पोखर की मिट्टी इतनी सूख गई थी कि उस पर पैर रखने से आवाज़ आती थी। तली में दरारें थीं, हथेली जितनी चौड़ी। पानी कहीं नहीं था। जेठ की धूप में मंदिर की सीढ़ियों पर पानी का पुराना निशान अब भी दिखता था, सबसे ऊपर वाली सीढ़ी से दो अंगुल नीचे। गाँव के बूढ़े कहते थे कि उन्होंने उस निशान तक पानी कभी नहीं देखा।

नन्दू रोज़ भोर में मंदिर की सीढ़ियाँ बुहारता था। बदले में बैजनाथ उसे दोपहर की थाली दे देते थे। माँ-बाप उसके थे नहीं और चाची के घर में उसकी गिनती एक और पेट की थी, इसलिए वह दिन भर बाहर ही रहता था।

कुआँ दिन में दो बार खुलता था। सुबह और शाम। हर घर को दो घड़े। लाइन लंबी होती थी और धक्का-मुक्की भी। फुलवा बुढ़िया के घुटने जवाब दे चुके थे, सो उसका नंबर कभी नहीं आता था। नन्दू उसका एक घड़ा भी भर देता था, और इस तरह उसके अपने हिस्से में डेढ़ घड़ा बचता था।

जो माँगा गया

सावन आने में अभी बीस दिन थे, जब उसे पोखर की तली पर वह सारस दिखा। एक पंख अजीब कोण पर लटका था। वह हिला नहीं। पास जाने पर भी वह उड़ा नहीं, बस गर्दन घुमाकर देखता रहा।

नन्दू ने उसे अपनी कमीज़ में लपेटकर उठाया और मंदिर के पीछे वाली टूटी कोठरी में रख दिया। वहाँ छाँव थी। कोई आता नहीं था। उसने एक कटोरा पानी रखा। सारस ने उसमें चोंच डाली और बहुत देर तक डुबोए रखी।

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उसके बाद हर सुबह वह अपने डेढ़ घड़े में से एक कटोरा उस कोठरी में ले जाने लगा। दोपहर तक उसकी अपनी जीभ तालू से चिपकने लगती थी। बैजनाथ ने एक बार पूछा भी कि पानी कहाँ ले जा रहा है। उसने कह दिया कि मंदिर के पीछे तुलसी लगाई है। बैजनाथ ने दोबारा नहीं पूछा।

अठारह दिन में सारस खड़ा होने लगा। बीसवें दिन उसने पंख खोला। फिर मोड़ लिया। उस रात आसमान में पहली बार बादल की गंध थी, वह भीगी मिट्टी वाली गंध जो बारिश से पहले आती है।

नन्दू कोठरी में गया तो कटोरा ख़ाली था और सारस दरवाज़े पर खड़ा था। चाँदनी सीधी उस पर पड़ रही थी। फिर उसने पंख पूरे खोले, और खोलते-खोलते वह इतना बड़ा हो गया कि दरवाज़ा छोटा पड़ गया। उसकी जगह एक औरत खड़ी थी, सफ़ेद कपड़ों में, बालों में पानी की तरह चमक।

जब सच कहना पड़ा

"बीस दिन तुमने अपने हिस्से का पानी दिया," उसने कहा। "माँगो।"

नन्दू ने सोचा भी नहीं। "पोखर भर दीजिए।"

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औरत कुछ पल चुप रही। "भर जाएगा," उसने आख़िर कहा। "पर उतना ही, जितना यह गाँव आपस में बाँटेगा। जिस दिन कोई पानी अपने लिए रोकेगा, पोखर उतना ही उतर जाएगा।" उसने अपने पंखों में से एक निकाला, सोने का, और तली की सबसे बड़ी दरार में गाड़ दिया। "यह वहीं रहेगा। किसी को बताना मत, वरना लोग पानी नहीं, पंख खोदेंगे।"

सावन की पहली रात पानी बरसा और सुबह तक पोखर में घुटनों तक पानी था। गाँव ने इसे बारिश समझा और ठीक ही समझा। तीन दिन में पानी कमर तक आ गया। बच्चे कूदने लगे, भैंसें उतरने लगीं, और कुएँ की लाइन आधी हो गई।

फिर सुरजन ने अपने खेत तक एक नाली काट दी। किसी ने रोका नहीं। रात भर पानी उसके खेत में गया। सुबह पोखर घुटनों पर लौट आया था, हालाँकि नाली से इतना पानी जा ही नहीं सकता था। गाँव में तू-तू मैं-मैं हुई। हर आदमी दूसरे पर शक कर रहा था।

नन्दू ने किसी से कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह कह भी नहीं सकता था। उसने सिर्फ़ इतना किया कि अगली सुबह फुलवा के दोनों घड़े पोखर से भरकर उसके दरवाज़े पर रख आया। दोपहर तक पानी एक अंगुल चढ़ गया।

अंगुल भर पानी किसी की नज़र से नहीं छूटता, जब पूरा गाँव उसी को देख रहा हो। लोग सीढ़ियाँ गिनने लगे थे। अगले दिन दो और लड़कों ने बूढ़ों के घड़े भरे। पानी फिर चढ़ा। किसी ने इसे जोड़कर नहीं देखा था, पर हाथ अपने आप चलने लगे थे।

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चौथे दिन सुरजन ने अपनी नाली ख़ुद पाट दी। उसने बताया नहीं कि क्यों, और किसी ने पूछा भी नहीं। बात यह थी कि उसके खेत का पानी भी उसी रात उतर गया था, और उसे इसका कोई हिसाब नहीं मिल रहा था।

उस साल पोखर सीढ़ियों से तीन सीढ़ी नीचे तक भरा। अगले साल दो सीढ़ी नीचे। उसके बाद वह वहीं ठहर गया, न कभी सूखा, न कभी ऊपर वाले निशान तक पहुँचा। बैजनाथ कहते थे कि इतना ही ठीक है, गाँव इतना ही है। किसी ने उनसे बहस नहीं की।

नन्दू अब बड़ा हो गया है और मंदिर की सीढ़ियाँ कोई और बुहारता है। सुबह वह अब भी दो घड़े भरकर फुलवा के दरवाज़े पर रखता है, हालाँकि फुलवा को गुज़रे बरसों हो गए और उस घर में अब उसकी बहू रहती है। पोखर की तली में सबसे बड़ी दरार अब कहीं नहीं दिखती, क्योंकि उतना नीचे पानी कभी उतरा ही नहीं।