कुएँ की जगत पर एक तारीख़ खुदी थी और उसके नीचे कुछ नहीं लिखा था।
अशरफ़ी ने बचपन में कई बार पूछा कि यह किस बात की तारीख़ है और हर बार उसे यही जवाब मिला कि यह कुआँ बनने की है। यह जवाब उसे कभी ठीक नहीं लगा, क्योंकि कुएँ पर बनने की तारीख़ कोई नहीं खुदवाता।
उस घर में एक बात और थी जो अजीब थी। हर साल जेठ की एक ख़ास तारीख़ को सलीमा, यानी उसकी दादी, सुबह से किसी से बात नहीं करती थी। वह उस दिन कोई काम नहीं करती थी और शाम को कुएँ की जगत पर बैठ जाती थी।
पूछने पर वह कहती थी कि सिर दुखता है। अशरफ़ी सत्रह की हुई तब उसे असली बात बताई गई, और बताने वाली सलीमा नहीं थी, उसका बाप तफ़ज़्ज़ुल था। तीन पीढ़ी पहले उस इलाक़े में लगातार तीन बरस पानी नहीं गिरा।
गाँव के सब कुएँ बैठ गए। लोग निकलने लगे। उस घर के जो बुज़ुर्ग तब ज़िंदा थे, उन्होंने आख़िरी में यह कुआँ खुदवाना शुरू किया, और चौंतीस हाथ पर पत्थर आ गया। उसी रात कुएँ में पानी आ गया।
किसी ने नहीं देखा कि कैसे आया। सुबह वह भरा हुआ था और उस बरस से आज तक वह कभी सूखा नहीं, न उन तीन बरसों में, न उसके बाद के किसी अकाल में। बदले में जो तय हुआ वह पैसा नहीं था।
"एक दिन," तफ़ज़्ज़ुल ने कहा। "इस घर से एक दिन। जब माँगा जाएगा तब।" "एक दिन का मतलब?" "यही तो किसी को नहीं मालूम।" यह बात हर पीढ़ी में एक आदमी को बताई जाती थी और वह उसे अगली पीढ़ी को बताता था, और तीन पीढ़ी में वह दिन माँगा नहीं गया था।
अशरफ़ी को यह सब सुनकर हँसी नहीं आई, क्योंकि उसने अपनी दादी को हर जेठ में चुप बैठे देखा था। उसने पूछा कि दादी उस दिन क्यों बैठती हैं। "वे कहती हैं कि जिस दिन वह माँगा जाएगा, वह इसी तारीख़ को माँगा जाएगा।" "क्यों?" "पता नहीं।"
वह जेठ चार महीने बाद आया। उस सुबह अशरफ़ी जागी तो घर में सब सामान्य था। दादी उठी हुई थीं और चूल्हे के पास बैठी थीं और उन्होंने उससे बात भी की। अशरफ़ी ने वह पूरा दिन ध्यान से देखा, इस उम्मीद में कि कुछ होगा।
कुछ नहीं हुआ।
दोपहर में डाकिया आया और चिट्ठी किसी और के नाम की थी। तीसरे पहर बग़ल वाले घर से बरतन माँगने कोई आया। शाम को अशरफ़ी ने कुएँ से पानी खींचा और जगत पर बैठकर उस तारीख़ पर उँगली फेरी, जैसे बचपन में फेरती थी।
शाम को वह थककर सो गई और अगली सुबह उठी। उसने घर में जो देखा वह यह था। पिछवाड़े की दीवार, जो दो जगह से गिर चुकी थी और जिसे बनवाने के लिए पैसे नहीं थे, बनी हुई थी। पूरी। गीली मिट्टी अभी सूखी नहीं थी।
आँगन में एक बकरी बँधी थी जो उनकी नहीं थी। तफ़ज़्ज़ुल के हाथ पर एक कटा हुआ निशान था जो एक दिन पहले नहीं था। और सलीमा सो रही थीं, दोपहर तक, जो उन्होंने चालीस बरस में नहीं किया था।
अशरफ़ी ने अपने बाप से पूछा कि कल क्या हुआ। तफ़ज़्ज़ुल ने कहा कि कल जेठ की वही तारीख़ थी और वह दिन ठीक-ठाक गुज़र गया। "दीवार किसने बनाई?" उसने दीवार की तरफ़ देखा। फिर उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा। फिर वह वहीं बैठ गया और उसने कहा कि उसे नहीं मालूम।
घर में चार लोग थे और चारों में से किसी को उस दिन का कुछ याद नहीं था। सुबह याद थी। अगली सुबह याद थी। बीच का पूरा दिन गायब था और उसकी जगह पर कुछ भी नहीं था, अँधेरा भी नहीं।
अशरफ़ी ने सबसे पहले यह जाँचा कि कहीं यह उसकी अपनी गड़बड़ तो नहीं। उसने अपनी माँ से पूछा, फिर अकेले में अकरम जैसा कोई नाम लेकर देखा कि याद आता है या नहीं, फिर उसने पिछले हफ़्ते की बातें याद कीं और वे सब जगह पर थीं। सिर्फ़ वही एक दिन नहीं था, और वह चारों के लिए नहीं था, जो उसे सबसे ज़्यादा डरावना लगा।
गाँव में लोगों ने बताया कि उस दिन उन्होंने तफ़ज़्ज़ुल को दीवार बनाते देखा था और उसके साथ दो आदमी थे जिन्हें किसी ने पहचाना नहीं। बकरी बग़ल के गाँव के एक आदमी ने दी थी, किसी पुराने उधार के बदले, जिसका ज़िक्र उस घर में कभी नहीं हुआ था।
सलीमा उस साल के बाद जेठ में चुप नहीं बैठीं। उन्होंने अशरफ़ी से इतना कहा कि अब वह तारीख़ ख़ाली है।
अशरफ़ी ने बहुत बरस तक उस दिन को जोड़ने की कोशिश की। उसने गाँव में पूछा, उसने बकरी वाले से पूछा, उसने दीवार की मिट्टी तक देखी कि वह कहाँ से आई। टुकड़े मिलते रहे और पूरा दिन कभी नहीं बना।
कुआँ अब भी वहीं है और उसमें अब भी पानी है।
जगत पर जो तारीख़ खुदी है, उसके नीचे अशरफ़ी ने एक और तारीख़ खुदवा दी, उसी जेठ वाली, और उसके नीचे भी कुछ नहीं लिखा। जब उसके बच्चे पूछते हैं कि यह किस बात की है, तो वह कहती है कि क़र्ज़ चुकने की, और इससे आगे उन्हें कुछ नहीं बताती, क्योंकि इससे आगे उसे भी कुछ नहीं मालूम।