भट्टी शाम को सबसे तेज़ जलती थी और उस वक़्त दीवार पर परछाइयाँ लंबी हो जाती थीं।
झब्बू चौदह का था और तीन बरस से कुंदन के पास काम सीख रहा था। उसे यह काम पसंद नहीं था। धौंकनी चलाने में कंधा दुखता था, गरमी में साँस भारी होती थी, और हथौड़े की आवाज़ से उसके कान में देर तक कुछ बजता रहता था।
उसकी माँ बेगमा ने उसे वहाँ इसलिए लगाया था कि लोहार का काम कभी बंद नहीं होता।
एक शाम कुंदन ने उसे तीस कुल्हाड़ियों के फल पीटने को कहकर छोड़ दिया और ख़ुद बाहर चला गया। झब्बू ने पाँच किए और बैठ गया। हाथ भारी थे। भट्टी तेज़ थी। दीवार पर उसकी परछाईं बैठी हुई थी।
उसने ऐसे ही, थके हुए मन से कह दिया कि बाक़ी तू कर ले।
परछाईं उठ खड़ी हुई। धीरे से। जैसे उसे बुलाया गया हो।
झब्बू वहीं बैठा रहा और उसने देखा कि दीवार पर उसकी परछाईं हथौड़ा उठा रही है, नीचे कर रही है, फल पलट रही है। भट्टी के सामने सचमुच का हथौड़ा भी उठ रहा था और गिर रहा था और उसे कोई पकड़े हुए नहीं था।
पच्चीस फल एक घंटे में हो गए और वे अच्छे हुए।
कुंदन लौटा तो उसने काम देखा और कुछ नहीं कहा। दूसरे दिन उसने झब्बू को और काम दिया।
यह चार महीने चला।
इन चार महीनों में झब्बू ने वह सब किया जो वह करना चाहता था। वह दोपहर में सोता था। वह नदी की तरफ़ चला जाता था। एक बार वह पूरे दिन ग़ायब रहा और शाम को लौटा तो दुकान का काम पूरा हो चुका था। कुंदन ने उससे कुछ नहीं पूछा और झब्बू को लगा कि वह जीत गया है।
इन चार महीनों में झब्बू का नाम क़स्बे में हो गया। उसके बनाए हँसिये की धार की तारीफ़ होने लगी। कुंदन ने उसे अपनी दुकान का दूसरा हिस्सा दे दिया और बेगमा ने पहली बार उसके बारे में लोगों से बात करनी शुरू की।
झब्बू ने इन चार महीनों में लगभग कुछ नहीं किया।
जो चीज़ धीरे-धीरे हो रही थी, वह उसे बहुत बाद में समझ आई।
पहले वह भूला कि फल को किस कोण पर पकड़ते हैं। फिर वह भूला कि लोहा किस रंग पर उठाया जाता है। एक दिन उसने धौंकनी चलाई और उसे याद नहीं आया कि पैर से चलाते हैं या हाथ से।
उसने यह किसी को नहीं बताया, क्योंकि बताने की ज़रूरत नहीं पड़ रही थी। काम हो रहा था।
पाँचवें महीने में कुंदन बीमार पड़ा और दुकान झब्बू के भरोसे रह गई।
पहले दो दिन ठीक गुज़रे। परछाईं ने काम किया और झब्बू ने पैसे लिए। तीसरे दिन एक किसान अपनी कुदाल की नोक ठीक करवाने आया और खड़ा रहकर देखता रहा, और उस दिन परछाईं ने काम नहीं किया, क्योंकि किसान की अपनी परछाईं भी उसी दीवार पर पड़ रही थी। झब्बू ने उससे कहा कि कल आना। किसान अगले दिन आया और उस दिन भी वही हुआ।
उसी हफ़्ते हलवाई की कड़ाही का कड़ा टूटा और वह रात में ही बनवाने आ गया, क्योंकि सुबह उसे भट्टी चढ़ानी थी।
झब्बू ने भट्टी सुलगाई। परछाईं दीवार पर आई।
और उस रात उसने काम नहीं किया।
वह खड़ी रही। झब्बू ने उससे कहा, फिर दोबारा कहा, फिर उसने हथौड़ा उठाकर दिखाया। परछाईं ने वही किया जो झब्बू ने किया, यानी हथौड़ा उठाकर दिखाया, और उससे आगे कुछ नहीं।
हलवाई बाहर बैठा इंतज़ार करता रहा। रात बढ़ती गई।
झब्बू ने आख़िर में ख़ुद लोहा उठाया।
उसे कुछ याद नहीं था। उसने अंदाज़े से गरम किया, अंदाज़े से पीटा, और कड़ा टेढ़ा बन गया। दूसरी बार में वह और ख़राब हुआ। तीसरी बार में वह जुड़ तो गया, पर वह देखने में भद्दा था और उसकी सतह पर हथौड़े के निशान पड़े थे।
हलवाई ने उसे उलट-पुलट कर देखा और कहा कि चलेगा, और पैसे देकर चला गया।
उस रात दीवार पर परछाईं फिर बैठ गई, अपनी जगह, और उसने उसके बाद कभी काम नहीं किया।
झब्बू को जो चीज़ें भूली थीं वे एक साथ नहीं लौटीं। वे उसी तरह लौटीं जैसे गई थीं, धीरे-धीरे, और उसमें लगभग एक बरस लगा। उस पूरे बरस उसका काम ख़राब रहा और क़स्बे में उसका नाम गिर गया।
कुंदन ठीक होकर लौटा और उसने यह सब देखा। उसने झब्बू से इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। उसने बस उसे फिर से पहले वाला काम देना शुरू कर दिया, वही तीस फल, और झब्बू ने उन्हें ख़ुद पीटा।
बेगमा ने एक बार पूछा कि क्या हुआ था। झब्बू ने कहा कि कुछ नहीं, और यह पहली बार था जब उसने अपनी माँ से झूठ बोला।
वह टेढ़ा कड़ा हलवाई की कड़ाही पर उन्नीस बरस चला। हलवाई ने उसे कभी बदलवाया नहीं, इसलिए नहीं कि वह अच्छा था, बल्कि इसलिए कि वह चलता रहा और बदलवाने की नौबत नहीं आई।
वह कड़ा उसके अपने हाथ का था और क़स्बे में उसके बनाए सबसे ख़राब सामान में से था। हलवाई की कड़ाही उसी पर टँगी रही, रोज़, सुबह से रात तक, और उस पर हर दिन बीस सेर जलेबी उतरती रही।