तिजऊ को नौ चूल्हे बनवाने पड़े। ज़मीन खोदकर, क़तार में, हवा के रुख़ के हिसाब से। यह काम उसने दो दिन में किया और यह उस पूरे आयोजन का सबसे आसान हिस्सा था।
मुश्किल हिस्सा गिनती थी।
उससे कहा गया था कि चार सौ आएँगे। रसोइया जानता है कि चार सौ का मतलब पाँच सौ है। लोग साथ में लोग लाते हैं और कोई किसी को मना नहीं करता, और जिस घर के दरवाज़े पर से कोई भूखा लौट जाए उस घर की बात बरसों चलती है।
उसने पाँच सौ का हिसाब बाँधा और सामान की सूची भिजवा दी।
सूची लौट आई।
उसे बुलाकर बताया गया कि दूध और घी बाहर से नहीं आएगा। घर की गायें हैं, उन्हीं से चलेगा। तिजऊ ने हामी भर दी और गोशाला की तरफ़ चला गया, क्योंकि रसोइया सामान देखे बिना हामी नहीं भरता।
गायें उसने देखीं।
वह उन्हें गिनकर नहीं देखता, थन देखकर देखता है। यह उसका काम है और इसमें वह ग़लत नहीं होता।
उनतालीस गायें थीं। उनमें से ग्यारह बूढ़ी थीं। सात ऐसी थीं जो अब ब्याने लायक़ नहीं रहीं। चार लंगड़ी थीं। जो बची, उनसे उस पूरे आयोजन के लिए दूध निकलना मुश्किल था और घी तो बिलकुल नहीं।
उसने यह ऊपर कहला भेजा।
जवाब आया कि जो है उसी में करो।
यह जवाब उसने पहले भी सुना था। हर बड़े आयोजन में सुनाई देता है। उसने चूल्हे की तरफ़ लौटकर अपने आदमियों से कह दिया कि घी हाथ रोककर लगेगा और खीर पतली रहेगी।
फिर उसे असली बात पता चली।
वे गायें वहाँ रहने के लिए नहीं थीं। वे दान में जा रही थीं। पूरा आयोजन ही इसी के लिए था, कि घर का सब कुछ दे दिया जाए, और गायें उसी सब कुछ में थीं।
तिजऊ इस पर हँसा नहीं और नाराज़ भी नहीं हुआ। उसने बस यह सोचा कि जो गायें कल यहाँ से चली जाएँगी, उनका दूध आज की खीर में जा रहा है, और दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते। यह गिनती का सवाल था और गिनती उसका पेशा थी।
उसने दो दिन पहले से दूध जमा करना शुरू कर दिया और तीन दिन का घी एक दिन में निकलवा लिया।
आयोजन वाले दिन वह चूल्हों के पीछे था।
वहाँ से आँगन दिखता था। वह देखता रहा कि कौन सी गाय किसके साथ जा रही है। ग्यारह बूढ़ी वालियों में से नौ पहले दो पहर में निकल गईं। जो अच्छी थीं, वे बाद तक खड़ी रहीं।
फिर वह लड़का आया।
वह घर का ही था और तेरह चौदह का रहा होगा। वह गायों की तरफ़ से आ रहा था और उसके कपड़ों पर गोबर लगा था, जो उस दिन उस घर के किसी बच्चे पर नहीं होना चाहिए था।
उसने अपने बाप से एक बात कही। तिजऊ ने वह पूरी नहीं सुनी। उसे इतना सुनाई दिया कि लड़का पूछ रहा था कि जो दिया जा रहा है वह किस काम का है।
आँगन में चुप्पी हो गई और फिर बात बढ़ गई।
लड़के ने तीन बार एक ही सवाल पूछा। तीसरी बार में बाप ने जो जवाब दिया वह पूरे आँगन ने सुना, और तिजऊ ने भी सुना, और वह ऐसा जवाब था जो कोई बाप सोचकर नहीं देता।
लड़का चला गया।
आयोजन नहीं रुका। यह कहने में बुरा लगता है पर सच यही है। चार सौ लोग बैठ चुके थे और पत्तल बिछ चुकी थीं, और तिजऊ के नौ चूल्हों पर चीज़ें चढ़ी हुई थीं जिन्हें उतारना ही था। उसने खाना परोसा और वह ठीक बना था।
रात को उसके आदमी बर्तन माँज रहे थे।
तिजऊ ने एक चूल्हा नहीं बुझाया।
सबसे किनारे वाला, छोटा, जिस पर पानी गरम होता था। उसने उसमें रात को उपले डलवाए और सुबह फिर डलवाए। किसी ने पूछा तो उसका जवाब था कि पानी की ज़रूरत पड़ती रहेगी।
उस घर में जो होता है वह रसोइया नहीं करता। यह उसका घर नहीं था और वह लड़का उसका कोई नहीं था। पर घर में जब कोई बाहर गया हो और लौटना हो, तो चूल्हा नहीं बुझाते। यह उसकी माँ करती थी और उसने यह बिना सोचे किया।
पहला दिन गया। दूसरा गया।
दूसरी रात उसके साथ वाले ने कहा कि उपले बेकार जा रहे हैं। तिजऊ ने कहा कि जा रहे हैं तो जाएँ।
तीसरे दिन दोपहर बाद लड़का लौट आया।
वह अकेला आया और उसी तरफ़ से आया जिस तरफ़ गया था। घर में जो हुआ, वह अपनी जगह हुआ, और तिजऊ को उससे कोई मतलब नहीं था। उसका मतलब इतना था कि तीन दिन का भूखा लड़का सामने था।
उसने उसे बिठाया और खिलाया। उस चूल्हे पर बना हुआ, ताज़ा, क्योंकि आग चालू थी और चालू आग पर बीस मिनट में खाना बन जाता है।
लड़का धीरे खा रहा था।
तिजऊ ने यह देखा और उसे तसल्ली हुई। बहुत भूखा आदमी अगर तेज़ खाए तो पेट उसे लौटा देता है और तब हालत और ख़राब होती है। जो धीरे खाता है वह ठीक हो जाता है। यह उसने अकाल के बरसों में सीखा था, जब वह जवान था और लंगर में काम करता था, और उसे यह देखकर हर बार वही तसल्ली होती है।
उसने लड़के से कुछ नहीं पूछा। वह पास बैठा रहा और उसे खाते हुए देखता रहा, और जब उसने हाथ रोका तो उसने थोड़ा और डाल दिया, थोड़ा ही, जितना ऐसे वक़्त में डाला जाता है।