धर्मशाला रखने वाला आदमी अपनी इमारत को आँख से नहीं, कान से जानता है।

भिखई को अँधेरे में भी पता रहता था कि कौन कहाँ है। रोशनी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। पिछले बरामदे की तीसरी खटिया की रस्सी ढीली थी और उस पर कोई करवट ले तो एक ख़ास चरमराहट होती थी। सामने वाले कमरे का दरवाज़ा नीचे से घिसा था और खुलते वक़्त फ़र्श पर एक लकीर सी खींचता था। बाहर वाला कुत्ता किसी के आने पर एक तरह से भौंकता था और किसी के जाने पर दूसरी तरह से।

यह सब सीखने का इरादा उसने कभी नहीं किया था। यह सत्रह बरस में अपने आप आ गया था, जैसे किसी भी काम में आ जाता है।

उस रात दो टोलियाँ थीं।

बड़े कमरे में शिकार वाले थे। छह आदमी, घोड़े, और सामान इतना कि उसे उतारने में दो चक्कर लगे। वे शाम को आए थे और उन्होंने मोल-भाव नहीं किया, जो भिखई को अच्छा लगा, क्योंकि जो मोल-भाव नहीं करता वह सुबह झगड़ा भी नहीं करता। यह उसका पुराना अंदाज़ा था।

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पिछले बरामदे में तीन लोग थे। एक जवान लड़का और दो बूढ़े, और दोनों बूढ़ों को दिखाई नहीं देता था। दोनों की उम्र बहुत थी।

लड़का उन्हें बाँस के एक डंडे पर लटकी दो टोकरियों में ढोकर ला रहा था, एक कंधे पर, और भिखई ने अपनी उम्र में यह पहली बार देखा था। उसने डंडा देखा भी था, हाथ में उठाकर, क्योंकि उसे यक़ीन नहीं हुआ कि यह टिकता कैसे है। बाँस बीच से हल्का सा झुका हुआ था और उस झुकाव के दोनों तरफ़ रस्सी के निशान थे जो गहरे हो चुके थे।

उसने लड़के से पैसे नहीं लिए। धर्मशाला में यह चलता है और उससे किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता। लड़के ने ज़िद भी नहीं की।

पानी की बात रात में हुई।

उस साल भीतर वाला कुआँ बैठ गया था। मिट्टी बहुत आ गई थी और उसे साफ़ करवाने में पैसे लगते और भिखई टाल रहा था, यह सोचकर कि बरसात के बाद देखेंगे। पीने का पानी वह सुबह दूर से मँगवाता था और शाम तक वह ख़त्म हो जाता था। उस रात भी ख़त्म था।

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लड़के ने रात में पानी माँगा। बूढ़ों में से एक को प्यास लगी थी।

भिखई ने उसे बताया कि पीछे की तरफ़, पगडंडी से नीचे उतरकर, एक छोटा ताल है जिसमें पानी साफ़ रहता है, और वहाँ जाने में ज़्यादा देर नहीं लगती। उसने यह भी कहा कि रास्ता सीधा है और भटकने की जगह नहीं है। लड़के ने दोहराया नहीं।

यह बात उसने सैकड़ों बार कही थी। उस ताल का पता उसने हर उस आदमी को दिया था जिसे रात में पानी चाहिए था, और सत्रह बरस में कभी कुछ नहीं हुआ था।

लड़का लोटा लेकर गया।

भिखई उस वक़्त बाहर वाली चौकी पर था और उसने लड़के को जाते हुए सुना। पैर की आवाज़ उस पगडंडी पर एक ख़ास तरह की होती है क्योंकि वहाँ छोटे कंकड़ हैं। फिर वह दूर चली गई।

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कुछ देर बाद एक आवाज़ आई।

वह डोरी छूटने की आवाज़ थी और उसके साथ वह छोटी सी सनसनाहट जो उसके बाद आती है। भिखई ने उसे पहचान लिया, क्योंकि उसे पहचानना मुश्किल नहीं है। उसने करवट ली।

वह उठा नहीं।

इसकी कोई ख़ास बात नहीं थी। शिकार वाले लोग रात में निकलते हैं और यह उस मौसम में आम था, और उस इलाक़े में रात का शिकार होता ही है, और उसकी धर्मशाला में ठहरने वाले शिकारी पहले भी रात में चले जाते थे और सुबह लौटते थे। उसने करवट बदली और उसे नींद आ गई।

आगे जो हुआ, वह उसने सुबह जाना और टुकड़ों में जाना।

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शिकार वाले सूरज निकलने से पहले चले गए। जल्दी में गए और उनमें से किसी ने उससे बात नहीं की, और उनका एक कंबल छूट गया जो उन्होंने कभी वापस नहीं माँगा। वह आज भी वहीं है।

पिछले बरामदे में दोनों बूढ़े बैठे थे।

वे रात भर बैठे रहे थे और उन्हें कुछ बताया नहीं गया था। उन्हें सिर्फ़ इतना मालूम था कि लड़का लौटा नहीं। भिखई ने उन्हें कुछ नहीं बताया, क्योंकि उस वक़्त उसे ख़ुद कुछ नहीं पता था, और वह ताल तक गया।

लोटा किनारे पर था। भरा हुआ, सीधा खड़ा, और उसमें से थोड़ा पानी छलककर आसपास की मिट्टी गीली कर चुका था। किनारा साफ़ था।

उस दिन के बारे में भिखई ने बाद में बहुत कम कहा। जो उसने कहा वह इतना ही था कि दोनों बूढ़े उसकी धर्मशाला में ग्यारह दिन रहे और बारहवें दिन चले गए, और उसने उन्हें रोका नहीं क्योंकि उसे नहीं पता था कि किस बात के लिए रोके।

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कुआँ उसने उसी महीने साफ़ करवा लिया।

पर जो चीज़ सचमुच बदली वह कुआँ नहीं था।

उस रात के बाद भिखई रात में सोता नहीं। यह कहने का ढंग है, क्योंकि वह सोता है, पर हर आवाज़ पर उठ जाता है। खटिया की चरमराहट पर उठता है। दरवाज़े की लकीर पर उठता है। कुत्ते के भौंकने पर तो उठता ही है, दोनों तरह के भौंकने पर।

वह लालटेन उठाकर पूरा चक्कर लगाता है, पिछला बरामदा, सामने वाला कमरा, बाहर की चौकी, और फिर वापस आकर लेट जाता है। एक रात में यह चार बार होता है, कभी सात बार।

उसकी घरवाली शुरू में इस पर लड़ती थी और अब नहीं लड़ती। वह कहती है कि आधी रात को जो होना होगा वह हो जाएगा और तुम्हारे उठने से नहीं रुकेगा। भिखई इस बात का जवाब नहीं देता।

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और एक बात उसने अपने आप से तय कर ली, जिसके बारे में उसने कभी किसी से बात नहीं की। वह उस ताल का रास्ता किसी को नहीं बताता। रात में कोई पानी माँगे तो वह कह देता है कि आसपास कुछ नहीं है, और यह झूठ है, और वह इसे जानते हुए बोलता है।

फिर वह लालटेन उठाता है और ख़ुद निकल जाता है। पगडंडी वही है और कंकड़ भी वही हैं और लौटने में उसे आधी रात लग जाती है। बूढ़े आदमी के लिए यह हर बार भारी पड़ता है और जाड़ों में सबसे ज़्यादा। वह लौटकर लोटा माँगने वाले के सामने रख देता है और कुछ कहे बिना अपनी चौकी पर चला जाता है।