हँसिया धागों में फँसा और जगेसर ने उसे झटके से खींच लिया।

वह तने की पहली मोटी डाल पर बैठा था, ज़मीन से नौ फ़ुट ऊपर, और उसके नीचे सूत की परत इतनी मोटी थी कि छाल दिख ही नहीं रही थी। वट सावित्री को दो दिन हो चुके थे।

उस दिन गाँव की सब औरतें आती हैं, बरगद के चारों तरफ़ घूमती हैं, और हर चक्कर पर तने पर कच्चा सूत लपेटती जाती हैं। सात चक्कर, कोई-कोई इक्कीस। दो सौ औरतों का सूत मिलकर तने पर एक मोटा कमरबंद बन जाता है।

दो-चार दिन बाद उसे उतारना पड़ता है।

सूत बरसात में भीगकर सड़ता है और छाल के नीचे कीड़ा लग जाता है। यह बात रघुनाथ पंडित के बाबा के वक़्त से मानी जाती है और तब से हर बरस कोई न कोई लड़का ऊपर चढ़कर काटता आया है।

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छह बरस से वह लड़का जगेसर था।

पैसा गट्ठर के हिसाब से मिलता था। जितने धागे उतारकर नीचे गिराओ, उन्हें बटोरकर गोल गट्ठर बनाया जाता है, और हर गट्ठर के पंद्रह रुपये। अच्छे साल में सात-आठ गट्ठर बन जाते थे। उस साल उसने सुबह से चार बना लिए थे।

दोपहर में वह नीचे वाली फाँक की तरफ़ बढ़ा, जहाँ तना दो में बँटता है और जहाँ सबसे पुराना सूत रह जाता है, क्योंकि वहाँ हाथ डालना मुश्किल है।

वहीं उसका हँसिया अटका।

पहले उसे लगा कि गाँठ पड़ी है। उसने खींचा और धागा नहीं आया। उसने दूसरी तरफ़ से खींचा और वह भी नहीं आया। उसने झुककर देखा। धागा छाल के अंदर था।

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बीच का हिस्सा दिख ही नहीं रहा था। दोनों सिरे बाहर निकले हुए थे, चार-चार उँगली भर, सख़्त और काले पड़े हुए, और उनके बीच की जगह पर छाल उभरकर एक चिकनी सूजन बना चुकी थी। जैसे तने ने उसे निगल लिया हो और उसके ऊपर मुँह बंद कर लिया हो।

जगेसर वहीं बैठा रहा। गाँव में यह बात कही जाती थी और उसने भी सुन रखी थी।

बरगद हर बरस के सब धागे लौटा देता है। पर कभी-कभी वह एक रख लेता है, और जो रख लिया गया उसे कोई काट नहीं सकता। जो रख लिया गया, वह पूरा हो चुका है। छह बरस में जगेसर को एक भी नहीं मिला था। रघुनाथ पंडित का कहना था कि उन्होंने अपनी उम्र में दो देखे हैं, और उनके बाबा ने चार।

उसने हँसिया रख दिया और उँगलियों से सिरे टटोले। सूत मोटा था और उस पर रंग चढ़ा हुआ था। हल्दी वाला पीला, जो अब मैला पड़ चुका था पर पहचान में आ रहा था।

यही उसके काम की चीज़ थी।

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पीला सूत गाँव में एक ही आदमी बेचता था और वह पंडित का छोटा भाई था, जो हल्दी में रँगकर लच्छियाँ बनाता था। उसने वह काम बंद कर दिया था और छपरा चला गया था। कब, यह जगेसर को नहीं मालूम था।

शाम को वह पंडित के पास गया। रघुनाथ ने सोचकर बताया कि पीला सूत उनके भाई ने कुल तीन-चार बरस बेचा था और आख़िरी बार तब, जब सड़क बनी थी। सड़क की तारीख़ पूरे गाँव को याद थी। पंद्रह बरस।

'उस बरस बाँधा किसने था?' 'सबने बाँधा था। सब बाँधती हैं।' फिर पंडित रुके। 'बचनी ने उसी बरस आख़िरी बार बाँधा था। उसके बाद से वह नहीं आती।' बचनी दादी चौरासी की थीं और गली के आख़िरी घर में रहती थीं। जगेसर उन्हें रोज़ देखता था और उसने आज तक उनसे बात नहीं की थी।

अगली सुबह वह उनके दरवाज़े पर गया और उसने सीधे पूछ लिया कि आप बरगद पर क्यों नहीं जातीं। उन्होंने उसे बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने बताया। उनका लड़का जहाज़ पर था। सारन ज़िले से उन दिनों बहुत लड़के जहाज़ों पर जाते थे और उनका भी चला गया था, बाईस बरस की उम्र में।

जिस बरस सड़क बनी, उस बरस ख़बर आई थी कि उसका जहाज़ कहीं तूफ़ान में फँस गया है और सत्रह दिन उसका कुछ पता नहीं चला। उन सत्रह दिनों के बीच वट सावित्री पड़ी थी। 'मैंने माँगा था कि जहाज़ न डूबे,' उन्होंने कहा।

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जहाज़ नहीं डूबा। अठारहवें दिन ख़बर आ गई थी।

पर लड़का घर नहीं आया। वह कलकत्ते में रह गया, फिर उसने वहीं शादी कर ली, और बाप के गुज़रने के बाद उसका आना बंद हो गया। बत्तीस बरस हो गए थे। 'तो मैंने माँगना छोड़ दिया,' बचनी ने कहा। 'जब सुना ही नहीं तो क्या माँगना।'

जगेसर तेरह बरस का था और उसे यह नहीं आता था कि बात कैसे रखी जाती है। उसने वैसे ही कह दिया जैसा था। 'सुन लिया था। जो माँगा था वही हुआ। जहाज़ नहीं डूबा।' बचनी ने कुछ नहीं कहा।

उस दोपहर वे लाठी लेकर बरगद तक आईं, जो उनके घर से डेढ़ सौ क़दम था और जिसमें उन्हें बहुत देर लगी। जगेसर ने उन्हें फाँक वाली जगह दिखाई और नीचे से उँगली उठाकर बताया कि सूजन कहाँ है। वे ऊपर नहीं चढ़ सकती थीं। वे नीचे खड़ी होकर देखती रहीं।

उस दिन जगेसर ने बाक़ी दो गट्ठर नहीं बनाए। शाम को वह पंडित के पास चार गट्ठर लेकर पहुँचा, साठ रुपये लिए, और वजह नहीं बताई।

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उस गाँठ के ऊपर छाल हर बरस थोड़ी और चढ़ती गई और नौ-दस बरस में दोनों सिरे भी अंदर चले गए। अब वहाँ सिर्फ़ एक चिकनी सूजन है। उस पर हाथ फेरो तो नीचे कुछ सख़्त-सा लगता है, और तने पर उतनी ऊँचाई तक जगेसर के अलावा कोई हाथ नहीं लगाता, क्योंकि वहाँ तक अब और कोई चढ़ता ही नहीं।