समंदर हर रात एक लकीर छोड़ जाता है और सुबह वह लकीर वहीं पड़ी रहती है।
सोनई उसी पर चलती थी। सूरज निकलने से पहले, नंगे पैर, बाएँ से दाएँ, क्योंकि उस तरफ़ की हवा पीठ पर पड़ती है और आँखों में रेत नहीं आती। जो काम का हो वह टोकरी में, जो न हो वह वहीं।
इस काम को लोग बीनना कहते हैं और बाहर वालों को यह सबसे आसान काम लगता है। तीस बरस में सोनई ने जो सीखा वह ज़्यादातर यह था कि क्या नहीं उठाना। बस इतना।
सीप उठती है, पर वही जिसका किनारा साबुत हो, वरना चूना बनाने वाला उसे तौल में नहीं गिनता। नारियल की जटा उठती है, पर पूरी तरह भीगी हुई नहीं, क्योंकि वह सूखने में तीन दिन लेती है और उतने में उसमें बदबू आ जाती है। लकड़ी उठती है, बशर्ते उसमें कीड़ा न लगा हो। और एक नियम सबसे ऊपर था, जो उसकी माँ ने उसे बहुत छोटी उम्र में दिया था और जो उसने कभी नहीं तोड़ा।
जो चीज़ पहचान में न आए, उसे छोड़ देना है।
यह नियम डर का नहीं है। यह हिसाब का है। किनारे पर आने वाली नब्बे चीज़ें जानी-पहचानी होती हैं और उन्हीं से घर चलता है। जो दसवीं चीज़ अनोखी दिखती है, उसमें से नौ बार कुछ नहीं निकलता और एक बार कुछ ऐसा निकलता है जो हाथ जला देता है या पेट ख़राब कर देता है, और उस एक बार की भरपाई बाक़ी नौ से नहीं होती। यही पूरा हिसाब है।
उस बरस पानी अजीब चलने लगा था।
पहले धारा बदली। सोनई को यह सबसे पहले पता चला, और अपनी किसी ख़ूबी से नहीं। लकीर की जगह रोज़ बदलने लगी थी और वह रोज़ वहीं चलती थी। तीस बरस में वह लकीर उस चट्टान से तीन क़दम इधर या उधर रहती थी। अब वह कभी बीस क़दम ऊपर होती, कभी नीचे।
फिर चीज़ें बदलीं।
पहले हफ़्ते में उसे तीन ऐसी सीपें मिलीं जो उस तरफ़ की नहीं थीं। वे गहरे पानी की थीं और वे किनारे पर तभी आती हैं जब नीचे कुछ बहुत हिला हो। उसने उन्हें उठा लिया, क्योंकि सीप पहचान में आती थी।
दूसरे हफ़्ते में जो आया वह पहचान में नहीं आया।
उसने उसे नहीं उठाया। उसने उसे छड़ी से पलटा भी नहीं, क्योंकि उस वक़्त उसके पास छड़ी नहीं थी। उसने उसे देखा और आगे बढ़ गई और शाम को उसने अपनी बहन से यह बात कही और बहन ने कहा कि तू पगली है, उठा लेती।
तीसरे हफ़्ते तक पूरा गाँव किनारे पर था।
यह सबसे बुरा हिस्सा था और सोनई इसके बारे में बाद में भी बिना ग़ुस्से के बात नहीं कर पाई। जो लोग तीस बरस उस लकीर पर नहीं आए थे, वे अब सूरज से पहले आ रहे थे। वे दौड़ते थे। वे एक-दूसरे से चीज़ें छीनते थे। वे उठाते सब कुछ थे, बिना देखे, और जो उनके काम का नहीं होता उसे वे वहीं तोड़कर छोड़ जाते थे, जिससे अगली सुबह लकीर पर सिर्फ़ टूटा हुआ रह जाता था।
सोनई को धक्का देकर हटाया गया। दो बार। दूसरी बार गिरने से उसकी टोकरी टूटी और वह उसने ख़ुद बनाई थी। वह दो दिन घर बैठी।
उस पूरे महीने में उसने जितना बीना, उतना वह किसी आम हफ़्ते में बीन लेती थी।
फिर वह चीज़ आई जिसके बाद किनारा ख़ाली हो गया।
सोनई ने उसे नहीं देखा और वह इस पर आज तक क़ायम है। उस सुबह वह देर से निकली थी, क्योंकि भीड़ के डर से उसने आना कम कर दिया था। जब वह पहुँची तो लोग ऊपर की तरफ़ भाग रहे थे और हवा में एक गंध थी जो उसने पहले कभी नहीं सूँघी थी। वह मछली की नहीं थी और सड़ने की भी नहीं थी।
वह उसी जगह रुक गई और वापस मुड़ गई।
उस हफ़्ते जो लोग बीमार पड़े, उनमें ज़्यादातर वही थे जो सबसे आगे थे। कुछ के हाथों की खाल गई। दो बच्चे कई दिन उलटी करते रहे। एक बूढ़ा ठीक नहीं हुआ।
सोनई के घर में कोई बीमार नहीं पड़ा और गाँव में इसे लेकर बात हुई, और उस बात में से आधी अच्छी नहीं थी। कुछ लोगों ने कहा कि उसे पहले से पता था। यह सच नहीं था और वह इसे साबित नहीं कर सकती थी, क्योंकि जो आदमी कुछ न उठाए उसके पास दिखाने को कुछ नहीं होता।
पानी दो महीने में ठीक हो गया। लकीर वापस अपनी पुरानी जगह पर आ गई। सीपें वही आने लगीं जो पहले आती थीं।
भीड़ भी उतनी ही तेज़ी से हट गई जितनी तेज़ी से आई थी। जिन लोगों ने उन दिनों जो कुछ उठाया था, उसका ज़्यादातर हिस्सा किसी काम का नहीं निकला, और एक-दो घरों में जो निकला उसकी बात अब भी होती है।
सोनई ने अपना काम वहीं से शुरू किया जहाँ छोड़ा था।
एक चीज़ बदल गई। वह अब छड़ लेकर चलती है। बबूल की, अपनी कमर तक की, नीचे से घिसी हुई। वह रोज़ उसे साथ ले जाती है। हर चीज़ को वह पहले उससे पलटती है, उन चीज़ों को भी जिन्हें वह तीस बरस से आँख बंद करके पहचानती आई है।
इससे उसकी रफ़्तार गिर गई है। पूरी लकीर पर पहले उसे जितना समय लगता था, अब उससे कहीं ज़्यादा लगता है, और सूरज निकलने तक वह उतनी दूर नहीं पहुँच पाती। टोकरी हर सुबह पहले से कम भरती है और यह अंतर उसके घर में महसूस होता है।
छड़ वह फिर भी नहीं छोड़ती। उसने एक बार अपनी बहन से इतना कहा था कि माँ का नियम अब भी वही है, बस उसे निभाने में पहले से ज़्यादा समय लगता है, और उसके बाद उसने यह बात दोबारा नहीं उठाई।