फेकू के छत्ते उन्नीस पेड़ों पर थे और वे सब एक ही ढलान पर थे।

यह उसने चुना नहीं था। उस ढलान पर एक ख़ास झाड़ी उगती है जिसमें जाड़ों के बाद फूल आते हैं, और मक्खी उसी के पीछे बैठती है। बाक़ी जंगल में वह झाड़ी नहीं है।

साल में दो बार वह शहद निकालता था और उसे नीचे बस्ती में ले जाकर बेचता था, जहाँ उसके पुराने ग्राहक थे।

और बस्ती घटती जा रही थी।

यह उसकी सबसे बड़ी परेशानी थी और उसका उसके काम से कोई लेना-देना नहीं था। जो आश्रम वहाँ था, वह ख़ाली होता जा रहा था। लोग नीचे की तरफ़ जा रहे थे, जहाँ रास्ता चौड़ा था। हर बरस दो-चार घर कम हो जाते थे और फेकू का शहद उतना ही बचा रह जाता था।

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उस पूरी ढलान पर उसके अलावा एक ही आदमी रोज़ आता था।

वह बूढ़ी औरत थी और वह वहाँ बहुत पहले से थी। कितने पहले से, यह फेकू को नहीं मालूम, क्योंकि जब वह अपने बाप के साथ पहली बार वहाँ आया था तब भी वह वहीं थी और तब भी बूढ़ी थी।

वह वहाँ बेर तोड़ती थी, और वही उसका सारा दिन था।

उसके तोड़ने का तरीक़ा फेकू को अजीब लगता था। वह एक बेर तोड़ती, उसे चखती, और फिर या तो अपनी टोकरी में डालती या नीचे गिरा देती। हर एक को। पूरे दिन।

इसमें बहुत समय जाता है और उससे फ़ायदा कुछ नहीं होता, क्योंकि चखा हुआ फल बेचा नहीं जा सकता। फेकू ने उससे एक बार यह कहा भी था। उसने सुन लिया और वही करती रही।

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उनकी जान-पहचान इतनी ही थी। सुबह वह ऊपर जाता, वह नीचे बैठी होती, और वे एक-दूसरे को देख लेते।

फिर उसने पूछना शुरू किया।

सवाल हमेशा एक ही रहा। नीचे रास्ते पर कोई आया।

फेकू ही उस ढलान का इकलौता आदमी था जो हफ़्ते में दो बार नीचे उतरता था और सड़क तक जाता था। यानी ख़बर उसी के पास होती थी। यह उसने कभी अपनी अहमियत नहीं समझी, क्योंकि ख़बर होती ही क्या थी। बैलगाड़ियाँ, नमक वाले, बरसात में कोई नहीं।

पहले कुछ बरस उसने जवाब दे दिया। नहीं। कोई नहीं आया।

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फिर उसे यह बुरा लगने लगा।

इसका कारण वह ठीक से नहीं बता सकता। शायद यह कि सवाल हर बार एक ही ढंग से पूछा जाता था, बिना उम्मीद के भी नहीं और बहुत उम्मीद से भी नहीं, और जवाब देने वाले पर उसका बोझ पड़ने लगता है।

इसलिए उसने रास्ता बदल लिया।

ऊपर जाने के दो रास्ते थे। सीधा वाला उसके पास से होकर जाता था। दूसरा नाले के साथ-साथ घूमकर ऊपर निकलता था और उसमें आधा पहर ज़्यादा लगता था और चढ़ाई तेज़ थी।

वह उसी घूमने वाले रास्ते से जाने लगा।

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चार बरस उसने यह किया। जाड़ों में इससे उसकी साँस फूलती थी और बरसात में उस रास्ते पर फिसलन रहती थी और एक बार वह गिरकर घुटना छिलवा बैठा।

फिर उसने यह छोड़ दिया और वापस सीधे रास्ते से जाने लगा और सवाल का जवाब देने लगा।

यह भी उसने तय करके नहीं किया। एक दिन जल्दी थी और वह सीधा चला गया, और उससे पूछा गया, और उसने कह दिया कि नहीं, और उसके बाद वह रोज़ उसी से जाता रहा।

जिस दिन जवाब बदला, वह गरमी के आख़िरी दिन थे।

वह नीचे गया था और सड़क पर दो लोग आते दिखे थे, पैदल, और उनके साथ कोई नहीं था। यह ख़ास बात नहीं होती। पर उसे किसी ने बताया कि वे ऊपर की तरफ़ पूछ रहे थे।

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वह लौटा और उसने उससे यह कह दिया, वैसे ही जैसे वह बाक़ी सब कहता था।

उसने जो किया, उसकी उम्मीद फेकू को नहीं थी। वह भागी नहीं और रोई नहीं। वह उठी और उसने अपनी टोकरी उलटकर ख़ाली की और चलकर पेड़ों की तरफ़ गई और तोड़ना शुरू किया, और वह पहले से तेज़ तोड़ रही थी।

उसके बाद जो हुआ, फेकू वहाँ नहीं था। उसे अपने छत्ते देखने ऊपर जाना था और वह ऊपर चला गया, और दोपहर तक वहीं रहा।

नीचे उतरा तो उस ढलान पर लोग जमा थे।

आगे की बात उसने दूसरों से सुनी और वह हर बताने वाले से अलग सुनी, इसलिए उसने उनमें से किसी को पूरा नहीं माना।

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अब उस पूरी बात का आख़िरी हिस्सा, जो उसका अपना है।

उस जगह पर लोग आने लगे।

पहले साल में कुछ। फिर हर बरस थोड़े और। वे उस ढलान तक चढ़ते हैं, उन पेड़ों को देखते हैं, कुछ देर बैठते हैं और उतर जाते हैं।

चढ़ाई लंबी है और ऊपर कुछ मिलता नहीं है। फेकू वहीं बैठता है और शहद बेचता है।

वह अच्छा चलता है। इतना अच्छा कि उसने छह छत्ते और लगा लिए और अब उसे नीचे बस्ती तक जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

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उसे यह पूरी तरह ठीक नहीं लगता।

उसने इसके बारे में सोचा है, कई बार, और वह इस नतीजे पर नहीं पहुँच पाया कि इसमें ग़लत क्या है। वह शहद बेचता है, अच्छा शहद, पूरे दाम पर, और जो लोग वहाँ आते हैं वे प्यासे होते हैं और चढ़ाई से थके होते हैं। इसमें कहीं कोई बेईमानी नहीं है।

फिर भी वह हर बार पैसे लेते हुए एक पल रुकता है। बस एक पल। उसके बाद वह उन्हें अपनी जेब में डाल लेता है और अगले आदमी की तरफ़ मुड़ जाता है।