पल्टू का काम सुबह की पहली घंटी से दो घंटे पहले शुरू होता था।
पट्टियाँ लकड़ी की थीं और उन पर काली मिट्टी की परत चढ़ती थी, जो सूखने पर खड़िया पकड़ती है। परत बहुत पतली हो तो अक्षर बैठता नहीं, और मोटी हो तो सूखने में समय लगता है और दोपहर तक गीली रहती है। पल्टू यह परत नौ बरस से चढ़ा रहा था और उसका हाथ इतना सध चुका था कि वह देखकर नहीं, उँगली की नोक से बता देता था कि परत ठीक है या नहीं। यह हुनर था।
इसके बाद वह लकीरें डालता था। एक भीगी डोरी को खड़िया में लपेटकर पट्टी पर तानो और बीच से उठाकर छोड़ दो, तो एक सीधी सफ़ेद लकीर पड़ जाती है। हर पट्टी पर पाँच। यह उसका सबसे अच्छा काम था और वह इसे धीरे-धीरे करता था, क्योंकि जल्दी करने पर डोरी टेढ़ी बैठती है।
पाठशाला में सात लड़के थे और सातों बड़े घरों के थे। पल्टू उनमें से किसी को नाम से नहीं बुलाता था, क्योंकि उसे बुलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी।
जो काम उसे बाद में मिला, वह पट्टियों वाला काम नहीं था।
एक शाम भंडार के आदमी ने उसे रोका और कहा कि छुट्टी के बाद पट्टियाँ पोंछने से पहले उसे बताना होगा कि किसने क्या लिखा। पल्टू ने कहा कि वह पढ़ना नहीं जानता। आदमी ने कहा कि इतना तो जानता है। यह सच था। इतने बरसों में जितना बचा-खुचा आदमी सीख जाता है, उतना वह सीख चुका था, और वह अक्षर पहचान लेता था हालाँकि पूरा पढ़ नहीं पाता था। उसने मना नहीं किया।
उसे यह भी बताया गया कि किसकी पट्टी देखनी है।
पहले हफ़्ते कुछ नहीं था। लड़का वही लिखता था जो लिखवाया जाता था, ठीक-ठाक अक्षरों में, लकीर के भीतर। पल्टू ने जाकर यही कहा और उसे लगा कि बात यहीं ख़त्म हो गई। पहला हफ़्ता ऐसे बीता।
दूसरे हफ़्ते पट्टी पर वह चीज़ नहीं थी जो लिखवाई गई थी।
एक नाम था। तीन अक्षर का, और वह पूरी पट्टी पर था, ऊपर से नीचे तक, लकीरों के भीतर भी और उनके बाहर भी, और आख़िरी दो पंक्तियों में अक्षर छोटे होते चले गए थे क्योंकि जगह ख़त्म हो रही थी। बस वही नाम।
पल्टू ने कोठरी का दरवाज़ा भेड़ा और बहुत देर तक उस पट्टी को देखता रहा।
फिर उसने गीला कपड़ा उठाया और उसे पोंछ दिया।
यह उसके काम का हिस्सा था। रोज़ शाम को सारी पट्टियाँ पुँछती थीं और सुबह नई परत चढ़ती थी, वरना अगले दिन लिखने की जगह कहाँ से आती। पर उस दिन के बाद उसे यह बात नए सिरे से समझ आई, कि जो कुछ भी उन पट्टियों पर होता है वह सिर्फ़ उस शाम तक होता है, और उसके बाद उसका कोई निशान कहीं नहीं बचता। पूरी पाठशाला में इकलौता आदमी जो जानता है कि दिन भर में क्या लिखा गया, वह वही है। और वह इसे मिटा चुका होता है।
उसने जाकर बता दिया कि आज कुछ ख़ास नहीं था।
उसने यह डर से नहीं किया। उस वक़्त उसे डर नहीं लगा था। उसने ऐसा इसलिए किया कि जो चीज़ वह मिटा चुका है उसके बारे में कुछ भी कहना उसे बेकार लगा, और यह बहाना उसे उसी शाम अच्छा लगा और आगे बीस दिन तक चला।
