हौज़ में डूबने से पहले कपड़ा सफ़ेद था और निकलने पर वह नील का नहीं था। भँवरू ने उसे डंडे से उठाकर हवा में फैलाया। रंग हरा था। समुद्री हरा, जिसमें नीचे की तरफ़ थोड़ा पीलापन था, जैसा तालाब के किनारे की काई पर धूप पड़ने पर होता है।

छगन पीछे खड़ा था और उसकी साँस रुक गई। 'चाचा, नील डाला था न?' 'डाला था।'

बगरू में रंगाई का काम तीन सौ बरस से होता आया है और भँवरू के घर में सात पीढ़ी से। जेठ के सावों में काम सबसे ज़्यादा रहता है, क्योंकि उन दिनों गाँव-गाँव में शादियाँ पड़ती हैं और हर घर से एक ओढ़नी आती है।

आँगन में चार हौज़ थे। तीन पक्के, चूने और पत्थर के, जिनमें रोज़ का काम होता था। और एक कोने में, नीम के नीचे, वह पुराना हौज़ था जिसकी दीवार पर उसके परदादा के वक़्त की एक लकीर बनी हुई थी।

उस हौज़ का पानी बाक़ी तीनों से अलग था। वह गाढ़ा था, ऊपर से हरी झाग बनाता था, और उसमें से वह गंध आती थी जो पुराने नील से आती है और जिससे नए रंगरेज़ नाक सिकोड़ते हैं। नियम भँवरू को उसके बाप ने बताया था और उसने अपने बाप से सुना था।

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उसमें कपड़ा उस रंग में निकलता है जो पहनने वाले का अपना रंग होता है। जो मँगवाया गया हो, उसका उससे कोई लेना-देना नहीं।

इसीलिए वह हौज़ बरस में दो-चार बार ही चलता था और तब चलता था जब भँवरू ख़ुद चाहता था। ओढ़नी बनवाने वाली को यह मालूम नहीं होता था। उसे बस इतना पता चलता था कि भँवरू के हाथ का रंग बाक़ी सबसे अलग बैठता है।

और नियम का दूसरा हिस्सा यह था कि वह अपने लिए उसमें कुछ नहीं डाल सकता था।

उसने एक बार डाला था, जवानी में, अपनी शादी का साफ़ा। वह सफ़ेद निकला था, जैसा गया था, बिलकुल वैसा ही, और उसके बाद उसने कभी अपनी चीज़ उसमें नहीं डाली। इस बार का काम तीजा का था।

तीजा की शादी तीन दिन बाद थी और उसकी दादी कैलाशी ने तीन महीने पहले से कह रखा था कि लहरिया भँवरू के हाथ का ही चढ़ेगा, और लाल चढ़ेगा। लाल ही चढ़ता है। शादी में और कुछ चढ़ता ही नहीं।

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भँवरू ने वह ओढ़नी पुराने हौज़ में डाली थी, इस भरोसे में कि लड़की का अपना रंग भी लाल के आसपास ही कहीं होगा। सत्रह बरस की लड़की के रंग में और क्या होता है। हरा निकला। छगन ने कहा कि दोबारा डाल दो।

भँवरू ने दोबारा डाला। दो घंटे रखा और बीच-बीच में डंडे से घुमाता रहा, जैसा गहरा रंग चढ़ाने के लिए घुमाया जाता है। फिर निकाला। वही हरा, बल्कि पहले से थोड़ा और गहरा। तीसरी बार उसने नील की मात्रा दुगनी की और कपड़ा रात भर डूबा रहने दिया। सुबह उसने उसे निकाला और आँगन में फैलाया।

हरा। दोपहर को कैलाशी आ गई। वह पचहत्तर के आसपास की थी, कमर से झुकी हुई, और उसकी आवाज़ पूरे मोहल्ले तक जाती थी। उसने ओढ़नी देखी और वहीं बैठ गई।

'यह क्या है?'

इसका जवाब भँवरू के पास नहीं था। नियम बताया नहीं जाता। जिस दिन बता दिया जाए उस दिन लोग रंग नहीं, फ़ैसला माँगने आने लगेंगे। उसने कहा कि रंग बैठा नहीं। 'तीन दिन में शादी है।' 'मालूम है।'

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कैलाशी ने कहा कि जयपुर से मँगवा लेंगे, बना-बनाया, और चली गई। जाते-जाते उसने यह भी कहा कि सात पीढ़ी की बात करते हो और एक ओढ़नी नहीं रँगी गई।

उस रात भँवरू आँगन में बैठा रहा। रास्ते दो थे और दोनों उसे साफ़ दिख रहे थे।

पहला यह कि हरी ओढ़नी लौटा दे और बात ख़त्म। लड़की जयपुर वाली पहनेगी, जो हर दूसरी लड़की पहनती है, और भँवरू के हाथ का नाम एक शादी में ख़राब होगा। दूसरा यह कि वह उसी हरे कपड़े पर ऊपर से लाल चढ़ा दे।

यह किया जा सकता था। नीचे का रंग ढक जाता है और ऊपर वाला बैठ जाता है, थोड़ा गहरा होकर सही। पर पुराने हौज़ के बारे में एक बात और थी, जो उसके बाप ने आख़िरी दिनों में बताई थी।

उस हौज़ का दिया हुआ रंग जिस दिन किसी दूसरे रंग से ढका जाएगा, हौज़ उस दिन आम हो जाएगा। उसके बाद वह चूने और पत्थर का एक गड्ढा रह जाएगा, जिसमें नील घुलता है और कपड़ा नीला निकलता है, और बस।

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भँवरू ने सारी रात यह सोचा और सुबह उठकर लाल घोला। छगन ने रोकने की कोशिश की। उसने कहा कि लड़की को हरा पहना दो, कह देंगे कि नया चलन है। 'नया चलन इस शादी में नहीं चलेगा,' भँवरू ने कहा। 'और लड़की को बीस साल यही सुनना पड़ेगा कि उसकी ओढ़नी अलग थी।'

उसने कच्चा लोहा और आम की छाल वाला वह लाल घोला जो उसके घर में बनता आया था, और ओढ़नी उसमें डुबोई। डुबोते वक़्त उसका हाथ काँपा नहीं।

जब उसने उसे निकाला तो वह गहरा लाल थी, बहुत गहरा, ऐसा लाल जो उस मोहल्ले में किसी ने नहीं देखा था, क्योंकि उसके नीचे हरा दबा हुआ था। तीजा ने उसे तीन दिन बाद पहना और चार गाँवों में उसकी बात हुई।

उसी शाम भँवरू ने पुराने हौज़ में एक सफ़ेद कपड़ा डालकर देखा। वह नीला निकला। साफ़, अच्छा, बराबर नीला, बिलकुल वैसा ही जैसा बाक़ी तीनों हौज़ों से निकलता था।

उसने वह टुकड़ा फेंका नहीं। वह उसे सुखाकर, तह करके, अपने संदूक में उस साफ़े के नीचे रख आया जो जवानी में सफ़ेद ही निकला था। पंद्रह बरस बाद जब वह संदूक खुला तो उसमें रखे बाक़ी सब कपड़े धूप और नमी खाकर फीके पड़ चुके थे, और वह एक टुकड़ा उतना ही नीला था जितना उस शाम था।