कार्तिक आते ही गनपत के आँगन में पैर रखने की जगह नहीं बचती थी। दीये कतारों में सूखते थे, हज़ारों की गिनती में, और उनके बीच से चलने के लिए एक पतली पगडंडी छोड़ी जाती थी। साल भर का काम इन्हीं बीस दिनों में होता था। गनपत सुबह चार बजे चाक पर बैठता और रात को कमर सीधी करने में उसे दीवार का सहारा लेना पड़ता।
रुक्मिन आठ बरस की थी। उसकी माँ को गुज़रे दो साल हो चुके थे। इन बीस दिनों में गनपत के पास उससे बात करने का वक़्त नहीं होता था, इसलिए वह आँगन के कोने में बैठी रहती और सूखते दीये गिनती रहती। स्कूल दिवाली की छुट्टियों में बंद रहता था, और मोहल्ले के बाक़ी बच्चे उन्हीं दिनों सबसे ज़्यादा बाहर रहते थे।
एक दोपहर उसने बची हुई मिट्टी उठा ली। उसने एक गुड़िया बनाई। बहुत ख़राब बनी। सिर बड़ा हो गया, पैर मोटे रह गए, और दाहिना हाथ बाएँ से बड़ा निकला। उसने उसे सुधारने की कोशिश की और हाथ और बड़ा हो गया, सो उसने छोड़ दिया।
जंगल के उस पार
गनपत ने उसे भट्ठे में दीयों के साथ ही रख दिया, बिना देखे। दो दिन बाद जब माल निकला तो गुड़िया पकी हुई निकली, दीयों जैसी लाल। रुक्मिन ने उसे धोकर अपनी चौकी के सिरहाने रख लिया।
दिवाली की रात गनपत ने आँगन की मुँडेर पर दीयों की कतार लगाई और एक-एक करके जलाए। रुक्मिन गिनती करती रही। इकतालीस। आख़िरी दीया कोने वाला था, सबसे छोटा, जिसमें तेल सबसे कम आया था।
उसी दीये की लौ सीधी हुई तो सिरहाने रखी गुड़िया ने करवट ली।
रुक्मिन डरी नहीं। उसने बस उसे उठाकर आँखों के सामने किया और गुड़िया ने उसे देखा। उसका दाहिना हाथ अब भी बड़ा था। रुक्मिन ने उसका नाम चंदा रखा, क्योंकि उस रात चाँद नहीं था और नाम रखने के लिए यही सूझा।
वह रात दोनों ने आँगन में गुज़ारी। चंदा दीयों की कतार में चलती रही और उसे पगडंडी की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि वह इतनी छोटी थी कि दो दीयों के बीच से निकल जाती थी। रुक्मिन ने उसे अपनी माँ के बारे में बताया। उसने बताया कि माँ चाक पर बैठती नहीं थी, पर मिट्टी वही गूँधती थी, और उसके हाथ की गूँधी मिट्टी में कभी हवा नहीं रह जाती थी। चंदा बोलती कम थी। सुनती ज़्यादा थी।
आख़िरी शर्त
भोर से पहले कोने वाला दीया बुझ गया। चंदा वहीं रुक गई, जहाँ खड़ी थी, एक पैर आगे। रुक्मिन ने उसे उठाया और सिरहाने रख दिया। वह फिर मिट्टी थी।
अगली दिवाली भी यही हुआ, और उससे अगली भी। रुक्मिन ने किसी को नहीं बताया। गनपत को लगता था कि लड़की दिवाली की रात आँगन में इसलिए जागती है कि उसे दीये अच्छे लगते हैं, और वह ग़लत भी नहीं था।
जिस साल रुक्मिन ग्यारह की हुई, उसने पूछा। "तू सिर्फ़ एक रात क्यों?" "जब तक वह दीया जलता है," चंदा ने कहा, और कोने की तरफ़ इशारा किया। "उतनी देर मैं हूँ।"
रुक्मिन ने उस पर पूरे साल सोचा। बात सीधी लगती थी। दीया छोटा है, इसलिए रात छोटी है। बड़ा दीया बनाओ, ज़्यादा तेल डालो, और रात लंबी हो जाएगी।
अगले कार्तिक में उसने चाक पर ख़ुद एक दीया बनाया, थाली जितना चौड़ा। गनपत ने देखा और हँसकर कहा कि इतना बड़ा कौन ख़रीदेगा। उसने उसे भट्ठे में डाल दिया। दिवाली की रात रुक्मिन ने उसमें घर भर का तेल उड़ेल दिया और चार बत्तियाँ डालीं।
चंदा जागी और रात गुज़री और भोर हुई, और दीया जलता रहा। सूरज निकल आया और वह तब भी जल रहा था। रुक्मिन को इतनी ख़ुशी हुई कि उसका गला भर आया।
धूप आँगन में उतरी। घंटे भर में चंदा की चाल धीमी पड़ने लगी। दोपहर तक उसके दाहिने हाथ पर, कलाई के पास, एक बाल जितनी बारीक लकीर पड़ गई। रुक्मिन ने उस पर पानी डाला और लकीर चौड़ी हो गई। भट्ठे की पकी हुई चीज़ पानी सोखती नहीं, इतना वह जानती थी। पकी मिट्टी धूप में सूखती नहीं है, पर चंदा मिट्टी से कुछ ज़्यादा थी, और जो ज़्यादा था वह धूप में टिक नहीं रहा था।
चंदा ने कुछ माँगा नहीं। वह बस चलती रही, धीरे-धीरे, और एक बार गिरते-गिरते बची। रुक्मिन उसे उठाकर छाँव में ले गई और वहाँ भी लकीर बढ़ती रही।
दोपहर ढलने से पहले रुक्मिन बड़े दीये के पास गई। चारों बत्तियाँ अब भी जल रही थीं और तेल आधे से ज़्यादा बचा था। उसने चंदा को देखा, फिर दीये को। बहुत देर तक वह वहीं झुकी रही, इतनी देर कि घुटने दुखने लगे। फिर उसने फूँक मार दी। चारों बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं। पीछे आँगन में जो गिरा, उसकी आवाज़ मिट्टी की थी।
अगली दिवाली गनपत ने मुँडेर पर दीयों की कतार लगाई और रुक्मिन ने आख़िर में कोने वाला छोटा दीया रखा, उतना ही तेल डालकर जितना उसमें आता है। चंदा उस रात भी जागी। उसके दाहिने हाथ पर कलाई के पास एक लकीर है, जो पहले नहीं थी, और दोनों में से किसी ने उसका ज़िक्र नहीं किया।