मंगला को शादियों के दिनों में घर पर ढूँढ़ना बेकार था। माघ में ब्याह लगातार पड़ते हैं और वह किसी न किसी की रसोई में होती थी। तीस बरस से वह यही कर रही थी। दो सौ लोगों का खाना वह अकेले हाथ से चढ़ा देती थी और उसकी बनाई कढ़ी के लिए लोग दूसरे गाँव से आते थे।
उसकी एक आदत सब जानते थे। वह काम करते हुए बिलकुल नहीं बोलती थी। जिन घरों में वह जाती थी, वहाँ औरतें कहती थीं कि मंगला के मुँह में ताला है और हाथ में जादू।
माघ की एक रात, बारह बजे के बाद, किसी ने आँगन से उसका नाम पुकारा। मंगला बाहर निकली तो एक लड़का बकरी के खूँटे के पास खड़ा था। उसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। उसने कहा कि दावत है, सौ मेहमान हैं, रसोइन नहीं मिली, और मज़दूरी वह पहले दे देगा। "किस गाँव में?" "पास ही है।"
जादू की शर्त
रास्ता पास ही था और मंगला ने उस पर पहले कभी क़दम नहीं रखा था, हालाँकि वह उस इलाक़े को अपने आँगन की तरह जानती थी। खेत ख़त्म हुए और एक दीवार आ गई। दीवार में दरवाज़ा था और भीतर बाग़ था, और बाग़ में इतने दीये जल रहे थे कि माघ की रात में गरमी लग रही थी। उनके बीच से गुज़रते हुए मंगला को लगा कि उनमें तेल नहीं, कुछ और जल रहा है।
बीच में एक हांडी रखी थी। वह मंगला के कंधे तक आती थी और ख़ाली थी। चूल्हा नीचे पहले से दहक रहा था। आस-पास न कोई कड़ाही थी, न कोई दूसरा बर्तन, न सामान की बोरियाँ।
"सौ आदमी और एक हांडी?" मंगला ने कहा। "यह ख़ाली नहीं होगी," लड़के ने कहा। "जब तक आप इससे बोलती रहेंगी। चुप हुईं, तो बंद।" "इससे बोलूँ?" "जी। हांडी से।"
मंगला तीस बरस में ऐसी बात पहली बार सुन रही थी, पर वह मज़दूरी ले चुकी थी। उसने करछी उठाई, हांडी में डाली, और साफ़ आवाज़ में कहा कि पहले कढ़ी चढ़ेगी। करछी भरी हुई निकली।
पहला घंटा आसान था। उसने कढ़ी की पूरी विधि ज़ोर-ज़ोर से सुनाई, फिर उसकी सारी ग़लतियाँ जो लोग करते हैं। फिर उसने बताया कि बेसन कब डालना है और क्यों नहीं डालना है। मेहमान आते रहे और थाली भरती रही।
रास्ता बदल गया
दूसरे घंटे में विधियाँ ख़त्म हो गईं। मंगला ने उन ब्याहों के बारे में बोलना शुरू किया जिनमें वह जा चुकी थी। किस घर ने घी में मिलावट की, किसने बारातियों को ठंडी पूरी खिलाई, किसके यहाँ बरतन गिनकर लौटाने पड़े। बोलते-बोलते उसे हँसी आ गई और करछी नहीं रुकी।
तीसरे घंटे में उसने महसूस किया कि कोई सुन ही नहीं रहा। मेहमान आते थे, खाते थे, चले जाते थे। किसी ने उसकी तरफ़ आँख उठाकर नहीं देखा। उसने जाँचने के लिए ज़ोर से कहा कि सामने वाले मेहमान की पगड़ी बेढंगी बँधी है। किसी ने सिर नहीं घुमाया।
उसके बाद मंगला ने वह सब कहना शुरू किया जो उसने कभी किसी से नहीं कहा था।
उसने माँ से शुरू किया, जो उसे रसोई में घुसने नहीं देती थी और जिसने मरते वक़्त भी यही कहा कि लड़की का हाथ भारी है। उसने हरखू के बारे में बताया, जिससे उसका ब्याह हुआ था, जो अच्छा आदमी था और जिससे उसने कभी यह नहीं कहा कि वह अच्छा आदमी है।
उसने उस बच्चे के बारे में बताया जो ढाई साल का था और जो एक बरसात में चला गया। उसने यह भी बताया कि उस बरस उसने किसी ब्याह में काम नहीं किया, और अगले बरस से वह हर ब्याह में काम करने लगी, और दोनों बातों की वजह एक ही थी।
फिर उसने वे बातें भी बताईं जो उसे अच्छी नहीं लगती थीं। एक साल दूध में पानी मिलाकर उसने खोया बनाया था। एक बार उसकी जिठानी को मदद चाहिए थी और वह जान-बूझकर दूसरे रास्ते से निकल गई थी। हांडी ने कुछ नहीं कहा और खाना चलता रहा।
फिर बाढ़ वाला साल आया। उसने बताया कि तीन हफ़्ते वह राहत के तंबू में रोज़ खाना बनाती रही और किसी से एक पैसा नहीं लिया, और यह बात उसने आज तक अपने घर में भी नहीं बताई, क्योंकि बताने पर वह छोटी हो जाती।
भोर के क़रीब उसकी आवाज़ बैठ गई थी। वह फुसफुसा रही थी और करछी अब भी भरी निकल रही थी। आख़िरी मेहमान ने थाली रखी और उठ गया। मंगला चुप हो गई। करछी अगली बार ख़ाली निकली।
लड़का उसे दरवाज़े तक छोड़ने आया और उसने बिलकुल उतनी ही मज़दूरी दी जितनी वह ब्याह में लेती थी, एक पैसा ज़्यादा नहीं। "बस इतना?" "आप बोलती रहा कीजिए," उसने कहा, और दरवाज़ा बंद हो गया। पीछे मुड़कर देखने पर वहाँ सिर्फ़ खेत थे।
उसके बाद से मंगला रसोई में चुप नहीं रहती। वह चूल्हे के सामने बैठकर बोलती रहती है, कभी विधि, कभी पुराने ब्याह, कभी वह सब जो उस रात हांडी ने सुना था। उसकी पोती तिजिया चौके की चौखट पर बैठकर बड़ी हुई है, और उसे अपनी दादी की पूरी कहानी आती है, वे हिस्से भी जो कोई किसी को नहीं बताता।