नौ बजते ही बुरहानपुर की वे गलियाँ ख़ाली हो जाती थीं, और पूस में तो उससे भी पहले। अजमल की कोठरी उन्हीं गलियों में से एक के आख़िर में थी, इतनी छोटी कि पैर फैलाकर सोने के लिए दरवाज़ा खोलना पड़ता था। भीतर एक चौकी थी, एक चिराग़, और खूँटी पर उसका अपना कोट।

वह रफ़ूगर था। फटे कपड़े को इस तरह जोड़ना कि जोड़ ढूँढ़े न मिले, यही उसका काम था। अच्छा रफ़ूगर वह होता है जिसका नाम कोई नहीं जानता, क्योंकि जिसके कपड़े में जोड़ दिखता ही नहीं, वह किसी को बताता भी नहीं कि कपड़ा फटा था।

तीस बरस उसने यही किया था। अब आँखें साथ छोड़ रही थीं। सूई में धागा डालने में उसे चार बार लगते थे और चौथी बार भी वह चिराग़ को नाक तक ले आता था। काम कम हो गया था। लोग अब फटा कपड़ा फेंक देते थे, जोड़ते नहीं थे।

रात का वादा

उस रात वह चिराग़ बुझाने ही वाला था कि दरवाज़ा खटका। बाहर एक बुढ़िया खड़ी थी। उसके कंधे पर एक शॉल थी और उसके बीचोंबीच अंगारे का जला हुआ छेद था, मुट्ठी जितना बड़ा। किनारे झुलसे हुए थे और वहाँ धागा बचा ही नहीं था।

"यह नहीं होगा," अजमल ने कहा। "रफ़ू वहाँ होता है जहाँ धागा बचा हो। यहाँ कुछ बचा नहीं है।" "कोशिश तो करो।" "अम्मा, तीस साल का काम है मेरा। यह नहीं होगा।"

📚 यह भी पढ़ें परी की दावत
परी की दावत सौ मेहमान, एक हांडी, और एक अजीब शर्त। जब तक वह हांडी से बोलती रहेगी, खाना ख़त्म नहीं होगा। पढ़ें 'परी की दावत', एक मज़ेदार और गरमाहट भरी जादुई कहानी।

बुढ़िया ने शॉल चौकी पर रख दी। फिर उसने अपने जूड़े से एक सुई निकाली और शॉल पर रख दी। सुई मामूली थी, ज़रा लंबी, और उसका छेद इतना बड़ा था कि धागा अपने आप गिर जाए। "इससे जो टाँका लगेगा, दिखेगा नहीं," उसने कहा। "शर्त एक है। अपनी कोई चीज़ मत सीना।"

वह चली गई और अजमल देर तक सुई को देखता रहा। फिर उसने धागा डाला। धागा पहली बार में चला गया। उसने शॉल उठाई और काम शुरू किया, और उसे लगा कि उसका हाथ उससे आगे-आगे चल रहा है।

भोर तक छेद कहीं नहीं था। उसने शॉल को चिराग़ के सामने घुमाकर देखा, उलटकर देखा, धूप में ले जाकर देखा। जोड़ का पता नहीं चला। बुढ़िया शॉल लेने कभी नहीं आई।

किसने मदद की

बात फैलने में हफ़्ता लगा। फिर कोठरी के बाहर सुबह से लोग खड़े होने लगे। जली हुई साड़ियाँ, चूहों की काटी हुई रज़ाइयाँ, वे कपड़े जिन्हें दो-दो दर्ज़ी लौटा चुके थे। अजमल सबका काम करता था और किसी से ज़्यादा पैसे नहीं लेता था।

कुछ काम कपड़े से बड़े थे। एक औरत अपने बेटे का कुर्ता लाई, कंधे से फटा हुआ। लड़का दो साल पहले गुज़र गया था और कुर्ता तब से आले पर रखा था, रोज़ दिखता हुआ। अजमल ने उसे जोड़ दिया। औरत ने उसे पलटकर देखा, फिर तह किया, और पहली बार संदूक में रख दिया।

📚 यह भी पढ़ें नौ सीढ़ियाँ
नौ सीढ़ियाँ बावड़ी की तली में एक सच्चा जवाब मिलता है, पर नीचे उतरने वाली हर सीढ़ी एक याद ले लेती है। पढ़ें 'नौ सीढ़ियाँ', एक लड़की और उसके गुम पिता की जादुई कहानी।

तारावती अपनी शादी का दुपट्टा लाई, जो उसकी बहू ने खींचकर फाड़ दिया था। जोड़ने के बाद वह किसी को नहीं बता पाई कि कहाँ फटा था, इसलिए झगड़ा भी वहीं ख़त्म हो गया। ऐसे बहुत से काम थे। अजमल उन्हें गिनता नहीं था।

खूँटी पर उसका अपना कोट सात बरस से टँगा था। कंधे पर एक जोड़ था, मोटे धागे का, टेढ़े टाँकों वाला, दूर से दिखने वाला। वह ज़ुबैदा ने लगाया था। उसे रफ़ू आता नहीं था और उसने बहुत बुरा जोड़ा था, और अजमल ने उसे कभी ठीक नहीं किया क्योंकि वह उसका आख़िरी काम था। ज़ुबैदा को गए छह बरस हो चुके थे।

उस साल फिर पूस आया। एक सुबह कोट पहनते हुए कंधे पर कुछ चटका, और ज़ुबैदा के टाँकों के ठीक बग़ल में कपड़ा फट गया। नया फटन पुराने जोड़ से सटा हुआ था। दोनों को एक साथ ठीक किए बिना कुछ नहीं होना था।

अजमल तीन दिन तक उसे टालता रहा। चौथी रात उसने कोट उतारकर चौकी पर रखा और सुई उठा ली। उसने ख़ुद से कहा कि यह एक कोट है, और यह उसका आख़िरी कोट है, और उस बुढ़िया को गए साल भर हो गया।

सुई की नोक कपड़े से छुई ही थी कि वह ठंडी पड़ गई, बर्फ़ जैसी। उसी पल आले पर रखी शॉल पर जले का निशान उभर आया, हल्का, जैसे पानी में स्याही फैलती है। अजमल ने खिड़की से बाहर देखा। सामने वाले घर की छत पर तारावती का दुपट्टा सूख रहा था, और उसके बीच में एक लकीर पड़नी शुरू हो गई थी।

📚 यह भी पढ़ें तीन दाने
तीन दाने दादी ने तीन दाने दिए और एक शर्त रखी। बीहड़ पार करके ढरकी लाने निकले एक बुनकर लड़के की जादुई कहानी। पढ़ें 'तीन दाने'।

उसने सुई हटा ली। शॉल का निशान रुक गया और धीरे-धीरे मिट गया। दुपट्टे की लकीर भी बैठ गई। अजमल बहुत देर तक चौकी पर बैठा रहा और उसका हाथ काँपता रहा।

फिर उसने अपने पुराने डिब्बे से मोटा धागा निकाला और आँख के पास चिराग़ लाकर, चार कोशिशों में, उसे सूई में डाला। उसने अपना कोट अपने हाथ से सिया। टाँके टेढ़े पड़े और दूर से साफ़ दिखते थे।

कोट अब भी उसी खूँटी पर टँगा रहता है। कंधे पर दो जोड़ हैं, अगल-बगल, दोनों भद्दे, दोनों दिखने वाले। अजमल उसे हर पूस में पहनता है और किसी से यह नहीं कहता कि कौन सा किसका है।