गाँव की बावड़ी चालीस सीढ़ी गहरी थी और चैत तक उसमें पानी नहीं बचता था। सीढ़ियाँ चारों दीवारों पर बनी थीं, एक के नीचे एक, इतनी कि ऊपर से देखने पर आँख फिसल जाती थी। तली में हरी काई की एक चौकोर परत रहती थी। बस उतनी सी नमी।

धापू तेरह की थी। उसके बापू रूपसिंह अठारह महीने पहले कोटा गए थे, किसी कारख़ाने में। पहले हर महीने पैसे आते थे और साथ में दो लाइन की चिट्ठी। चिट्ठी में हमेशा वही दो लाइनें होती थीं, कि तबीयत ठीक है और कि दिवाली पर आने की कोशिश करेगा। चार महीने से न पैसे आए, न लाइनें।

उसकी माँ भागवंती हर बात का एक ही जवाब देती थी। "आ जाएगा।" यह जवाब वह चौका माँजते हुए देती थी, बकरी बाँधते हुए देती थी, और रात को दीया बुझाते हुए भी यही देती थी। धापू ने गिनना छोड़ दिया कि कितनी बार सुन चुकी है।

एक अजनबी मिला

बावड़ी के बारे में गाँव में एक बात चलती थी। तली से नौवीं सीढ़ी के नीचे कुछ है जो एक सवाल का सच्चा जवाब देता है। सिर्फ़ एक। बूढ़े इसे ऐसे सुनाते थे जैसे मज़ाक हो, और सुनाने के बाद हँसते नहीं थे।

क़ीमत भी बताई जाती थी। नीचे उतरते हुए हर सीढ़ी एक चीज़ ले लेती है, उनमें से जो तुम्हें आती है। कौन सी, यह वह तय करती है, तुम नहीं। ऊपर आते हुए कुछ नहीं जाता, पर जो गया वह लौटता भी नहीं।

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चैत की एक रात धापू ने दीया जलाया और बावड़ी में उतर गई। उसने माँ को नहीं बताया। रस्सी उसने साथ नहीं ली, क्योंकि सीढ़ियाँ चौड़ी थीं और डर रस्सी से कम नहीं होता।

पहली तीस सीढ़ियाँ कुछ नहीं थीं। बस अँधेरा था और पत्थर ठंडा था और उसकी अपनी साँस बहुत पास से सुनाई देती थी। नीचे उतरते-उतरते ऊपर का चौकोर आसमान छोटा होता गया, फिर हथेली जितना, फिर बंद।

दसवीं सीढ़ी पर हवा बदल गई। वह भारी नहीं हुई, ठंडी नहीं हुई, बस रुक गई। दीये की लौ सीधी खड़ी हो गई और हिलना बंद कर दिया।

सुबह होने से पहले

धापू ने नौवीं सीढ़ी पर पैर रखा। कुछ नहीं हुआ। फिर उसने चलते-चलते अपनी बकरी को पुकारना चाहा, जैसे रोज़ शाम को पुकारती थी, और नाम नहीं आया। वह जगह ख़ाली थी। नाम वहाँ से उठा लिया गया था और उसे यह भी नहीं पता था कि नाम क्या था।

आठवीं पर उसकी माँ की गुनगुनाहट गई। वह धुन उसने जन्म से सुनी थी और अब उसे इतना ही याद था कि कोई धुन थी। सातवीं पर कोई चेहरा गया, और वह नहीं जान पाई कि किसका, क्योंकि जानने वाली चीज़ ही चली गई थी।

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छठी पर उसे लगा कि वह गिनती भूलने लगी है, सो उसने ज़ोर से गिनना शुरू किया। पाँच। चार। तीन। आवाज़ दीवारों से लौटकर आती रही और हर बार ज़रा देर से आई।

दूसरी सीढ़ी पर उसे यह याद करने में वक़्त लगा कि वह यहाँ आई क्यों है। उसने अपने आप से दो बार कहा, बापू, कोटा, चिट्ठी। तीन शब्द। उन्हें उसने मुट्ठी की तरह पकड़े रखा।

तली पर काई थी और काई के बीच में एक छोटा गड्ढा, जिसमें उतना ही पानी था जितना दो हथेलियों में आ जाए। उसमें कोई सूरत नहीं थी। धापू घुटनों पर बैठ गई और उसने पूछा कि उसके बापू कहाँ हैं।

जवाब उसके कानों में नहीं आया। वह सीधे उसके भीतर आ गया, जैसे कोई बात हमेशा से मालूम रही हो। कोटा में मंडी के पीछे एक चक्की है। रूपसिंह वहीं है। पंद्रह महीने पहले उसका दायाँ हाथ कलाई से नीचे मशीन में चला गया था। वह ज़िंदा है। वह लौटा नहीं क्योंकि वह ख़ाली हाथ लौटना नहीं चाहता था, और अब वह सचमुच ख़ाली हाथ था।

धापू बहुत देर तक वहीं बैठी रही। फिर वह उठी और चढ़ने लगी। चढ़ते हुए कुछ नहीं गया, जैसा बताया गया था। पर हर सीढ़ी पर उसे वह जगह महसूस हुई जहाँ पहले कुछ था।

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ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि भोर हो रही है। बकरी दरवाज़े पर बँधी थी और उसने उसे पुकारना चाहा और चुप रह गई। माँ चौके में थी और कुछ गुनगुना रही थी, और धापू को वह धुन पहली बार सुनी हुई लगी।

वह उसी हफ़्ते कोटा गई। मंडी के पीछे चक्की मिल गई और रूपसिंह वहीं मिला, बोरियाँ गिनता हुआ, बाएँ हाथ से। भीतर आटे की धूल हवा में तैर रही थी और उसमें साँस लेने पर गले में मीठा सा लगता था। उसने बेटी को देखा और गिनती भूल गया। दोनों में से किसी ने वहाँ कुछ नहीं पूछा।

लौटती बस में धापू ने उससे कहा कि कुछ चीज़ें उसे याद नहीं हैं और वह चाहती है कि बापू उन्हें बता दे। रास्ता सात घंटे का था। रूपसिंह ने बकरी का नाम बताया, फिर गली का नाम, फिर उन लोगों के नाम जिनके चेहरे उसे अब जोड़ने नहीं आते थे। कोटा से गाँव तक वे लगातार बोलते रहे, और इतना वे पहले कभी नहीं बोले थे।