तीसरे दिन दोपहर में नित्यानंद के हाथ सुन्न पड़ गए।
छेनी उन्हीं की मुट्ठी में थी और मुंगरी की चोट भी वही पड़ रही थी, पर उँगलियों तक कुछ पहुँच ही नहीं रहा था। न लोहे का ठंडापन, न लकड़ी की पकड़, न वह झनझनाहट जो हर चोट के बाद कलाई तक जाती है। हाथ चल रहे थे। बस उनका पता नहीं चल रहा था।
उन्होंने काम नहीं रोका। यह साल में एक बार होता था और तीस बरस से होता आ रहा था।
जिस दिन ऐसा होता, उस दिन जो मूरत बनती, उसका चेहरा वह होता जो उन्होंने कभी नहीं देखा था। न सपने में, न भीड़ में, न किसी तस्वीर में। और उस बरस के भीतर वह चेहरा उन्हें कहीं मिल जाता था। हर बार मिला था।
पहली बार यह अठारह बरस के थे तब हुआ था, और वह चेहरा उस औरत का निकला था जिससे चार महीने बाद उनकी शादी हुई।
उसकी क़ीमत भी उन्हें मालूम थी।
जिस बरस वह चेहरा उतरता, उस बरस बाक़ी सारा काम उनके हाथ से मामूली निकलता। बराबर, नपा-तुला, ठीक-ठाक। और बस। कोई शिकायत नहीं करता था। भुवनेश्वर के उस पुराने मंदिर की मरम्मत तीन महीने से चल रही थी।
जेठ की धूप में पत्थर इतना तपता था कि दोपहर को छूना मुश्किल हो जाता। जगमोहन की दक्षिणी दीवार में खोंडालाइट के कई पत्थर दरक चुके थे और उन्हें बदला जा रहा था। नित्यानंद के ज़िम्मे भीतर वाले चबूतरे की तीन मूरतें थीं।
उन्होंने चोट लगाना जारी रखा और शाम तक चेहरा उतर आया। फिर उन्होंने उसे देखा। वह मंजुला थी। उनकी अपनी लड़की, जो घर पर थी, चौदह बरस की, और जिसका चेहरा वे रोज़ देखते थे। पर पत्थर वाली मंजुला चौदह की नहीं थी। वह तीस के आसपास की थी। गाल पतले थे। माथे पर एक लकीर थी। आँखें नीचे की तरफ़ देख रही थीं।
नित्यानंद बहुत देर वहीं बैठे रहे।
नियम कहता था कि यह चेहरा उन्होंने कभी नहीं देखा। नियम आज तक ग़लत नहीं हुआ था। और उसका मतलब यह था कि जो मंजुला उन्होंने बनाई है, वह उन्हें अभी मिली नहीं है।
उस रात वे घर लौटे तो देर हो चुकी थी।
रज पर्व आने वाला था और गली में लड़कियों ने आम के पेड़ पर झूला डाल रखा था। मंजुला बरामदे में बैठी दाल बीन रही थी। उन्होंने उसे देखा और कुछ नहीं पूछा। अगले चार दिन उन्होंने घर की सब छेनियाँ गिनकर संदूक में बंद कर दीं।
मूरत के हाथ में एक छेनी थी।
यही बात उन्हें काट रही थी। पत्थर की मंजुला के दाहिने हाथ में छेनी थी और बायाँ हाथ मुंगरी पर था, और नित्यानंद ने वह हाथ ख़ुद बनाया था, बिना जाने कि बना रहे हैं। उन्होंने तय कर लिया कि लड़की इस काम में नहीं आएगी।
इस पेशे में हाथ जल्दी ख़राब होते हैं, आँख जल्दी जाती है, और छाती में पत्थर का चूरा बैठ जाता है जो निकलता नहीं। उन्होंने अपने साथ के तीन आदमियों को पचास से पहले जाते देखा था। रज पर्व के दूसरे दिन उन्हें पीछे वाले कोठे में कुछ मिला।
वहाँ बेकार पत्थर के टुकड़े पड़े रहते थे, जो नाप में छोटे पड़ जाएँ या जिनमें दरार निकल आए। उन्हीं में, बोरे के नीचे, एक कपड़े की पोटली थी।
उसमें ग्यारह छोटे टुकड़े थे।
एक पर हाथी का सिर था। एक पर बैठी हुई औरत, घुटनों तक। एक पर सिर्फ़ एक हथेली, उँगलियाँ फैली हुईं। बाक़ी अधूरे थे। किसी पर नाम नहीं था। नित्यानंद ने उन्हें एक-एक करके उठाया और रौशनी में देखा। हाथी का सिर कच्चा था। औरत के कंधे टेढ़े थे। पर वह हथेली अलग थी। उसमें कुल पाँच उँगलियाँ और एक कलाई थी, और वह बहुत अच्छी थी।
इतनी अच्छी कि उन्होंने उसे दोबारा उठाकर देखा। छेनी का निशान गहरा और साफ़ था, और नाख़ून के पास वाली मोड़ पर वह हल्का किया गया था, जो सीखने वाले नहीं कर पाते। पोटली में सबसे नीचे एक पुरानी छेनी थी, जिसकी नोक घिस चुकी थी। वह उनकी अपनी थी और चार बरस पहले खोई मानी गई थी।
उन्होंने पोटली वहीं, बोरे के नीचे, वापस रख दी। अगले हफ़्ते मंदिर पर बिपिन ने बताया कि भीतरी चबूतरे की तीनों मूरतें अंदर वाली दीवार के पीछे पड़ेंगी।
यह पहले से तय था और नित्यानंद को मालूम था। मंडप का काम पूरा होने पर उस चबूतरे के सामने एक और दीवार उठनी थी, और उसके बाद वे तीनों मूरतें बंद हो जातीं। पत्थर पर काम करने वाला जानता है कि आधी मूरतें ऐसी ही जगहों पर लगती हैं।
उन्होंने कहा कि यह वाली बाहर लगेगी। बिपिन ने दोबारा पूछा। उन्होंने वही कहा।
बिपिन हँसा। फिर उसने कहा कि बाहर वाली दीवार के पत्थर नाप के हिसाब से कटे हुए आ चुके हैं, और अगर एक बदलना है तो नया पत्थर चाहिए, और उसका ख़र्च कमेटी नहीं देगी। नित्यानंद ने अपने बचे हुए दो महीने की मज़दूरी छोड़ दी। मोल-भाव उन्होंने नहीं किया।
और भीतरी चबूतरे के लिए जो पत्थर लगना था, वह उन्होंने अपने घर के पीछे रखे उस टुकड़े में से कटवाया जो उन्होंने बीस बरस पहले अपने लिए अलग रख छोड़ा था, अपनी समाधि की पटिया के लिए। मंजुला वाली मूरत दक्षिणी दीवार पर, ज़मीन से नौ फ़ुट ऊपर, बाईं तरफ़ लगी।
उन्होंने लड़की को कभी नहीं बताया कि वह उसका चेहरा है, और लड़की ने कभी नहीं बताया कि पीछे वाले कोठे में क्या रखा है। संदूक अगले महीने खुल गया और छेनियाँ वापस अपनी जगह पर आ गईं।
उस मूरत के दाहिने हाथ में जो छेनी है वह हाथ के नाप से बड़ी है। कारीगर देखने वाले आज भी यह कहते हैं कि यह चूक है। बात इतनी-सी है कि नित्यानंद ने उसे अपनी उसी छेनी को सामने रखकर बनाया था जो उनके हाथ में तीस बरस से थी, और वे उससे छोटी कोई छेनी बनाना जानते ही नहीं थे।