।
उसने वह अच्छी वाली डोरी उठाई और लड़के की तरफ़ बढ़ा दी और कहा कि यह ले जा, इसकी मज़दूरी नहीं है।
लड़के ने उसे देखा और वापस रख दिया। फिर उसने कहा कि इससे पतली चाहिए।
मँगरू ने जानना चाहा कि पतली क्यों। लड़के ने अपना बायाँ हाथ उठाया और पहली दो उँगलियाँ आगे कीं, हल्की मुड़ी हुई, और उन्हें पीछे की तरफ़ खींचकर दिखाया। दो उँगलियों की खींच अँगूठे की खींच से कमज़ोर होती है। मोटी डोरी उतनी दूर आती ही नहीं।
यह बात मँगरू को मालूम थी। पर इस तरफ़ यह बात उसने किसी के मुँह से नहीं सुनी थी, क्योंकि इस तरफ़ कोई दो उँगलियों से नहीं चलाता।
उसने पतली बनाई। दो ताँतों की, बिना मूँज के, और उसमें सूखी हुई कड़ाई कम रखी ताकि वह जल्दी बैठ जाए। उसे बनाने में उसे चार दिन लगे, और उन चार दिनों में उसने और कोई काम नहीं लिया।
लड़का उसके बाद आठ बार और आया। मँगरू ने आठों बार वही पतली गोट बनाई और हर बार लकीर खींची। फिर एक बरसात के बाद वह आना बंद हो गया, और मँगरू को कभी पता नहीं चला कि वह मर गया, चला गया, या बस कहीं और से लेने लगा।
पतली डोरी उसने बनानी बंद नहीं की। पहले साल कोई नहीं ले गया। दूसरे साल एक बूढ़े शिकारी ने ले ली, जिसका हाथ काँपता था, और उसने आकर कहा कि यह हल्की खींच में भी पूरी आती है। तीसरे साल दो लोगों ने माँगी। अब वह उसे अलग खूँटी पर टाँगकर रखता है और उसका दाम बाक़ियों से कम है।
लखना बड़ा हो गया और उसने आख़िरकार काम सीख ही लिया, ज़्यादातर इसलिए कि और कुछ मिला नहीं। एक दिन उसने दीवार की लकीरें गिनीं और पूछा कि ये किस चीज़ का हिसाब हैं। मँगरू ने कहा कि एक ग्राहक था। लखना ने पूछा कि इतनी सारी क्यों, तो उसने कहा कि वह बहुत चलाता था। फिर उसने खूँटी की तरफ़ इशारा करके कहा कि वहाँ वाली पतली रोज़ दो बना दिया कर, वे चल जाती हैं।