नौबत का घर छह पीढ़ी से एक ही चीज़ बेचता था और वह चीज़ काग़ज़ नहीं थी, भरोसा थी।

पंचांग में जो लिखा होता है उसका आधा हिस्सा गिनती है। तिथि, पक्ष, सूरज कब निकलेगा, चाँद किस रात कितना रहेगा। यह हिस्सा मुश्किल है पर इसमें राय नहीं चलती, और इसे कोई भी सीख सकता है जिसके पास सब्र हो।

दूसरा आधा हिस्सा वह है जिसके लिए लोग पैसे देते हैं। बोआई किस दिन से, कटाई किस हफ़्ते तक, कब पानी आने की उम्मीद रखनी है, कौन सा दिन सौदे के लिए ठीक है और कौन सा नहीं।

नौबत यह दूसरा हिस्सा उसी पहले हिस्से से निकालता था। तारों की जगह से मौसम का अंदाज़ा उसके परदादा का निकाला हुआ था और तब से उसमें थोड़ा-थोड़ा जोड़ा जाता रहा था। वह जादू नहीं था। वह सौ बरस से ज़्यादा की टीप थी, यह देखते हुए कि किस साल क्या हुआ और उस साल आसमान कैसा था।

उसकी पोथी में सात सौ के क़रीब ग्राहक थे और उनमें से ज़्यादातर बड़े किसान थे।

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उस बरस भादों की एक रात वह छत पर था।

छत पर वह रोज़ जाता था, गिनती के लिए नहीं, आदत के लिए। गिनती वह साल में कुछ ही रातों को करता था। पर आसमान उसने रोज़ देखा था, बचपन से, और आदमी जो चीज़ रोज़ देखता है उसमें फ़र्क़ पहले पकड़ लेता है।

दक्खिन की तरफ़, ऊपर, वहाँ कुछ था।

उसने आँखें मलीं और दोबारा देखा। फिर वह नीचे उतरा, दीया लेकर आया, और पोथी का वह पन्ना निकाला जिस पर उस मौसम का आसमान बना हुआ था। वह नक़्शा उसके बाप ने बनाया था और उसके बाप ने अपने बाप से उतारा था।

उस जगह पर नक़्शे में कुछ नहीं था।

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पहली रात उसने यह सोचकर छोड़ दिया कि आँख का धोखा है। दूसरी रात वे और साफ़ थे। पाँचवीं रात तक बस्ती के और लोग भी ऊपर देखने लगे थे और यह बात मंडी तक पहुँच चुकी थी।

नौबत उन पाँच रातों में सोया नहीं और उसने जो किया वह वही था जो उसे आता था। उसने नापा।

उसने उनकी जगह नापी, तीन अलग रातों में, अपने उसी पुराने तरीक़े से, दो खूँटियों और एक डोरी से। तीनों बार वे थोड़ा हट चुके थे, यानी वे बाक़ी आसमान के साथ चल रहे थे और ठहरे हुए नहीं थे।

इससे एक बात तय हो गई। वे थे। जो चीज़ चलती है और नापी जा सकती है, वह आँख का धोखा नहीं होती।

और इसी से दूसरी बात तय हो गई, जो उसके लिए बहुत बुरी थी।

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उसका पूरा हिसाब इस बात पर टिका था कि आसमान वही रहता है। सौ बरस की टीप का मतलब ही यही है, कि जो पहले उस जगह पर था वह अगले बरस भी वहीं होगा, इसलिए पिछले बरसों का सबक़ अगले बरस काम आएगा। अगर आसमान में नई चीज़ें आ सकती हैं, तो उसकी टीप का आधार ही नहीं रहा।

उस बरस का पंचांग बिक चुका था।

बोआई की तारीख़ें उसमें छपी थीं और सात सौ घरों में पहुँच चुकी थीं। नौबत ने उन तारीख़ों में कुछ ग़लत नहीं किया था और वह यह भी नहीं जानता था कि वे ग़लत हैं। उसे बस यह पता था कि अब उसके पास यह कहने की कोई वजह नहीं बची कि वे सही हैं।

मौसम उस साल ठीक-ठाक रहा। किसी का नुक़सान नहीं हुआ।

यह सबसे मुश्किल हिस्सा था। अगर नुक़सान हो जाता तो बात साफ़ हो जाती। नुक़सान नहीं हुआ, इसलिए किसी को कुछ पता नहीं चला, और नौबत के सिवा किसी के लिए कुछ बदला नहीं।

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अगले बरस उसने पंचांग निकाला और उसमें से दूसरा आधा हिस्सा नहीं डाला।

गिनती वाला हिस्सा पूरा था। तिथि, पक्ष, सूरज, चाँद, सब। बोआई की तारीख़ें नहीं थीं। सौदे के दिन नहीं थे। पानी का अंदाज़ा नहीं था।

उसने आगे कोई सफ़ाई नहीं छापी और किसी को कुछ समझाया भी नहीं।

उस पंचांग के दाम एक तिहाई रह गए, क्योंकि गिनती दूसरे लोग भी कर लेते हैं और वह किसी को दुर्लभ नहीं लगती। सात सौ में से चार सौ ग्राहक अगले बरस दूसरी जगह चले गए। तीसरे बरस और गए।

उसका छोटा भाई उससे लड़ा और घर के लोग भी लड़े और उसने उन सबसे एक ही बात कही, कि जो वह नहीं जानता उसे वह बेच नहीं सकता। इसे किसी ने अच्छा जवाब नहीं माना और नौबत के हिसाब से यह अच्छा जवाब था भी नहीं। बस उसके पास दूसरा नहीं था।

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बुढ़ापे में उसका बड़ा लड़का काम सँभालने लगा।

पहले बरस उसने वैसा ही निकाला। दूसरे बरस उसने बोआई की तारीख़ें वापस डाल दीं।

नौबत ने वह पंचांग देखा। उसने कुछ नहीं कहा, क्योंकि लड़का ग़लत नहीं था। घर में सात लोग थे और तीन कमरे गिर रहे थे, और तारीख़ें डालने से सब ठीक होने लगा, और साल भर में हालत सुधर गई।

अपने लिए वह अपनी वाली पुरानी पोथी से चलता रहा।

उसके पास तीन बीघे थे और वह उन्हीं पर अपने हिसाब से बोता था, उन्हीं तारीख़ों पर जो उसके परदादा की टीप से निकलती थीं, यह जानते हुए कि वह टीप अब भरोसे लायक़ नहीं है। उसकी फ़सल हर साल आसपास वालों से थोड़ी कम होती थी। ज़्यादा कम नहीं। बस थोड़ी सी, हर साल, और वह इसका ज़िक्र कभी नहीं करता था।