करघे की ढरकी अगहन की एक सुबह बीच से चटक गई। कन्हई के बाबा ने दोनों टुकड़े जोड़कर देखे, फिर रस्सी से बाँधकर देखे, फिर चुपचाप एक तरफ़ रख दिए। ढरकी के बिना करघा लकड़ी का ढाँचा भर है। करघा चुप हो गया। उस दिन घर में ताना-बाना जस का तस पड़ा रहा।
ढरकी बनाने वाले तीन कारीगर हुआ करते थे। दो गुज़र गए। तीसरा डोमा था, और डोमा बीहड़ के उस पार रहता था, आठ दिन की पैदल दूरी पर। बाबा के घुटने वहाँ तक नहीं जाते। कन्हई बारह का था और उसके घुटने ठीक थे।
जाने की रात दादी गिरिजा ने अपनी संदूकची से एक पोटली निकाली। उसमें तीन दाने थे, मटर से ज़रा बड़े, रंग में राख जैसे। "जहाँ अपने हाथ से काम न बने, वहीं एक दाना गाड़ना," उन्होंने कहा। "जहाँ बन जाए, वहाँ नहीं। तीन ही हैं।" "अगर चौथी जगह आ गई?" "तो तेरे हाथ हैं।"
तीसरी बार
बीहड़ नक़्शे पर एक ख़ाली जगह है और ज़मीन पर सौ फुट गहरी नालियों का जाल। ऊपर से सब सपाट दिखता है। नक़्शा वहाँ झूठ बोलता है। भीतर घुसो तो हर मोड़ पर मिट्टी की दीवार खड़ी मिलती है, भुरभुरी, चढ़ो तो हाथ में आ जाती है।
तीसरे दिन कन्हई एक ऐसी ही दीवार के नीचे खड़ा था। ऊपर जाने का रास्ता नहीं था और लौटने का मतलब दो दिन का चक्कर। उसने दीवार पर चढ़ने की कोशिश की और तीन बार फिसला। चौथी बार उसने कोशिश नहीं की। उसने एक दाना जड़ में गाड़ दिया और थोड़ा पानी डाला।
पेड़ रात भर में नहीं उगा। उसे बढ़ते हुए देखा भी नहीं जा सकता था। पर सुबह वहाँ एक पेड़ था, पुराना, जैसे बरसों से वहीं हो, और उसकी जड़ें दीवार पर बाहर निकली हुई थीं, एक के ऊपर एक। कन्हई उन पर पैर रखकर ऊपर चढ़ गया।
पाँचवीं रात उसे खुले में सोना पड़ा। सूखी नाली में लेटा ही था कि दूर से आवाज़ें आने लगीं। कुत्ते नहीं थे। बीहड़ के कुत्तों की आवाज़ अलग होती है, और यह उससे नीची और ज़्यादा थी।
उसने चारों तरफ़ देखा। छिपने की कोई जगह नहीं थी। दूसरा दाना उसने अपने चारों ओर घुमाकर एक घेरे में गाड़ा, जितनी दूर तक उसका हाथ पहुँचा। बेर की झाड़ियाँ उसी रात उग आईं, कमर तक ऊँची, काँटों से भरी। आवाज़ें घेरे के बाहर तक आईं, वहीं रुकीं, और भोर से पहले चली गईं।
चाँदनी रात
सातवें दिन एक नाला बीच में पड़ा। पानी छाती तक था और बहाव तेज़ नहीं था। कन्हई ने तीसरे दाने की पोटली छुई, फिर छोड़ दी। पानी ठंडा था। उसने कपड़े सिर पर बाँधे और उतर गया। दूसरे किनारे पहुँचकर उसने दादी की बात दोहराई, ज़ोर से, जैसे कोई सुन रहा हो।
आठवें दिन शाम को उसे डोमा का घर मिला। बूढ़ा आदमी आँगन में बैठा था और उसके हाथ बिना काम के भी हिल रहे थे। कन्हई ने टूटी ढरकी निकालकर दिखाई। बूढ़े की आँखें ठीक थीं। डोमा ने उसे उलटा-पलटा और सिर हिलाया।
"बना दूँगा," उसने कहा। "लकड़ी नहीं है।"
आँगन के कोने में एक शहतूत का पेड़ खड़ा था, सूखा हुआ, छाल उतरी हुई। डोमा ने बताया कि ढरकी सिर्फ़ शहतूत की बनती है, क्योंकि वही लकड़ी है जो घिसती है पर चटकती नहीं। यह पेड़ दो गरमियों पहले मर गया था। पास के तीन गाँवों में और कोई शहतूत नहीं था।
कन्हई रात भर आँगन में बैठा रहा। उसे यह भी लग रहा था कि दाना अपने काम के लिए बचाकर रखा था, और यह उसका काम नहीं है। दाना एक ही बचा था। फिर उसे यह भी लगा कि दादी ने काम की परिभाषा नहीं बताई थी।
भोर में उसने पेड़ की जड़ खोदी। तीसरा दाना उसमें रख दिया।
नया पेड़ नहीं उगा। जो था वही, दस दिन में, ऊपर से नीचे तक पत्तों से भर गया। छाल लौट आई और डाल में लचक आ गई। डोमा ने एक डाल काटी, उसे बीस दिन छाँव में सुखाया, और उससे दो ढरकियाँ बनाईं। एक कन्हई के लिए, एक अपने लिए।
लौटते हुए कन्हई ने वही रास्ता लिया। बेर का घेरा अब भी वहीं था और उसमें बेर लग रहे थे। जड़ों वाली सीढ़ी पर चढ़ते हुए उसे लगा कि वह पहले से चौड़ी हो गई है, और वह ग़लत नहीं था, क्योंकि उस पर अब और लोग भी चलने लगे थे।
घर में करघा उसी दिन चला। बाबा ने ढरकी हाथ में लेकर बहुत देर तक देखा। फिर कहा कि यह उनकी पुरानी वाली से भारी है। गिरिजा ने पोटली माँगी। कन्हई ने ख़ाली पोटली उनके हाथ पर रख दी और वे हँस पड़ीं।
डोमा का शहतूत अब भी खड़ा है और हर साल उसकी डालें काटी जाती हैं। आस-पास के गाँवों के बुनकर वहीं से लकड़ी लेते हैं और डोमा किसी से दाम नहीं लेता, सिर्फ़ यह पूछता है कि कहाँ से आए हो। कन्हई अब भी साल में एक बार जाता है, और जाते हुए बेर के घेरे में रुककर मुट्ठी भर बेर तोड़ लेता है।