किन्नौर में नवंबर के बाद रास्ता बंद हो जाता है और मई से पहले नहीं खुलता। यह हर साल होता है और इसका इंतज़ाम पहले से किया जाता है। लकड़ी काट ली जाती है, राशन ऊपर चढ़ा लिया जाता है, और सेब की पेटियाँ अक्टूबर में ही नीचे भेज दी जाती हैं।

जो नीचे कमाने गया है, वह भी मई से पहले नहीं लौटता।

डोलमा नौ बरस की थी और उसके पिता तीन साल से रामपुर में सड़क के काम पर थे। वे हर बरस दिवाली के आसपास आते थे और होली से पहले चले जाते थे। उस बरस वे दिवाली पर नहीं आए, क्योंकि काम मिल गया था और छोड़ने से हाथ से निकल जाता।

चिट्ठी उन्होंने दो बार भेजी और दोनों बार वह ऊपर तक नहीं पहुँची, क्योंकि जाड़े में डाक उस मोड़ से आगे नहीं जाती जहाँ से रास्ता बंद होता है।

गाँव के पीछे एक धार गिरती है जो जाड़े में जम जाती है। वह पूरी नहीं जमती। भीतर पानी चलता रहता है और बाहर की परत सख़्त हो जाती है, और उस परत पर सुबह की धूप एक ख़ास तरह से पड़ती है।

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आंगमो बूढ़ी थी और उसी धार के पास वाला आख़िरी घर उसका था।

उसी ने डोलमा को बताया।

"जो इस पर लिखा जाता है वह उस तक चला जाता है जिसके लिए लिखा हो।" "कैसे?" "मालूम नहीं। पानी नीचे जाता है।" "पढ़ लेगा वह?" "पढ़ेगा नहीं। उसे मालूम हो जाएगा।"

डोलमा ने पूछा कि इसमें क्या पेच है, क्योंकि पहाड़ में हर अच्छी बात के साथ एक पेच होता है।

आंगमो ने कहा कि पेच सिर्फ़ इतना है कि यह तब तक चलता है जब तक बर्फ़ है। जिस दिन धार खुल जाएगी उस दिन से जो लिखा जाएगा वह बहकर टूट जाएगा और कहीं नहीं पहुँचेगा।

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उस साल धार दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में जमी, जो हर बरस से कुछ देर से था, और गाँव में इस पर बात भी हुई।

डोलमा पहली बार लकड़ी की तीली लेकर गई और उसने सिर्फ़ इतना लिखा कि वह ठीक है।

दूसरे दिन उसने लिखा कि माँ की खाँसी कम है।

तीसरे दिन उसने पूछा कि क्या पिता ने खाना खाया।

इसका जवाब नहीं आ सकता था। यह एकतरफ़ा रास्ता था और आंगमो ने पहले ही बता दिया था।

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जनवरी में उसने लगभग रोज़ लिखा। कभी दो शब्द, कभी पूरी लाइन। उसने लिखा कि छत की एक स्लेट खिसक गई है। उसने लिखा कि उसने पहाड़े याद कर लिए। उसने लिखा कि माँ रात में उठकर बैठ जाती है।

लिखने का अपना तरीक़ा था और वह उसने ख़ुद बना लिया था। सुबह जल्दी जाना पड़ता था, धूप चढ़ने से पहले, क्योंकि दोपहर में ऊपर की परत थोड़ी गीली हो जाती और तीली का निशान फैल जाता। वह दस्ताने उतारकर लिखती थी क्योंकि पहनकर हाथ नहीं सधता था, और लौटते वक़्त उसकी उँगलियाँ सुन्न होती थीं और घर पहुँचकर उन्हें चूल्हे के पास रखना पड़ता था। यह सब उसने अपनी माँ को नहीं बताया, जो उन दिनों वैसे भी ज़्यादा कुछ पूछती नहीं थी।

फरवरी में उसकी माँ की खाँसी बढ़ गई।

डोलमा ने यह नहीं लिखा।

उसने उस पूरे हफ़्ते वही सब लिखा जो पहले लिखती थी, कि सब ठीक है, कि लकड़ी बची हुई है, कि सेब के पेड़ों पर बर्फ़ जमी है।

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आंगमो ने उससे पूछा कि वह असली बात क्यों नहीं लिख रही।

"वे आ जाएँगे।" "तो?" "रास्ता बंद है। पैदल आएँगे।"

आंगमो ने इसके बाद कुछ नहीं कहा, क्योंकि लड़की ठीक कह रही थी। उस रास्ते पर जाड़े में जो पैदल चला है उसमें से हर कोई पहुँचा नहीं है।

मार्च के आख़िर में धूप तेज़ होने लगी।

धार किनारों से पिघलने लगी और बीच की परत पतली पड़ गई। एक सुबह डोलमा ने तीली रखी तो निशान बना ही नहीं। पानी ऊपर आ गया था।

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उसने आख़िरी बार जो लिखा वह उससे एक दिन पहले लिखा था और उसमें उसने पहली बार माँ की खाँसी का ज़िक्र किया था, आधी लाइन में, इस तरह कि वह पूरी बात न लगे।

पिता अप्रैल के तीसरे हफ़्ते में आ गए, रास्ता खुलने से पंद्रह दिन पहले, ऊपर वाले लंबे रास्ते से, जो चार दिन का है।

उन्होंने आते ही जो पहला सवाल पूछा वह खाँसी के बारे में था।

डोलमा ने उनसे नहीं पूछा कि उन्हें कैसे मालूम हुआ, और उन्होंने भी नहीं बताया, और यह बात उन दोनों के बीच उसके बाद कभी नहीं उठी।

माँ का इलाज रामपुर में हुआ और वह ठीक हो गई। उस बरस के बाद पिता ने जाड़े में नीचे रहना बंद कर दिया और वे अक्टूबर में ही ऊपर आ जाते थे, चाहे काम छूटे।

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डोलमा ने अगले जाड़े में धार पर कुछ नहीं लिखा। उसे ज़रूरत नहीं पड़ी। वह वहाँ जाती ज़रूर थी, सुबह के वक़्त, और खड़ी होकर देखती रहती थी कि परत कहाँ तक जमी है, जैसे कोई किसी बंद दरवाज़े को यह देखने जाता है कि वह अब भी वहीं है।