दुखहरन को साल में दो बार अनाज मिलता था। एक बार फ़सल पर, एक बार जाड़ों में।

यह उसके बाप को मिलता था और उससे पहले उसके दादा को। किसके हुक्म से मिलता था, यह अब किसी को याद नहीं था। अनाज एक बड़े घर से आता था जो चार कोस दूर था और जिसका कोई आदमी कभी उससे मिलने नहीं आया।

काम एक ही था। नाले को खुला रखना।

वह नाला मैदान के बीच से गुज़रता था और उसमें पानी नहीं था। कभी नहीं था। दुखहरन ने अपनी उम्र में उसमें बरसात का पानी भी ठहरा हुआ नहीं देखा, क्योंकि तली रेतीली थी और पानी बैठ जाता था।

उसका काम था झाड़ी काटना, गिरी मिट्टी हटाना, और जहाँ किनारा बैठ जाए वहाँ उसे चुन देना। तीन कोस लंबा। एक चक्कर में ग्यारह दिन लगते थे और साल में तीन चक्कर लगते थे।

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सबसे ज़्यादा समय किनारे चुनने में जाता था। सूखी नहर का किनारा ऊपर से पक्का दिखता है और भीतर से खोखला होता जाता है, क्योंकि उसमें चूहे और साँप बिल बनाते हैं। दुखहरन उसे लाठी से ठोंककर देखता था और जहाँ आवाज़ पोली आती थी वहाँ खोदकर दोबारा भरता था।

लोग हँसते थे और यह ठीक ही था।

गाँव में उसका नाम ही यही पड़ गया था। बच्चे उसके पीछे बोलते थे कि पानी आ गया क्या। बड़े सीधे नहीं बोलते थे पर उनकी बात भी वही थी।

उसे इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था और इसकी एक साफ़ वजह थी। अनाज आ रहा था। जिस काम का अनाज मिल रहा हो, उस काम को बेवक़ूफ़ी कहने वाले लोग अपनी मज़दूरी की चिंता करें।

एक जगह उसने कोताही की और वह जगह उसे याद रही।

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नाला एक टीले के पास दो हिस्सों में बँटता था। एक हिस्सा गाँव की तरफ़ से होकर नीचे जाता था। दूसरा टीले के उस पार, बंजर की तरफ़, और वह हिस्सा कहीं जाकर ख़त्म हो जाता था।

उस दूसरे हिस्से में उसने बीस बरस से कुछ नहीं किया।

उसमें बबूल उग आए थे और एक जगह पूरा किनारा बैठ चुका था। उसने सोचा था कि जहाँ जाकर कुछ है ही नहीं, वहाँ मेहनत क्यों। उस तरफ़ कोई जाता ही नहीं था, इसलिए यह बात कभी उठी ही नहीं।

पानी उस बरस आया।

कैसे आया, यह अलग बात है और वह उसने भी सुनी और उसमें से कितना सच है यह वह नहीं जानता। उसने अपनी आँख से इतना देखा। जेठ के महीने में, दोपहर को, नाले में आवाज़ आई।

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आवाज़ पहले आई और पानी बाद में।

वह भागकर किनारे पर चढ़ गया और उसने उसे आते देखा। वह साफ़ नहीं था। आगे-आगे झाग थी और उसके नीचे मिट्टी और टहनियाँ थीं, जैसा पहली बार में होता है।

टीले पर पहुँचकर वह बँटा।

गाँव वाली तरफ़ रास्ता साफ़ था, क्योंकि वह उसने बीस दिन पहले ही साफ़ किया था। दूसरी तरफ़ बबूल थे और बैठा हुआ किनारा था।

पानी लगभग पूरा गाँव वाली तरफ़ चला गया।

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इसके बाद जो हुआ, उसमें दुखहरन का नाम कहीं नहीं आया और वह इसके लिए शुक्रगुज़ार रहा।

नीचे वाले नौ खेत उस साल डूब गए। दो घर गिरे। एक बुढ़िया को छत पर से उतारना पड़ा। गाँव में इस पर महीनों बात हुई और बात हमेशा इस पर आकर रुकी कि पानी उस तरफ़ आया ही क्यों।

दुखहरन जानता था कि क्यों।

बाद में उसने अपने आप से यह भी कहा कि बीस बरस की झाड़ी दो दिन में नहीं कटती और वह अकेला आदमी था और यह सब सच था। फिर भी उसे मालूम था कि अगर वह दूसरा हिस्सा खुला होता तो पानी बँट जाता, और नौ खेतों की जगह शायद चार डूबते।

दूसरी बात उसे धीरे-धीरे समझ आई।

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उसका काम ख़त्म हो गया था।

भरे हुए नाले की सफ़ाई नहीं होती। उसमें नाव चलती है और मछली पकड़ी जाती है और घाट बनते हैं, और वे तीनों काम उसे नहीं आते थे। अनाज अगले जाड़े में आया और उसके बाद नहीं आया, और किसी ने उसे बताया भी नहीं कि क्यों नहीं आया।

अड़तीस बरस की मज़दूरी उसी महीने ख़त्म हो गई जिस महीने वह काम की निकली।

उसने कुछ बरस इधर-उधर की मज़दूरी की। फिर उसे एक चीज़ का पता चला।

उसे नाले की तली मालूम थी।

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पूरे तीन कोस की। कहाँ पत्थर है, कहाँ रेत बैठती है, कहाँ किनारा भीतर से खोखला है क्योंकि उसने उसे तीन बार चुना है। यह किसी और को नहीं मालूम था और किसी और को मालूम हो भी नहीं सकता था, क्योंकि अब वह सब पानी के नीचे था।

नाव वाले उसे ले जाने लगे।

वह आगे बैठता है और बताता जाता है कि दाएँ रहो, अब बीच में आ जाओ, यहाँ से मत निकलो। पैसा कम मिलता है और रोज़ नहीं मिलता। पर वह अब तक ग़लत नहीं हुआ है।

नाव वाले उसे मानते हैं और उनमें से कोई यह नहीं समझ पाया कि वह जानता कैसे है। उन्होंने पूछा भी है। दुखहरन उन्हें बता देता है कि वह यहाँ बहुत पुराना है, और वे इसे काफ़ी मान लेते हैं, क्योंकि पानी पर बैठे आदमी के पास आगे पूछने की फ़ुरसत नहीं होती।