कोठी आँगन के उत्तर वाले कोने में थी और वह मिट्टी की थी, आदमी के क़द से थोड़ी ऊँची, और उसका मुँह कपड़े से ढँका रहता था। घर में एक ही नियम था। उसमें से अनाज निकाला जा सकता है। उसे नापा नहीं जाएगा।

यह नियम कब से था, यह किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम था। हरदेव कहता था कि उसकी दादी के वक़्त से। दादी के बारे में इतना ही याद था कि अकाल के एक साल में वह किसी को खाना देकर आई थी और लौटते वक़्त उसके पास कुछ नहीं बचा था।

कोठी कभी ख़ाली नहीं हुई।

यह चमत्कार की तरह नहीं बरता जाता था। सुभागी सुबह उसमें से जितना चाहिए उतना निकाल लेती और कपड़ा वापस डाल देती। हरदेव खेत से जो आता वह उसी में डालता। दोनों के बीच यह कभी बात नहीं बनी कि निकलने और डलने का हिसाब मिलता है या नहीं।

साल अच्छा हो या ख़राब, चूल्हा चलता रहा।

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बुरे साल में उन्होंने गाँव के दूसरे घरों को भी दिया। यह भी बिना गिने दिया गया और किसी ने लौटाया नहीं, क्योंकि लौटाने की बात कभी उठी ही नहीं। अकरम की शादी सतरहवें साल में हुई और नौमी उस घर में आई।

नौमी अपने मायके में हिसाब देखती थी। उसका बाप बनिया नहीं था, पर उसके यहाँ चार बैल थे और चारे का हिसाब वही रखती थी। उसे यह अच्छा नहीं लगता था कि किसी चीज़ का हिसाब न हो। उसने पहले महीने कुछ नहीं कहा।

दूसरे महीने उसने सुभागी से पूछा कि कोठी में कितना है। "पता नहीं।" "कभी नापा नहीं?" "नहीं।" "तो अगर कम पड़ गया तो?" "कम पड़ा नहीं।" यह जवाब नौमी को जवाब नहीं लगा और वह सही थी।

उसने अकरम से कहा। अकरम ने कहा कि यह घर का नियम है। नौमी ने पूछा कि नियम की वजह क्या है। अकरम के पास वजह नहीं थी और उसने वह ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की, जो नौमी को और बुरा लगा।

उसने हरदेव से पूछा।

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हरदेव ने कहा कि उसने भी कभी नहीं नापा और उसके बाप ने भी नहीं। फिर उसने एक बात और कही, कि उसका छोटा भाई एक बार नापने गया था, बहुत बरस पहले, और नाप नहीं पाया था, क्योंकि उस दिन घर में पैमाना नहीं मिला।

यह बात नौमी को और अजीब लगी। पूस की एक दोपहर, जब सुभागी बग़ल के गाँव गई थी और दोनों आदमी खेत पर थे, नौमी ने पैमाना उठाया और कोठी का कपड़ा हटा दिया।

उसने नापना शुरू किया।

पहली पैली निकली, दूसरी निकली, तीसरी निकली। वह गिनती जोर से बोलती जा रही थी क्योंकि उसे भूलने का डर था। इकतालीसवीं पर उसका पैमाना कोठी की तली से टकराया। वह रुक गई। उसने भीतर हाथ डालकर देखा और तली साफ़ थी। इकतालीस पैली अनाज आँगन में उसके चारों तरफ़ फैला हुआ था और कोठी ख़ाली थी।

उसने उसे वापस भरा, पूरा, एक दाना छोड़े बिना।

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यह काम उसे दोपहर से शाम तक करना पड़ा और उसकी पीठ अकड़ गई। आँगन बुहारते वक़्त उसे यह डर लगा कि कहीं कोई दाना दरार में न रह जाए, इसलिए उसने झाड़ू के बाद हाथ से भी देखा। जब सुभागी लौटी तब तक कपड़ा अपनी जगह पड़ा था और कोठी वैसी ही दिख रही थी जैसी सुबह थी।

अगली सुबह सुभागी ने कोठी में से अनाज निकाला और उसे कुछ अजीब नहीं लगा। पर उस दिन के बाद कोठी घटने लगी।

यह इतना धीरे हुआ कि उसे किसी चीज़ से जोड़ना मुश्किल था। उस बरस बारिश भी कम हुई थी और अकरम का एक बैल भी बीमार पड़ा था, इसलिए घर में जो कमी दिखी उसकी वजहें और भी थीं। हरदेव ने एक बार कहा भी कि पहले जैसा नहीं रहा, और सुभागी ने कहा कि उम्र हो रही है और खाने वाले बढ़ गए हैं।

पहले महीने यह किसी को नहीं दिखा। तीसरे महीने सुभागी ने कहा कि इस बार जल्दी नीचे आ गई है। छठे महीने हरदेव ने बाहर से अनाज ख़रीदा, पहली बार, और यह बात उसने किसी से नहीं कही, जैसे वह उसकी अपनी ग़लती हो।

नौमी ने किसी को नहीं बताया।

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वह डेढ़ बरस चुप रही और फिर उसने सुभागी को बता दिया, एक रात, बिना किसी बात के बीच में से।

सुभागी ने उसे कुछ नहीं कहा। उसने इतना पूछा कि इकतालीस पैली थी क्या, और नौमी ने कहा कि हाँ। फिर सुभागी काफ़ी देर बैठी रही और उसके बाद उसने कहा कि इकतालीस बहुत होती हैं, और उसकी सास के वक़्त घर में कुल छह बीघा थे।

उस घर में उसके बाद अनाज ख़रीदा जाने लगा, हर साल, जैसे बाक़ी घरों में ख़रीदा जाता है।

कोठी आँगन में वैसी ही खड़ी रही। उसे तोड़ा नहीं गया। उसका मुँह अब भी कपड़े से ढँका रहता है और उसमें अब भी अनाज रखा जाता है, बस वह उतना ही निकलता है जितना डाला जाता है।

नौमी ने अपनी बेटी को हिसाब रखना सिखाया, पूरा, चारे का भी और अनाज का भी। सिर्फ़ एक बात उसने उसे कभी नहीं बताई, और वह यह कि उस कोठी को उसने ख़ुद नापा था।