बक्से में इकतीस पुतलियाँ थीं और उनमें से एक का चेहरा नहीं बना था। बाक़ी तीस पर आँखें थीं, नाक थी, मूँछें थीं, और गालों पर लाल रंग था। उस एक पर सिर्फ़ सफ़ेद कपड़ा था, सिर के आकार में सिला हुआ। एक भी लकीर नहीं।

टेकराम के परदादा ने उसे ऐसे ही बनाया था और घर में यही बताया जाता था कि जान-बूझकर बनाया था। उसका नियम एक ही था। पूरे परिवार को मालूम था। जो उस पुतली को नाचते हुए देखता है, उसे उसमें अपना कोई गया हुआ आदमी दिखता है।

यह हर देखने वाले के साथ अलग होता है। एक ही खेल में बीस लोग बैठे हों तो बीसों को अलग-अलग चेहरा दिखता है, और उनमें से कोई किसी दूसरे को नहीं बता पाता कि उसे क्या दिखा। नियम का दूसरा हिस्सा यह था।

जो डोर पकड़े हुए है, उसे कुछ नहीं दिखता। यह अपने आप में अजीब नहीं लगता। खिलाने वाला ऊपर परदे के पीछे रहता है और वह पुतली को सामने से देखता ही नहीं। पर बात इतनी नहीं थी। इससे बहुत आगे की थी।

जो आदमी उस पुतली को खिलाता है, उसे अपने अपने गए हुए लोग याद आने बंद हो जाते हैं। नाम याद रहता है, बात याद रहती है, तारीख़ भी याद रहती है। चेहरा नहीं बनता, और उसके साथ वह चीज़ भी नहीं बनती जो चेहरे के साथ आती है।

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टेकराम को यह उन्तीस बरस से मालूम था। अपने ऊपर से।

उसने पहली बार वह पुतली उन्नीस की उम्र में खिलाई थी और उसके बाद से वही खिलाता आया था, क्योंकि घर में और कोई नहीं था जो उसे खिलाना चाहे। उस बरस तीज का मेला भरने वाला था। सावन की चौथ को।

सावन में उस इलाक़े के मेले बड़े होते हैं और कठपुतली वालों का पूरा साल उन्हीं दस-बारह दिनों पर टिका रहता है। उस बार गाँव वालों ने पहले से कहलवा भेजा था। दो आदमी आए थे। जून में वहाँ एक हादसा हुआ था। तालाब की पाल टूटी थी और उसमें उस गाँव के चार लोग गए थे, जिनमें दो बच्चे थे।

जो कहलवाया गया वह सीधा नहीं कहा गया। सरपंच ने बस इतना कहा कि पूरा खेल दिखाना और कुछ छोड़ना नहीं। इसका मतलब पूरे इलाक़े में एक ही होता है और टेकराम समझ गया। उसकी अपनी माँ उसी बरस फरवरी में गई थी।

पाँच महीने हो चुके थे और उसे एक बार भी उनका चेहरा नहीं बना था। उसे उनकी आवाज़ याद थी। उनके कहने का तरीक़ा याद था। यह भी याद था कि वे बक्सा बाँधते वक़्त हमेशा गिनती करती थीं और इकतीस पर रुकती थीं।

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चेहरा नहीं बनता था। एक बार भी नहीं बना। उसे यह भी पता था कि अब वह चेहरा कैसे बन सकता है। अगर वह किसी और के हाथ में डोर दे दे और ख़ुद सामने बैठ जाए, तो उसे वह दिख जाएगा। एक बार, और शायद उसके बाद हमेशा।

उसके घर में डोर पकड़ने लायक़ एक ही और आदमी था। मुकुंद चौदह का था और उसे बाक़ी तीसों पुतलियाँ खिलानी आ गई थीं। इस एक को उसने कभी नहीं छुआ था, क्योंकि टेकराम ने उसे छूने नहीं दिया था।

मेले की तीसरी शाम को टेकराम ने बक्सा खोला। उसने तीसों पुतलियाँ निकालीं और मुकुंद को दीं। फिर उसने सबसे नीचे से वह एक निकाली। मुकुंद ने कहा कि आज यह भी मैं ही कर लूँ। उसने यह किसी चालाकी से नहीं कहा। वह चौदह का था और उसे बस लगा कि आज बहुत भीड़ है और बाप थका हुआ है।

टेकराम ने उसका हाथ रोक दिया। बीच में ही। उसने उसे वजह नहीं बताई और उस रात के बाद भी कभी नहीं बताई। खेल उस शाम पूरा हुआ। एक भी पुतली छूटी नहीं।

बिना चेहरे वाली पुतली आख़िर में आती है और वह कुछ बोलती नहीं। वह सिर्फ़ आती है, धीरे-धीरे बीच तक चलती है, और मुड़कर वापस चली जाती है। इसमें कुल छह मिनट लगते हैं। उन छह मिनटों में तीन सौ से ऊपर लोग बैठे थे और परदे के पीछे से भी सुना जा सकता था कि क्या हो रहा है।

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टेकराम को कुछ नहीं दिखा। कुछ भी नहीं। उसे वही दिखा जो हमेशा दिखता है। लकड़ी का सिर, सफ़ेद कपड़ा, और अपनी उँगलियों की चाल। खेल के बाद गाँव वालों ने उसे रोका और खाना खिलाया और तय दाम से ज़्यादा दिया।

उसने ज़्यादा नहीं लिया। तय दाम ही रखा। मेला ख़त्म होने पर वे लोग आगे बढ़ गए, जैसे हर बरस बढ़ते हैं। टेकराम अब उनसठ का है और अब भी वही डोर पकड़ता है। मुकुंद अब बड़ा हो चुका है और उसका अपना बक्सा है, जिसमें छब्बीस पुतलियाँ हैं और सब चेहरों वाली।

पुराने बक्से में अब भी इकतीस हैं। बाँधते वक़्त गिनती की जाती है।

बिना चेहरे वाली सबसे नीचे रहती है, सीधी लिटाई हुई, और उसके ऊपर बाक़ी तीस रखी जाती हैं। बक्सा उन्नीस सौ इकतालीस का है और उसमें रखे कपड़े धीरे-धीरे पीले पड़ते जाते हैं। उस एक का सफ़ेद कपड़ा उतना ही सफ़ेद है जितना टेकराम ने उसे पहली बार देखा था, और यह उस बक्से में अकेली चीज़ है जिस पर वक़्त का कोई निशान नहीं पड़ा।