बीस दिन बाद दूसरा आदमी लगा दिया गया।
वह पल्टू के साथ बैठने लगा और उसके साथ ही कोठरी में आता था। सीधे कुछ नहीं कहा गया। उसे बस दिखा दिया गया कि अब वह अकेला नहीं है, और पल्टू ने इसका मतलब पहले ही दिन समझ लिया।
उसके बाद के दिन उसकी उम्र के सबसे बुरे दिन थे। लोग समझेंगे कि डर से, और डर उसमें था भी। पर सबसे ज़्यादा उसे यह लगा कि अब उसके पास करने को कुछ नहीं बचा। दूसरा आदमी पट्टी देख लेता था, वही बता देता था, और पल्टू सिर्फ़ पोंछता था। नौ बरस में पहली बार उसका काम सचमुच वही रह गया जो लोग समझते थे कि वह है। पोंछना और चढ़ाना।
जाड़े में लड़के को पाठशाला से हटा लिया गया और फिर जो हुआ उसकी ख़बरें आती रहीं, और पल्टू ने उनमें से किसी पर यक़ीन नहीं किया, क्योंकि वे हर बार अलग होती थीं।
एक बात उसने ख़ुद देखी।
बसंत के आसपास उसे भंडार से एक पुरानी पट्टी लौटाई गई, उन चार में से जो हटाने पर उठा ली गई थीं। उस पर परत चढ़ी हुई थी और वह सूख चुकी थी, और उसका काम उसे साफ़ करके दोबारा तैयार करना था।
परत हटी तो उसके नीचे दबाव के निशान थे।
यह होता है। अगर कोई बहुत ज़ोर से लिखे, बार-बार, उसी जगह, तो खड़िया के नीचे की मिट्टी दब जाती है और मिट्टी के नीचे लकड़ी पर हल्का सा गड्ढा बैठ जाता है। पल्टू ने अपनी पूरी नौकरी में यह दो बार देखा था, दोनों बार उन लड़कों की पट्टी पर जो सज़ा में एक ही चीज़ सौ बार लिखते हैं।
उसने पट्टी को तिरछा करके रोशनी में देखा। तीन अक्षर, पूरी लंबाई में, वही।
वह उस पट्टी को उस दिन तैयार नहीं कर पाया। उसने उसे बाक़ियों के नीचे रख दिया और अगले दिन के लिए दूसरी निकाल ली, और अगले दिन भी उसने वही किया, और फिर उसने उसे रखे रहने दिया।
आठ महीने बाद कोठरी की गिनती हुई और चार पट्टियाँ कम निकलीं, जो उससे पहले भी दो बार हो चुका था, क्योंकि लकड़ी चटकती है और चटकी हुई पट्टी फेंक दी जाती है। किसी ने ज़्यादा नहीं पूछा। पल्टू ने कह दिया कि चटक गई थीं।
वह पट्टी उसकी छत के छप्पर में, बाँस के साथ, बँधी रही।
उसने उसे कभी किसी को नहीं दिखाया और आगे चलकर उसे ख़ुद भी यक़ीन नहीं रहा कि उसने उस पर ठीक देखा था, क्योंकि दबाव के निशान बहुत हल्के होते हैं और तिरछी रोशनी में आदमी को वही दिखता है जो वह देखना चाहता है। यह बात उसने अपने आप से कई बार कही।
छप्पर से उसने उसे फिर भी नहीं निकाला। बरसातों में जब बाँस बदले जाते हैं, वह उसे उतारकर एक तरफ़ रख देता है और नया बाँस चढ़ जाने के बाद वापस बाँध देता है।
बाक़ी सब वैसा ही चलता रहा। वह अब भी सबसे पहले आता है, उसी अँधेरे में, परत चढ़ाता है, डोरी से पाँच लकीरें डालता है, और शाम को सब पोंछ देता है। यह आख़िरी वाला काम उसे सबसे जल्दी आता है और उसमें सबसे कम समय लगता है। कपड़ा एक बार भिगोओ, एक तरफ़ से दूसरी तरफ़, और पट्टी साफ़।