सुखमनी तीसरी बार आई। इस बार वे दोपहर में आईं, जब गली में कोई देखता नहीं, और फुलमनी आँगन में बैठी सुइयाँ बाँध रही थी।
गोदने की सुइयाँ अकेली काम नहीं करतीं। तीन या पाँच सुइयों को धागे से एक साथ, एक ही सिरे पर, लकड़ी की पतली डंडी से कसकर बाँधा जाता है, ताकि एक चुभन में एक ही जगह पर बराबर गहराई जाए। बँधाई ढीली रह जाए तो निशान फैल जाता है और बीस बरस बाद वह धब्बा दिखता है, लकीर नहीं।
बासठ की हो चुकी फुलमनी को यह काम बिना देखे आता था। स्याही उसने साथ ही घोल रखी थी। दीये की कालिख, थोड़ा-सा सरसों का तेल, और भेलवा की छाल का पानी, जो निशान को काला रखता है। 'बैठ जा,' उसने कहा।
'तू करेगी?' 'बैठ जा पहले।' जेठ का महीना था और गाँव में उन दिनों लोग लौट रहे थे।
बरसात से पहले भट्ठे बंद हो जाते हैं। मज़दूर बंगाल और ओडिशा से चलकर आते हैं, आठ-आठ महीने बाद, और मई के आख़िर से जून के पहले हफ़्ते तक रोज़ किसी न किसी घर में कोई पहुँचता रहता है। सुखमनी के घर ग्यारह बरस से कोई नहीं पहुँचा था।
उनका लड़का सोमरा उन्नीस का था जब गया था। पहले दो साल पैसा आता रहा। फिर एक बार ख़बर आई कि वह दूसरे भट्ठे पर चला गया है। उसके बाद कुछ नहीं। 'मुझे चेहरा चाहिए,' सुखमनी ने कहा। यही वे पिछली दोनों बार भी कह चुकी थीं।
उनकी तकलीफ़ यह नहीं थी कि लड़का नहीं लौटा। यह वे बहुत पहले मान चुकी थीं। तकलीफ़ यह थी कि पिछले बरस से उन्हें उसका चेहरा ठीक-ठीक याद नहीं आता। आँख याद आती थी। हँसी याद आती थी। पूरा चेहरा एक साथ नहीं बनता था।
फुलमनी की सुई से जो एक ख़ास गोदना बनता है, उसके बारे में गाँव में कोई खुलकर बात नहीं करता, पर हर बूढ़ी औरत जानती है।
वह कलाई से कुहनी तक जाने वाली एक सीधी ज़ंजीर है, जिसमें बीच-बीच में सात जगह दो-दो बिंदु पड़ते हैं। बाक़ी गोदनों की तरह यह सुंदर नहीं है और कोई इसे शौक़ से नहीं बनवाता। उसका नियम यह है कि गोदने वाली जिस चेहरे को मन में रखकर सुई चलाए, वह चेहरा पहनने वाले को उम्र भर साफ़ याद रहता है।
और उसका दूसरा नियम यह है कि उसकी क़ीमत पहनने वाला नहीं देता। देती गोदने वाली है, अपनी किसी एक याद से, और कौन-सी याद जाएगी यह उसके हाथ में नहीं होता। फुलमनी ने अपनी उम्र में यह दो बार बनाया था।
पहली बार अट्ठाईस की उम्र में। उसके बाद उसे यह याद नहीं रहा कि उसकी शादी में क्या पकाया गया था, हालाँकि वह उस दिन का बाक़ी सब कुछ आज तक बता सकती है। दूसरी बार इकतालीस पर। उसके बाद उसे अपने बड़े भाई का चलना याद नहीं रहा। शक्ल याद रही, आवाज़ याद रही, पर वह किस तरह चलता था, यह गया।
पिछली दोनों बार उसने सुखमनी को मना किया था।
पहली बार उसने कहा था कि यह चीज़ बनवाने लायक़ नहीं है। दूसरी बार उसने कहा था कि लड़का लौट भी सकता है, और तब यह बेकार का दुख रह जाएगा। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। उसने सुइयाँ खोलीं और गिनकर पाँच लीं, तीन नहीं।
'तू जानती है इसमें क्या लगता है?' सुखमनी ने पूछा। 'तू नहीं देगी।' 'तो कौन देगा?' फुलमनी ने डंडी कसकर बाँधी और कालिख वाली कटोरी पास खिसका ली। 'बाँह रख।' काम में चार घंटे लगे।
गोदना जल्दी नहीं बनता। हर बिंदु के बाद ख़ून पोंछना पड़ता है, स्याही दोबारा भरनी पड़ती है, और बीच-बीच में रुकना पड़ता है ताकि चमड़ी सूज न जाए। जेठ की दोपहर में यह और भी धीरे होता है। फुलमनी ने पूरे चार घंटे सोमरा का चेहरा मन में रखा।
वह उसे जानती थी। वह उसे उन्नीस बरस तक उसी गाँव में देखती आई थी, दुबला लड़का, दाएँ भौं के ऊपर एक कटा हुआ निशान, और ऊपर के दो दाँत ज़रा-से आगे। शाम को जब उसने आख़िरी बिंदु लगाया, तब उसे कुछ भी महसूस नहीं हुआ।
यह हर बार ऐसा ही होता है। जो जाता है वह जाते वक़्त पता नहीं चलता। बाद में किसी दिन आदमी उस चीज़ तक हाथ बढ़ाता है और वहाँ कुछ नहीं मिलता। सुखमनी ने अपनी बाँह देखी, फिर नीचे कर ली, और घर चली गईं।
अगले दिन फुलमनी को दूसरे गाँव में काम था। वहाँ एक लड़की का गोदना बनना था, कंधे पर, फूल वाला। वह बैठी, सुइयाँ बाँधीं, स्याही घोली, और लड़की की बाँह पकड़ी।
फिर उसने गाना शुरू करना चाहा।
गोदना बिना गाने के नहीं बनता। सुई की चाल गाने की चाल से बँधी होती है और यही वजह है कि पुराने गोदनों की लकीरें इतनी बराबर होती हैं। जो गाना फुलमनी बचपन से गाती आई थी, वह उसकी माँ का था, और उसकी माँ ने उसे अपनी माँ से लिया था।
उस दिन वह गाना नहीं आया।
शब्द उसे याद थे। सब के सब। पर धुन नहीं थी। वह जगह ख़ाली थी, जैसे चूल्हे की राख हटा दो और नीचे ठंडी ज़मीन मिले। उसने उस दिन का काम धीरे-धीरे, बिना धुन के पूरा किया और वह ठीक बना, बस उसमें वह बात नहीं थी।
सोमरा नहीं लौटा।
सुखमनी चार साल और जीवित रहीं। उन्होंने वह बाँह किसी को दिखाई नहीं और गर्मियों में भी पूरी बाँह का ब्लाउज़ पहनना शुरू कर दिया, पर उनके बाद घर वालों ने बताया कि आख़िरी दिनों तक वे अपने लड़के के बारे में ऐसे बात करती थीं जैसे वह कल ही निकला हो, और उन्हें उसकी भौं वाला निशान तक याद था।
फुलमनी अब भी काम करती है। बैठने से पहले वह साथ की किसी जवान औरत से कहती है कि तू गा, मैं सुई चलाती हूँ। वे गाती हैं, और उनकी धुन उसकी माँ वाली धुन से थोड़ी अलग है, ज़रा तेज़ और ज़रा ऊँची, और फुलमनी की सुई अब उसी थोड़ी अलग चाल पर चलती है।